Monday, October 26

आई दीपावली, छाई खुशियाँ - डॉ. संतोष रंगराव (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "धमाका अक्षरों का")

(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "धमाका अक्षरों का")




    आई दीपावली, छाई खुशियाँ
💐.......................................................💐


अंधेरों को चीरकर आज, दीपों का कारवां आया है,

हर घर-आँगन में देखो, कैसा उजियारा छाया है।

माँ लक्ष्मी का पूजन करके, सबने माथा टेका है,

खुशियों से सज़ा हर कोना, ऐसा मंजर देखा है।


खिलखिलाती हँसी की लहर है, बच्चों का उत्साह नया,

मिठाइयों की मिठास में, हर दिल का मैल गया।

चटख रंगों की रंगोली से, सजाए द्वार-दरवाजे हैं,

जगमगाती इस रात में, जगमग सारे नताजे हैं।


पटाखों की गूँज से गूँजा, देखो सारा आसमान,

सज-धज कर बैठी है धरती, जैसे कोई दुल्हन महान।

चलो जलाएँ मन के भीतर, ज्ञान का एक ऐसा दीप,

जहाँ मिट जाए बैर-भाव, और गले लग जाए हर मीत।


शुभ दीपावली का संदेश, घर-घर तक पहुँचाना है,

हर दिल में प्यार का दीपक, सदा जलाए जाना है।

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💐💐💐💐💐💐

© डॉ. संतोष रंगराव

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Thursday, October 1

समय, मौन और सृजन : जीवन का अनकहा सफर - संतोष रंगराव (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology)

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "धमाका अक्षरों का")



समय, मौन और सृजन: जीवन का अनकहा सफर
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    दीपावली के दीपों की जगमगाहट और आतिशबाजी के शोर के बीच, अक्सर मन एक अलग ही खामोशी की तरफ खिंच जाता है। जब हम जीवन की भागदौड़ से थोड़ा वक्त निकालकर पीछे मुड़कर देखते हैं, तो अहसास होता है कि हमारा पूरा सफर कुछ पन्नों, कुछ रिश्तों और कुछ अनकही अनुभूतियों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है।

    आज इस शांति के पल में, आइए बात करते हैं 'मौन और सृजन' (Silence and Creation) के उस अनूठे रिश्ते की, जो हर लेखक, हर कलाकार और हर संवेदनशील इंसान के भीतर लगातार धड़कता रहता है।


१. शोर के बीच खामोशी की तलाश

    हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हर तरफ शोर है—विचारों का शोर, अपेक्षाओं का शोर, सफलताओं-असफलताओं की दौड़ और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया की चमक-धमक। इस भारी शोर के बीच इंसान अपनी ही वास्तविक आवाज़ को खोता जा रहा है।

    लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बड़े से बड़ा विचार, सबसे गहरी कविता या कोई महान रचना कहाँ से जन्म लेती है? वह किसी शोरगुल भरे बाज़ार में पैदा नहीं होती। उसका जन्म हमेशा 'मौन' की गोद में होता है। जब बाहर का कोलाहल शांत होता है, तब भीतर के कवाड़ हटते हैं और सृजन का असली स्त्रोत फूट पड़ता है।


२. दर्द और संघर्ष ही बनते हैं स्याही

    जीवन में जब रास्ते कठिन होते हैं, जब अपने लोग साथ छोड़ जाते हैं या जब अनपेक्षित आघात मिलते हैं, तब इंसान अंदर से टूटता ज़रूर है—पर वही टूटना उसे भीतर से एक नया रूप देता है।

    जैसे एक बीज को अंकुरित होने के लिए पहले खुद को अंधेरी मिट्टी में दफनाना पड़ता है, वैसे ही एक रचयिता के आँसू और उसके संघर्ष उसकी सबसे ताकतवर रचनाओं की स्याही बनते हैं। जो दर्द शब्दों में बयां नहीं हो पाता, वह कला, कविता या साहित्य बनकर अमर हो जाता है।


३. रिश्तों की डोर और आत्म-अन्वेषण

    हम दिनभर हज़ारों लोगों से मिलते हैं—कुछ अपने होते हैं, कुछ अजनबी। लेकिन इस पूरी भीड़भाड़ में सबसे लंबी यात्रा हमारी अपने ही भीतर की होती है। हम उम्र भर दूसरों को समझने, उन्हें खुश करने और समाज के बनाए पैमानों पर खुद को ढालने में लगे रहते हैं।

