(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "कृतज्ञता कलम को")
चहुँ ओर युद्ध ही युद्ध
स्वार्थ ही स्वार्थ
पीडा ही पीडा
यहीं है आज का दुनिया की व्यथा
प्रकृति संपदा का विनाश
विश्व वर्चस्व की अंधी चाह में
मानवाधिकारों का हरण
रच रहे हैं नेता महा विनाश
रक्त धाराओं का तर्पण
रौद्र रणभूमि का दृश्य
शासकों के स्वार्थ एकपात्राभिनय है अद्भुत
शासित जनता के क्रंदन से
वेदना की कथा सजी
आँसू - आहें- करुण पुकारें
मानवता का आज लहुलुहान हुई
यही है आज विश्व का अंतहीन
रंगमंच का महान नाटक
जहां शांति मौन खडी रोती
वहाँ युद्ध बना है प्रधान।।
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© तुम्माला गिरिराज
एलूरु,
आंध्रप्रदेश।
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