(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "खुबसूरत लम्हें")
बिन नारी नहीं चल सकता है जग,
फिर क्यों होता है नारी के जीवन में संघर्ष?
जैसे गंगा लेती दूसरों के पाप अपनी लहरों पर,
नारी लेती हर कलंक अपने माथे पर।
कभी सीता के रूप में बचाती अपने राज्य की शान,
तो कभी सावित्री बन ले आती अपने पति के प्राण।
हर रूप में नारी के लिये आता है सम्मान,
पर क्या नारी का जीवन है एक अपमान?
जहाँ नहीं मिलता उसे स्थान,
कभी अपने भाइयों के लिये छोड़ती पढ़ाई,
तो कभी अपनों के लिये करती सबसे लड़ाई,
कभी खुद नहीं खा के दूसरों को खिलाती,
तो कभी परिवार का पेट पालने दूसरों के कपड़े सिलाती।
क्यों आज ना लेते ये प्रण के
नारी को देंगे हम उसका मान,
ताकि वो भी इस जग में कहे,
मेरा भी है कुछ सम्मान।
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समय का पहिया रुकता नहीं है, रोकने से
ये वो बारिश की बूँदें हैं, जो मिलती नहीं है ढूँढने से
जब इंसान का जीवन हो जाता है नाकाम,
तब उसे लगता है कि काश कर लिया होता थोड़ा काम,
ऐसे समय इंसान का जीवन भर जाता है आँसुओं से
पर समय का पहिया रुकता नहीं है, रोकने से
जब इंसान पाता है अपने चेहरा को झुर्रियों से,
तब उसे लगता है कि काश ना किया होता गुरुर जवानी का इतने लोगों से
पर समय का पहिया रुकता नहीं है, रोकने से
जब रिश्तों में आती है खटास किसी बात से,
तो रिश्ते अच्छे नहीं रहते, पिछले लम्हों जैसे,
इसलिए मत रखो द्वेष का भाव उनसे,
क्या पता वो कल ना मिल पाए तुमसे
समय का पहिया रुकता नहीं है, रोकने से
ये वो बारिश की बूँदें हैं, जो मिलती नहीं है ढूँढने से
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© कानन किरन जोशी
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