    परंतु, जीवन का असली सौंदर्य तब समझ में आता है जब हम खुद से मिलना शुरू करते हैं। यह स्वीकार करना कि "हाँ, मैं थक जाती हूँ, मेरी आँखें भी नम होती हैं, पर मैं हारी नहीं हूँ"—यही आत्म-स्वीकृति इंसान को अंदर से सबसे ज़्यादा मजबूत बनाती है।

 

एक छोटी सी कविता: 'भीतर का आकाश'


शोर बहुत है दुनिया भर का, खुद की आवाज़ खोई है,

लगता है इन रातों की नीदों में, कोई बात छुपी सोई है।

बाहर तो बस मेला है, दुनिया की अपनी रीत है,

भीतर झाँको तो पाओगे, अपनी ही एक प्रीत है।


मत डरो अंधेरों से तुम, ये उजाले की तैयारी हैं,

मुश्किलें तो जीवन की बस, छोटी-सी एक आरी हैं।

जो तराश दे पत्थर को, वही तो असली शिल्पी है,

और खामोशी में ही छिपी, सृजन की पूरी मरज़ी है।


    जीवन का सफर अनिश्चित है, कल क्या होगा कोई नहीं जानता, लेकिन आज के इस पल में हम अपनी कलम से, अपने कर्म से और अपनों के प्रति अपने प्रेम से इस सफर को खूबसूरत बना सकते हैं।

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Wednesday, September 30

सुनते हो तो सुनो - अनसूया आर (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "स्नेह - अपनी लेखनी से")

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "स्नेह - अपनी लेखनी से")





     सुनते हो तो सुनो
💐............................................💐


बड़ों की बातें ध्यान से सुनो,

धर्मग्रंथों को पहचानो,

अच्छे मार्ग पर सदा चलो,

जीवन सुखमय बनाओ।


भँवरे जैसे बनो,

फूलों का रस पी लो,

फूलों की सुंदरता सँजोकर,

प्रेम से जीवन जी लो।


सुख-शांति से रहो सदा,

चैन की नींद सोओ,

सबसे मिलकर प्रेम से रहो,

अच्छी आदतें बोओ।


माता-पिता की बात मानो,

बड़ों का आदर करो,

सबका भला करते हुए,

हर दिल में प्रेम भरो।


गणपति ने माता-पिता की परिक्रमा कर

अग्रगण्य स्थान पाया,

राम ने पिता की आज्ञा मानकर

आदर्श पुत्र कहलाया।

ध्रुव ने अटल भक्ति से

ध्रुवतारा पद पाया।


जीवन बहुत अनमोल है,

इसे व्यर्थ मत गँवाओ,

हर पल अच्छे कर्मों में लगाओ,

अपने जीवन को सँवारो।


सुनते हो तो सुनो,

नहीं तो अपना मार्ग चुनो।

पर याद रखो, जैसी आदत होगी,

वैसा ही सुख तुम पाओ।


गटर में सोने वाले को

गटर ही सुख देता है,

राख में सोने वाले को

राख ही भाती है।


नाली के कीड़े को नाली भाए,

गोबर के कीड़े को गोबर,

कीचड़ में भैंस को सुख मिले,

उसे वहीं लगता सुंदर।


कुत्ते के आगे खीर रखो,

वह भी “कीड़े-कीड़े” कहता है,

जिसे जैसी आदत पड़ जाती है,

वही उसे अच्छा लगता है।


इसलिए अच्छे विचार चुनो,

अच्छी संगति अपनाओ,

माता-पिता का मान रखो,

प्रेम-शांति से जीवन बिताओ।


सुनते हो तो सुनो,

सुनते हो तो सुनो—

जीवन को सुंदर बनाना है तो

अच्छे मार्ग पर चलो!

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💐💐💐💐💐💐

© अनसूया आर

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अनसूया आकाश चव्हाण

JL in हिंदी, 

Jaya shankar - bhupalapally

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Monday, September 14

हिंदी मेरी पहचान है - संतोष रंगराव (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology)

(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology)




