(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ आशुतोष कृत "कलम मेरी पहचान" साझा संकलन से)
धर्म के नाम पर लाखो का क्यूँ कर दान देते हो।
है यहां मजबूर कितने लोग न उनपर ध्यान देते हो।।
चढ़ाते हो बेजुबा मूरत पे गहने लाखो करोडो के ,
है नन्हे हाथ कतारों में रुपये न एक देते हो।।
व्यंजनों से सजी थाली से उनका भोग लगते हो ,
तड़पते भूख से कितने उन्हें निवाला क्यूँ न देते हो।
चढ़ाते हो मजारो में मखमली कीमती चादर ,
ठिठुरती ठण्ड से बूढी अम्मा उन्हें चादर न देते हो।।
दुआए देती तुम्हे हरदम तुम्हारा ही भला चाहती ,
उठाओ हाथ रेहमत के सहारा क्यूँ न देते हो।।
बताता भविष्य दुनिया का देखकर हाथ की रेखा ,
जानने काल सर्प सब दोष तुम्ही तो हाथ देते हो।।
उसे खुद का नहीं मालूम कहाँ कब क्या होना है ,
वो ज्योतिष मर गया बेमौत बढ़ावा तुम ही देते हो।।
बूढ़े माँ बाप जिन्दा थे कभी उनकी कदर ना की ,
मरने के बाद लगा भंडारे सभी को भर के देते हो।।
बना माहौल यहां कैसा सुधरते क्यूँ नहीं आखिर ,
कोई समझाए जरा इनको तो "विमल "को दोष देते हो।।
💐💐💐💐💐💐
© साहब सिंह विमल
फरीदाबाद
87005 94559
----------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363
Sunday, December 3
दूल्हा मंडी - साहब सिंह विमल (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ आशुतोष कृत "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)
(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ आशुतोष कृत "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)
आपने अनाज की मंडी सब्जी की मंडी तो देखी होंगी , परन्तु देखी न होगी दूल्हा मंडी !
एक थे सेबक राम उनके मन में दूल्हा मंडी का ख्याल आया !
कियु न एक दूल्हा मंडी का आयोजन किया जाय , सेबक राम ने फ़रमाया !!
सेबक राम ने पहले अपने परिवार वालो को समझाया !
बाद में पड़ोसियों को दूल्हा मंडी के लिए पटाया !!
घर और पड़ोस में दूल्हा मंडी की घुसर फुसर होने लगी !
और ये घुसर फुसर एकदिन हकीकत का चोला पहनने लगी !!
सेबक राम ने उचित स्थान देखकर अखाडा जमाया !
रंग बिरंगी कुर्सिया तो अंदर डाली ही बैनर भी लगवाया !!
एक तरफ वर पक्ष के लोग अपने सपूतो की फरमाईस पूरी कर रहे थे !
दूसरी तरफ कनिया पक्ष के लोग लाखो की बोली सुनते ही मर रहे थे !!
अजनबी आदमी वहां होकर गुजरता तो आश्चर्य में पड़ जाता !
एक ने कहा मेरी तो किस्मत ख़राब है लाखो के लिए तो अड़ जाता !!
भीतर दूल्हो की बोलिया लगाई जा रही थी !
कंन्याओ के पिताओं की स्वास लम्बी पड़ती जा रही थी !!
दुल्हों के चेहरे पर घ्र्टता कपट सिबर और मायूसी छा रही थी !
अविवाहितों की “ काटो तो खून नहीं “वो तो खामखा की सजा पा रही थी !!
एक क्रांतकारी स्वभाव की कन्या बैनर को देखकर पंडाल में आई !
पहले तो सारे पंडाल का जायजा लिया फिर गर्म जोशी के साथ गुर्राई !!
क्या तुम्हरी बेटिया नहीं है नामर्दों जो इन पुतलो का बाज़ार लगाये बेठे हो !
मंडिया तो सब्जी अनाज की होती है जो इन जानवरों की हाट लगाये बेठे हो !!
और ये दुबले पतले अपने बाप दादाओं से भी जालिम निकम्मे धूर्त है !
जो कि इतना भी नहीं समझ प् रहे है कि ये दुल्हन के नहीं दहेज़ के भूखे है!!
💐💐💐💐💐💐
© साहब सिंह विमल
87005 94559
----------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363

.jpeg)
No comments:
Post a Comment