प्रेम दर्शन है, कोई प्रदर्शन नहीं है,
ये समर्पण है, कोई आकर्षण नहीं है।
साथ हो दिल तो दूरी भी करीब लगती,
सिर्फ़ पास आ जाना ही तो मिलन नहीं है।
जो निभे हर हाल में, वही इबादत-सा लगे,
वक्त का मोहताज जो हो, वो बंधन नहीं है।
दिल से दिल तक जो बिना शब्दों के पहुँचे,
वो ही प्रेम है, कोई साधन नहीं है।
जिसमें ‘मैं’ भी पिघल जाए और ‘तू’ भी ठहर जाए,
वो संगम है, कोई साधारण मिलन नहीं है।
खामोशियों में जो अर्थ खुद-ब-खुद खिल उठें,
वो अनुभूति है, कोई कथन नहीं है।
जो थाम ले गिरते वक्त बिना किसी शर्त के,
वो सहारा है, कोई कारण नहीं है।
रूह से रूह का रिश्ता जहाँ बस महसूस हो,
वो नाता है, कोई बंधन नहीं है।
प्रेम वो छाँव है जो धूप में भी सुकून दे,
ये ठहराव है, कोई क्षणिक विश्राम नहीं है।
जो आँखों में उतरकर दुआ-सा ठहर जाए,
वो एहसास है, कोई साधारण अरमान नहीं है।
जिसमें हर दर्द भी मधुर-सा गीत बन जाए,
वो राग है, कोई शोर का विधान नहीं है।
जो बिन मांगे ही हर कमी को भर दे,
वो करुणा है, कोई लेन-देन का ज्ञान नहीं है।
जहाँ खोकर भी खुद को पा लेने का सुख हो,
वो यात्रा है, कोई भटकाव का निशान नहीं है।
जो अंत में भी आरंभ-सा उजास दे जाए,
वो प्रेम है, कोई कहानी का अवसान नहीं है।
प्रेम वो लय है जो सांसों में खुद-ब-खुद बस जाए,
ये स्पंदन है, कोई सीखा हुआ चलन नहीं है।
जिसमें नजरें झुकें तो भी इज़हार हो जाए,
वो भाषा है, कोई शब्दों का चयन नहीं है।
जो थकान में भी एक मधुर-सी ताज़गी भर दे,
वो सुकून है, कोई क्षणिक शरण नहीं है।
जहाँ हर खामोशी भी कहानी कहती रहे,
वो संवाद है, कोई अधूरा कथन नहीं है।
जो हर रूप में अपनापन ही रचता जाए,
वो विस्तार है, कोई सीमित बंधन नहीं है।
जिसमें समय भी ठहरकर मुस्कुरा उठे,
वो पल है, कोई बीतता हुआ क्षण नहीं है।
जो तेरे नाम से ही हर धड़कन संवर जाए,
वो अर्पण है, कोई संयोग का स्पर्श नहीं है।
जिसमें खुद को मिटाकर भी पूर्णता मिल जाए,
वो साधना है, कोई साधारण वरण नहीं है।
तेरी मुस्कान में ही अपना हर सवेरा दिखे,
वो उजास है, कोई सूरज का उदय नहीं है।
जो तेरे दुःख को अपना बनाकर भी मौन रहे,
वो तप है, कोई दिखावे का त्याग नहीं है।
तेरी राहों में बिखरकर भी जो महकता रहे,
वो पुष्प है, कोई क्षणिक उपवन नहीं है।
जिसमें हर सांस तेरे अस्तित्व को ही जपती रहे,
वो मंत्र है, कोई अधूरा उच्चारण नहीं है।
जो हर जन्म में तुझ तक ही पहुँचने का पथ बने,
वो नियति है, कोई भटकता हुआ चयन नहीं है।
तेरे होने से ही जो “मैं” का अर्थ बदल जाए,
वो सत्य है, कोई भ्रमित दर्शन नहीं है।
जो अंतर्मन में चुपचाप दीप-सा जलता रहे,
वो ज्योति है, कोई बुझता हुआ कारण नहीं है।
तेरे संग में जो हर सीमा भी असीम हो जाए,
वो अनंत है, कोई सीमित स्पंदन नहीं है।
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© अंकुश कुमार अग्रवाल
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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