    हिंदी मेरी पहचान है
💐............................................💐


अंगड़ाई लेती संस्कृत से, प्राकृत और अपभ्रंश की छाँव में,

पल-बढ़कर जो बड़ी हुई है, भारत के हर गाँव में।

बिंदी जैसी सजी हुई यह, माथे की शान है,

सिर्फ एक भाषा नहीं यारों, हिंदी मेरी पहचान है।


अ से ज्ञ तक के अक्षरों में, गंगा सी निर्मल धारा है,

मीरा के भजनों की खुशबू, कबीर का इसमें नारा है।

तुलसी की चौपाइयों में, जो गूँज अनन्त समाई है,

उसी सुहानी बोली ने, भारत की अलख जगाई है।


चाहे भाषाएँ हों दूजी, सबका अपना सम्मान सही,

पर हिंदी के आँचल जैसी, ममता कहीं और नहीं।

भावों को जो रूप दे दे, जो दिल की बात बताती है,

अपनों को अपनों से जो, हर पल आके मिलाती है।


आइए आज यह संकल्प हम, मिलकर के दोहराएँगे,

हिंदी का मान बढ़ाकर, इसे शिखर पर पहुँचाएँगे।

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💐💐💐💐💐💐

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Saturday, September 5

भाषा सहगामी हिंदी - डॉ. रमादेवी (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")




    भाषा सहगामी हिंदी
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जय-जयकार हो मातृ-भाषा की, 

जो माँ भारती के हर प्रांत में रची बसी है।

जिसके ऑंगन में खेला बचपन, 

मातृभूमि की महक बसी है।

विदेश से आई अंग्रेजी, मेहमान है हमारी। 

इसको भी अपनाना है। 

माँ  भारती का गहना बनाकर ही रखना है।

इसका सम्मान भी हमें करना है।

इसको भी साथ लेकर ही चलना है।

लेकिन हिंदी के क्या कहने।(2)


राज-भाषा का गौरव इसने पाया है, 

माँ भारती ने बना बिंदी भाल पर अपने इसे सजाया है।

इसकी आभा से खनक उठे माँ के कंगन और चमक उठै हैं गहने।

हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)


गीता, रामायण, महाभारत, वेद पुराणों की भाषा संस्कृत की लिपि देवनागिरी से जन्मी हिंदी है।

स्वतंत्र भारत के प्रजा तंत्र और संविधान की भाषा हिंदी है।

हिंदी भाषा के क्या कहने(2)


इसके साहित्य में अनंत विधाओ की भरमार है, 

मुहावरे, लोकोक्ति, रस, छंद अलंकार है।

सुनने में कर्ण मधुर, जो कहते हैं वही हम लिखते हैं।

संग इसके जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं।

हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)


योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, अर्थशास्त्र की भाषा हिंदी है।

हिंदी भाषा साहित्य, वाणिज्य ही नहीं, 

तकनीकी क्षेत्र में भी विजय पाई है।

तभी तो चंद्रयान को चंद्रमा पर और आदित्य को सूर्य की ओर भेज पाई  है।

हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)


हिंदी ने तो भारत माँ के गौरव में चार चाँद लगाए हैं, 

इसीलिए तो सारे देश भी इसकी चमक को अपनाए हैं।

अब तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी का हक बनता है।

इसीलिए तो 14 सितंबर को हम भारत में हिंदी दिवस मनाते हैं

और 10 जनवरी को विश्व में हिंदी दिवस मनाया जाता है।

हिंदी भाषा के क्या कहने।(2)


हिंदी मानव मन को जोडने वाली कड़ी है,

जो विश्व भर में अडिग होकर खड़ी है,

अडिग होकर खड़ी है।


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© डॉ. रमादेवी

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एस. ए .हिंदी

जी पी एच एस

खैरताबाद, हैदराबाद।

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Wednesday, September 2

जीवन की सार्थकता - Botla Sirisha (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")




    जीवन की सार्थकता
💐............................................💐


बढ़ते जाओ-बढ़ते जाओ,

आगे -आगे बढ़ते जाओ।

 बढ़ना है तो लड़ते जाओ,

बचपन से ही सब कुछ सहते जाओ।


करते जाओ- करते जाओ,

 सदा कोशिश करते जाओ।

हार न मानो तुम,आगे ही बढ़ते जाओ,

अपने सपनों को सच करते जाओ।


हार-जीत में थोड़ा-सा अंतर,

 मन में लता परिवर्तन बेहतर।

कुछ काम नया तुम करके दिखाओ,

सफलता का जीवन फल पाओ।


माता - पिता को भार न बनो तुम,

इस दुनिया को ही आधार बनो तुम।

निराधार ही खड़े हो जाओ,

सबको तुम ही आधार बन पाओ।


जीते जाओ - जीते जाओ, 

जीवन पथ में जीते जाओ।

मानव जीवन मिला है,सार्थक बनाओ,

इस दुनिया में अपना पहचान बनाओ।

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💐💐💐💐💐💐

© Botla Sirisha

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Government High school

Alamuru

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आई दीपावली, छाई खुशियाँ - डॉ. संतोष रंगराव (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "धमाका अक्षरों का")

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