(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ आशुतोष कृत "शब्दों की बगिया" साझा संकलन से)
कभी पूछो जरा उनसे , गरीबी कैसी होती है ।
सिर्फ दो रोटी की दरकार, हसरत इतनी सी होती है।।
उम्र थी खेलने खाने की , गरीबी थी वो क्या करते।
देखते खाब अमीरी के , या फिर वो पेट को भरते।।
वो तपती धूप या सर्दी , वो नंगे पैर होते है।
काम में है दफ़न बचपन, वो फुटपाथ पे सोते है।।
अमीरो के घरो में काम , और बर्तन मांझते देखा।
नन्हे नन्हे हाथो को , भी कचरा छानते देखा।।
लाध कर बोझ कंधो पर , रहे लथ पथ पसीने से।
वो करते तो क्या करते ,मतलब है उनको जीने से।।
बनकर कोई फरिस्ता काश , आये उनके जीवन में।
जगाये जोति शिक्षा की, बहार आये उनके आंगन में।।
मत काटो पंख तुम इनके , इन्हे आकाश छूने दो।
जो हक़ बन रहा इनका , बो उनको भी लेने दो।।
वो भविष्य है भाबी भारत के ,पढ़ाने का उन्हें प्रण लेलो।
संवर जाये जिंदगी उनकी ,"विमल "ख़ुशी के कुछ तो पल देदो।।
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© साहब सिंह विमल
87005 94559
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