(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ आशुतोष कृत "कलम मेरी पहचान" साझा संकलन से)
पूछता है ये बतन अब इसका रखवाली कहाँ।
एकता और भाई चारा और वो खुशहाली कहाँ।।
लुट गया हाय चमन सारी कली मुरझा गयी।
छा गए बादल गमो के काली घटा सी छा गयी।।
झूमती थी जो लचककर अब है वो डाली कहाँ।
एकता और भाई चारा और वो खुशहाली कहाँ।।
खो गया है प्यार मुहब्बत का फरिश्ता सो गया।
जिंदगानी के लबो से प्यारा तराना खो गया।।
भर गया हो दिल दर्द से फिर वो खाली कहाँ।
एकता और भाई चारा और वो खुशहाली कहाँ।।
वेवशी सी जिंदगी है मजलूमों के दिल में दर्द है।
दीन दुखियो का सहारा कौन यहां हम दर्द है।।
कैसे जहाँ में हो वशर रेहमतो की थाली कहाँ।
एकता और भाई चारा और वो खुशहाली कहाँ।।
है यहां बीमार कितने लेकिन रहनुमा कोई नहीं।
देदे जो जुल्मो से राहत यहां ऐसा दर कोई नहीं।।
अब करे फरियाद किससे कौम का वाली कहाँ।
एकता और भाई चारा और वो खुशहाली कहाँ।।
जिसके दम से इस गुलिस्ता में रहती थी बहार।
लौटकर आ जाये फिर से मिन्नतें करते हजार।।
हो गया नजरो से ओझल "विमल " माली कहाँ।
एकता और भाई चारा और वो खुशहाली कहाँ।।
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© साहब सिंह विमल
फरीदाबाद
87005 94559
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