(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन " कम्पन शब्दों का" )
कीमत चुकानी पड़ती है
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कहते है इंसान को हर बात की कीमत चुकानी पड़ती है
जो लड़ते है खुद के उसूलों के लिए
उन्हें भी अपनी लड़ाई की कीमत चुकानी पड़ती है
करो विश्वास किसी पर तो
आजकल भरोसे की भी कीमत चुकानी पड़ती है
करो किसी का भला तो आपको
आपकी दयालुता की कीमत चुकानी पड़ती है
यूंही नही कोई दुनिया से मुंह मोड़ लेता है
उसे दुनिया पर किए गए हर भरोसे की कीमत चुकानी पड़ती है
यूंही नही खिलते है चहरे मुस्कुराहटों से
उन्हें भी दर्द से भरे मन की कीमत चुकानी पड़ती है
खेल तो छोटा सा है जिंदगी का मगर
इसे जीने की भी एक कीमत चुकानी पड़ती है
यूंही नही चुना है इन वीरान रास्तों को हमने
इस में भी हर कदम की कीमत चुकानी पड़ती है
भीड़ से भरा हुआ हो शहर भले
पर मन के भीतर के शोर के आगे
इस शोर की भी कीमत चुकानी पड़ती है
करो मुसीबतों का सामना डट कर तुम
क्यों की फिर हारने की भी एक कीमत चुकानी पड़ती है l
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© वंदना रघु
8890524776
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