Tuesday, March 3

सुनील का संघर्ष और सफलता - (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")

  (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")



सुनील का संघर्ष और सफलता
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    यह कहानी है एक बेहद निर्धन परिवार के युवक सुनील की जो की सफलता की सीढ़ियां चढ़कर कुछ बन ना चाहता था। उसके पिता धर्मपाल एक दिहाडी़ी दार मजदूर थे और कभी-कभी सुनील को भी उनके साथ मजदूरी के लिए जाना पढ़ता था। अभी वह गांव के सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ता था। उसके गांव मैं एक सरकारी माध्यमिक विद्यालय ही था। अब आठवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात उसे 8 किलोमीटर दूर एक गांव में एक वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में जाना था। उसके पिता बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चला पाते थे। सुनील के पास न तो अच्छे कपड़े थे और नए ही ट्यूशन पढ़ने के लिए पैसे, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे।

    सुनील की शिक्षा के प्रति इतनी लगन थी कि गांव में विद्यालय की कमी और सुख सुविधाओं के अभाव के बावजूद उसने कभी हार नहीं मानी। उसने पेड़ों की छांव मैं बैठकर पढ़ाई की। स्कूल के बाद वह गांव में साफ सफाई का कार्य करता था ताकि अपनी पढ़ाई और रहने का खर्च निकल सके। उसकी मेहनत तब रंग लाई  जब उसने बोर्ड परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अब सुनील वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय का विद्यार्थी था जो कि उसके घर से लगभग 8 किलोमीटर दूर था । परंतु घर से विद्यालय की दूरी ने उसकी शिक्षा के प्रति जुनून को कम नहीं किया। विद्यालय के एक शिक्षक ने सुनील की प्रतिभा को समझा और उसे आर्थिक व अन्य सहायता प्रदान करने में योगदान दिया। अपनी मेहनत में लगन से उसे शहर के एक बड़े कॉलेज मैं प्रवेश मिल गया था शहर के बड़े कॉलेज में दाखिला मिलने के बाद उसे कई बार अपने अमीर सहपाठियों के उपवास का सामना करना पड़ा। लेकिन उसने अपमान को अपनी शक्ति बनाया और चुपचाप अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया। सुनील की कड़ी मेहनत तब रंग लाई जब उसने वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय की बोर्ड परीक्षा में भी पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया और आगे चलकर एक प्रशासनिक अधिकारी बना। सुनील ने यह साबित कर दिया कि सफलता का संबंध सुख सुविधाओं से नहीं बल्कि आपके आत्मविश्वास और कठिन परिश्रम से होता है।  सुनील की कहानी उसके अधिकारी बनने के बाद एक नए और अधिक प्रभावशाली मोड़ पर पहुंचती है। अपना प्रशासनिक पदभार संभालने के बाद सबसे पहले अपने गांव गया और अपने माता-पिता के लिए नए कपड़े खरीदे और घर के लिए जरूरी सामान खरीदा। सुनील ने अपने पुराने स्कूल की मरम्मत करवाई जहां उसने पेड़ों की छांव में पढ़ाई की थी। सुनील ने देखा कि गांव में अभी भी कई बच्चे गरीबों के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। सुनील ने अपनी देखरेख में गांव में एक आधुनिक पुस्तकालय खुलवाया और साथ ही एक कोचिंग केंद्र खुलवाया ताकि संसाधनों की कमी के कारण किसी और होनहार विद्यार्थी का रास्ता ना रुक सके । एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में सुनील ने पूरी ईमानदारी से काम किया । जब उसके क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए फंड आया तो उसने सुनिश्चित किया कि एक-एक पैसा सही जगह खर्च हो । उसने उन लोगों का सामना भी किया जिन्होंने कभी उसकी गरीबी का मजाक उड़ाया था लेकिन उसने बदला लेने के बजाय उन्हें अपने काम से जवाब दिया । सुनील की मेहनत ने ने केवल उसके परिवार की गरीबी दूर की बल्कि वह पूरे जिले के लिए एक प्रेरणा बन गया।

सुनील की कहानी का अंत बेहद भावुक और प्रेरणादायक है। वर्षों की सेवा के बाद सुनील इस विद्यालय में मुख्य अतिथि बनकर लौटा । मंच पर खड़े होकर उसने अपने पुराने फटे थैले को सबको दिखाया जिसे उसने आज भी सहेज कर रखा था। सुनील ने मंच पर भरे गले से कहा कि यह थैला मुझे याद दिलाता है कि मेरी असली ताकत मेरी गरीबी नहीं बल्कि मेरा संघर्ष था।

