(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन " कम्पन शब्दों का" )
खुशी के पल
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विडंबना ऐसी की कह नही सकते
खुशी ऐसी की जिंदगी जीने की चाह है l
थक जाता है जब मन कहीं
रोज फिर से खुद को मजबूत करने की चाह है l
लाख सोचे दुनिया कुछ भी मगर
फिर भी आसमान में उड़ने की चाह है l
कहते तो लोग बहुत है की ये मत करो, वो मत करो
पर लोग मुझसे मेरी खुशियों का सौदा ना करे, ये उनसे कहने की चाह है l
टूटना और टुटके फिर से खड़ा होना
ये मेरी जिंदगी की चाह है l
सही क्या है ,गलत क्या है
ये नही पता
बस अब खुद के लिए जीने की चाह है l
दायरे,समय, मुश्किलें अब मुझे रोक नही सकते,
क्यों की मुझे खुद को ऊंचा उठाने की चाह है l
रिश्ते,नाते ,दोस्त , होता कोई किसी का नही
अब बस मुझे मेरे पथ पर चलने की चाह है l
लिखेंगे अब और भी कुछ क्यों की
इस अंतर मन को नया आईना दिखाने की चाह है l
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© वंदना रघु
8890524776
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