(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "भाव कलश", डॉ अपर्णा चतुर्वेदी के संपादन में)
हिंदी है हमारा गौरव,
हिंदी ही मस्तक का तिलक।
हिंदी हमें राह दिखाती,
जब हम जाएं भटक।
कहीं भी हम जाएं,
हिंदी ही हृदय के निकट है।
अनेक भाषाओं को क्यों ना अपनालें,
हिंदी ही हमारे सर का मुकुट है।
हिंदी ने गुलामी की बेडियों को तोड़ा,
हिंदू मुसलमान सिख इसाई को जोड़ा।
ना होती यह आशा,
तो ना जगती राष्ट्रीयता हमारे मन में।
ना रहती एकता,
हमारे इस वतन में।
इस मधुर भाषा के सूर्य हैं सूरदास,
तुलसी इसके चंद्र हैं।
इस सुमधुर गाथा को रचा,
प्रेम, सुभद्रा, हरिश्चंद्र ने।
भारत को विश्व प्रसिद्ध बनाती है,
भारत वासियों को जीना सिखाती है।
हिंदी की सुंदरता अतुलनीय है,
यह भाषा हमारी मीत है।
पूरे संसार में कुछ नहीं,
आगे हिंदी संगीत के।
मातृभाषा यह हमारी मां समान,
सदा घर की याद दिलाती है।
सुख दुख को व्यक्त करना हो,
तो हिंदी ही ज़बान पर आती है।
हम भले ही विभिन्न देशों को जाएं,
हिंदी ही हमारे मन को भाती है।
सम्मान करें हिंदी का हम,
देश के प्रति कर्तव्य निभाएं।
दिल में सदैव राज रहे हिंदी का,
आप सभी को हिंदी दिवस की शुभकामनाएं।
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© सय्यदा खुशी अली
एम. ए. इंग्लिश, प्रथम वर्ष
आर्ट्स कॉलेज
उस्मानिया विश्वविद्यालय
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