उसे दिन सुनील ने स्कूल के सबसे गरीब लेकिन सबसे होनहार छात्र को अपनी व्यक्तिगत बचत से उच्च शिक्षा छात्रवृत्ति देने की घोषणा की। जब उसे छात्र ने सुनील के पैर छुए तो सुनील को अपनी सफलता का असली अर्थ समझ आया। सुनील के पिता धर्मपाल गर्व से भरी आंखों के साथ कोने में खड़े होकर मुस्कुरा रहे थे।

उनकी मेहनत और बेटे के संकल्प ने मिलकर इतिहास रच दिया था।

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© रजत सहगल

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मासूमियत का संघर्ष - रजत सहगल (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")

  (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")



मासूमियत का संघर्ष
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    सीमा कि यह कहानी बेहद मार्मिक और दिल को छू जानॆ वाली है। यह कहानी हमें सिखाती है की मुसीबतें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो हौसला और मेहनत हमें हर मुश्किल को आसान बना देती है। यह कहानी एक छोटी सी बच्ची की है जो दिल्ली के चांदनी चौक में गुब्बारे बेचने के लिए सुबह से शाम तक घूमती रहती है। फटे हुए कपड़े और नंगे पैर होने के बावजूद उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान रहती थी। जब भी कोई गाड़ी लाल बत्ती पर रूकती, वह अपनी नन्ही सी आवाज मे कहती साहब एक गुब्बारा ले लो बहुत प्यारा है।

    चांदनी चौक का वह व्यस्त चौराहा जो आज बारिश की बूंदो से धुंधला गया था। शाम ढल रही थी और लोग अपने घरों की ऒर भाग रहे थे। कुछ लोग बारिश के थमने का इंतजार कर रहे थे। एक दिन एक अमीर आदमी अपनी आलीशान कर में वहां रुका। उसे  पानी से सरोबार 10-12 साल की सीमा दिखाई दी। उसके पुराने घिसे हुए कपड़ों से पानी टपक रहा था।

    उसने देखा की सीमा फटे हुए कपड़ों में भी कितनी खिलखिला रही थी जबकि वह खुद अपनी करोड़ो की संपत्ति के बाद भी तनाव मे रहता था। उसने सीमा को बुलाया और पूछा बेटी तुम इतना खुश कैसे रहती हो? तुम्हारे पास तो ठीक से कपड़े भी नहीं है। सीमा ने जवाब दिया साहब जब मैं इन रंग-बिरंगे गुब्बारो ही उड़ते हुए देखती हूं तो मुझे लगता है कि मैं भी इनके साथ आसमान छू रही हूं। वह आदमी सीमा की बात सुनकर दंग रह गया |उसने सीमा के सारे गुब्बारे खरीद लिए और उसे ढेर सारी मिठाइयां भी दी । सीमा आज बहुत खुश थी पर वह अमीर आदमी उससे भी ज्यादा खुश था क्योंकि आज उसने एक छोटी सी बच्ची  से जीवन का सबसे बड़ा सबक सीखा था - उस दिन  सीमा जब घर पहुंची, तो उसके हाथ खाली नहीं थे गुब्बारो के बदले मिली मिठाइयां और अपनी बीमार मां के लिए दवाइयां खरीदी।

    अगले दिन वह फिर उसी चौराहे पर खड़ी थी, लेकिन आज उसके पास गुब्बारे नहीं थे वह बस वहां खड़ी होकर उसे अमीर आदमी का इंतजार कर रही थी । जब वही आलीशान कार फिर से सिग्नल पर रुकी तो सीमा दौड़कर खिड़की के पास गई । उसने अपनी मुट्ठी खोली और उसमें से एक छोटा सा पत्थर निकाला जिस पर उसने रंगीन पेन से एक मुस्कान (Emoji) बनाई थी उसने वह पत्थर उसे आदमी को देते हुए कहा साहब कल आपने मेरे सारे गुब्बारे खरीदे थे इसलिए आज मेरी तरफ से आपके लिए तोहफा लाई हूं जब भीआप उदास हो इसे देख लेन।

    वह आदमी भावुक हो गया और उसने महसूस किया की सीमा सिर्फ गुब्बारे नहीं बल्कि खुशियां बांट रही थी उसने फैसला किया कि वह सीमा की पढ़ाई का खर्च उठाएगी कुछ सालों बाद वही नई सीमा अब हाथ में गुब्बारे नहीं बल्कि किताबें लेकर स्कूल जाने लगी उसने साबित कर दिया कि अगर मन मे उम्मीद और मेहनत हो तो किस्मत के गुब्बारे भी ऊंची उड़ान भर सकते हैं।

