(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ आशुतोष कृत "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)
आपने अनाज की मंडी सब्जी की मंडी तो देखी होंगी , परन्तु देखी न होगी दूल्हा मंडी !
एक थे सेबक राम उनके मन में दूल्हा मंडी का ख्याल आया !
कियु न एक दूल्हा मंडी का आयोजन किया जाय , सेबक राम ने फ़रमाया !!
सेबक राम ने पहले अपने परिवार वालो को समझाया !
बाद में पड़ोसियों को दूल्हा मंडी के लिए पटाया !!
घर और पड़ोस में दूल्हा मंडी की घुसर फुसर होने लगी !
और ये घुसर फुसर एकदिन हकीकत का चोला पहनने लगी !!
सेबक राम ने उचित स्थान देखकर अखाडा जमाया !
रंग बिरंगी कुर्सिया तो अंदर डाली ही बैनर भी लगवाया !!
एक तरफ वर पक्ष के लोग अपने सपूतो की फरमाईस पूरी कर रहे थे !
दूसरी तरफ कनिया पक्ष के लोग लाखो की बोली सुनते ही मर रहे थे !!
अजनबी आदमी वहां होकर गुजरता तो आश्चर्य में पड़ जाता !
एक ने कहा मेरी तो किस्मत ख़राब है लाखो के लिए तो अड़ जाता !!
भीतर दूल्हो की बोलिया लगाई जा रही थी !
कंन्याओ के पिताओं की स्वास लम्बी पड़ती जा रही थी !!
दुल्हों के चेहरे पर घ्र्टता कपट सिबर और मायूसी छा रही थी !
अविवाहितों की “ काटो तो खून नहीं “वो तो खामखा की सजा पा रही थी !!
एक क्रांतकारी स्वभाव की कन्या बैनर को देखकर पंडाल में आई !
पहले तो सारे पंडाल का जायजा लिया फिर गर्म जोशी के साथ गुर्राई !!
क्या तुम्हरी बेटिया नहीं है नामर्दों जो इन पुतलो का बाज़ार लगाये बेठे हो !
मंडिया तो सब्जी अनाज की होती है जो इन जानवरों की हाट लगाये बेठे हो !!
और ये दुबले पतले अपने बाप दादाओं से भी जालिम निकम्मे धूर्त है !
जो कि इतना भी नहीं समझ प् रहे है कि ये दुल्हन के नहीं दहेज़ के भूखे है!!
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© साहब सिंह विमल
87005 94559
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