    समय बीतता गया और सीमा की मेहनत रंग लाई वह अमीर आदमी जिसका नाम मिस्टर खन्ना था अब सीमा के लिए उसके सपनों के फरिश्ते बन चुके थे। सीमा मैं स्कूल में टॉप किया और अपनी मां का इलाज करवा कर उन्हें पूरी तरह से ठीक कर दिया

    अब सीमा बड़ी हो चुकी थी उसने एक एनजीओ शुरू किया जिसका नाम रखा उड़ान वह खुद अब महंगी गाड़ियों में घूमती थी परंतु उसका दिल आज भी उसी चौराहे पर अटका था। एक दिन सीमा ने उसी चौराहे पर देखा कि एक छोटा लड़का उदास बैठा है उसके पास भी कुछ गुब्बारे थे जो बिक नहीं रहे थे सीमा कार से उतरी और उसी बच्चे के पास गई और उसके सारे गुब्बारे खरीद लिए जब उसे बच्चे के चेहरे पर वही पुरानी वाली मुस्कान आई तो सीमा की आंखों मैं अंशु आ गए उसने उस बच्चे को गले लगाया और मिस्टर खन्ना की बात याद आई कि यह गुब्बारे सिर्फ हवा से नहीं बल्कि उम्मीदो से भरे हैं सीमा ने ने केवल अपनी जिंदगी बदली बल्कि आज वह हजारों गुब्बारे वाले बच्चों के जीवन में रंग भर रही थी।

    कहानी का यह मोड़ सिखाता है की सफलता वही है जो दूसरों के काम आए।

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© रजत सहगल

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Glory to India, Behold the Tricolour - CH.RAMULU (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")

  (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")





    Glory to India, Behold the Tricolour  
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O Mother! Glory, glory to India, behold the Tricolour,

The people and the land of India are rising against the foreign yoke.

Our country is dearer to us than life itself,

Our passion is second to none and ever-growing.

Vande, Vande, Vandemataram!

Vandemataram!


The Revolutionary Path

Take the steps of revolution...

Let everyone show their own strength and power.

Keep a watchful eye on the British...

And prepare ourselves for our own goal.

"Quit India!"... "Drive them out!"...

We are devoted to our freedom...

May we become as powerful as a weapon, so we may finally be free.


The Path of Peace and Law

Establish the rules of peace...

With grace and pride, let the Constitution be written.

Secure the rights of the Indian people...

And let our own path teach us the struggle of life.

O lucky ones!... Come, take an oath...

Let us repay the debt we owe to Mother India.

Take a vow against every bond... so our voices may truly be heard

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© CH.RAMULU

S.A.Hindi and cine lyricist
GGHS Lashkar bazar 
Hanamkonda 
Telangana 506001
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जय जय हिंद देखे तिरंगा - सि.हेच. रामुलु (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")

 (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")





    जय जय हिंद देखे तिरंगा 
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हे माँ! जय जय हिंद देखे तिरंगा

        जन गण हिंद होते फिरंग...

        हम से प्यारा हमारा देश

        कम नहीं किस से बडती है

        जोश

        वन्दे वन्दे वन्देमातरम

        वन्देमातरम


क्रांतीकारी कदम बढाएँ...

हर अपनी सत्ता वे दिखाएँ..

अंग्रेजों पर नजर लगाएँ...

खुद अपनी लळ्य को सजाएँ..

भारत छोडो...ओ..भाग निकालो..ओ...

आजादी से हमें लगन है...

हम बन्दूक बन पाएँ..'आजाद हो पाएँ..               


शांतीवादी नियम बनाएँ....

सज दज कर संविधान लिखाएँ..

भारत जन को अधिकार दिलाएँ..

निज पथ पर हमे युद्ध सिखाएँ...

किस्मत वालो..ओ..कसम तो खाओ..ओ..

भारत माँ की ऋण निभाएँ..

हर बन्धन की प्रण खाएँ.'.आवाज दे पाएँ।

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💐💐💐💐💐💐

© सि.हेच. रामुलु

सरकारी हिंदी प्राध्यापक और फिल्मी गीतकार 
सरकारी बालिका माध्यमिक पाठशाला 
हनामकोंडा 
तेलंगाना 506001
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Sunday, March 1

इन्द्रधनुष - अभिलाषा सक्सेना (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")

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    इन्द्रधनुष
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आसमान में छाया देखो

सात रंगों का इन्द्रधनुष

इन सातों रंगों में है

जीवन के उपदेश भरा


लाल रंग कहता है हमसे

जीवन में उत्साह भरो

पीला कहता प्रेरणा के साथ

जागरूक होकर आगे बढ़ो


जमुनी कहता जीवन की सच्चाई

को तुम देखो गहराई से

बैंगनी कहता है हमसे

रहो सदा निस्वार्थ भाव से


नारंगी कहता शांति के पथ पर

चलकर तुम अपनी मंजिल पाओ

सात रंगों के महत्व को तुम

अपने जीवन में लाओ

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© अभिलाषा सक्सेना

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Saturday, February 7

कवि डाॅ जमालपुरकर गंगाधर 'गंध' की दो कविताएँ (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")

(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")



    वंदेमातरम 
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वंदेमातरम मातरम वंदे,

भारत वंदेमातरम जय वंदे,

जग-जननी सुधरणीम वंदे,

विश्व जननी सुख दायिनी वंदे।।


सामाजिक समरस वाहिनी, 

प्रकृति परितोषिनी भूषणी,

स्वदेशीय सानुराग संधायिनी,

नागरिक कर्तव्य बोध प्रदायिनी,

विश्व बंधुत्व पारिवारिक पोषणी,

वंदे, वंदे, वंदे  भू-मातरम वंदे ।।


कोटि कोटि कंठों से गूंजे वंदेमातरम,

जन गण मन की वाणी है माँ तुझे प्रणाम,

स्वतंत्रता सेनानियों का मंत्र यह वंदेमातरम,

स्वराष्ट्रभक्तों का स्वाभिमानी तंत्र वंदेमातरम,

विकसित भारत का प्रेरणायंत्र यह वंदेमातरम,

वंदे वंदे वंदेमातरम जय भारत वंदेमातरम ।।

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    जय हो भारत माँ की लाडलियों
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जय हो विजय हो भारत माँ की पुत्रियों,

देश को गर्व है तुम पर प्रणाम लाडलियों,


यह देश वह देश है नारियां सब पर भारी है,

वह वीर नारी झांसी वाली व अहिल्याबाई है,

अपरा दुर्गा-रुद्रा-रणचंडी-महाकाली भी है,

खेल क्रिकेट में हरमनप्रीत शेफाली जेमी है।


यह अब अबला नहीं सबला महाबला भी है,

ज्ञान-विज्ञान चंद्रयान के उड़ान में भी यही है,

ऑपरेशन सिंदूर की रणाॅगना भी नारी ही है,

सुशील-संस्कारी-साहसी-संयमित सक्षम है।


खेल खेला पूरे लगन से मन मगन जतन से,

पग पग कई उतार-चढ़ाव पार किया साहस से,

होश ना खोया जोश ना छोड़ा हरदम मैदान से,

हर-मन-प्रीत बनाए रखा जीत देश की दिल से ।


नाज़ है तुमपर सरताज भारत माँ की लाडलियों,

देश का बच्चा बच्चा प्रणाम करता तुम्हें लड़कियों,

दुनिया में भारत का परचम लहराया सुधीर नारियों,

जय हो, विजय हो भारत माँ की प्यारी न्यारी पुत्रियों।


अरे कौन कहता वह उल्लू भारत में नारी का मान नहीं,

बदनाम कर रख दिया इतिहास में नारी का सम्मान नहीं,

धर-गृहस्थी में व्यस्त,सुस्त कर कहा यहां कोई वजूद नहीं,

चार-दिवारी में बंदी नहीं वह तो भारत माँ की बिंदी है।

वह तो आलोकित प्रज्ज्वलित भारत माँ के माथे की बिंदी है।

भारतीय नारी मेरे भारत माँ के माथे की बिंदी है । माथे की बिंदी है ।।

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©   डाॅ जमालपुरकर गंगाधर "गंध"

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श्री नीलकंठ नगर,.सब्जीमंडी हैदराबाद। 
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चलिए राष्ट्र को समर्पित करें अपनी कलम

हम सब मनायें आज़ादी का अमृत महोत्सव

 साहित्य से जुड़ने का अवसर, अपनी कविता/कहानी/साहित्यिक लेखों से प्रेरणा दें समाज को,,, 

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सुनील का संघर्ष और सफलता - (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के")

    (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "रंग - अक्षरों के") सुनील का संघर्ष और सफलता 💐.......................................