(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन " कम्पन शब्दों का" )
कुछ दोहे
धारा बन बहती रही,नदिया की वह धार।
बंजर धरती को करे, हरा भरा हर बार।
छोड़े शब्दो के वाण से, घायल मन पर तीर।
हाल पलट पूछा नहीं, कैसे हो तुम वीर।
घायल पंछी तड़प रहा, मृदु सरिता के तीर।
देख शिकारी खुश हुआ, डाला मुंह में नीर।
ममता भी घायल हुई, मां की देखो आज।
अपने प्यारों के लिए, बहुत उठाए नाज़।
सिमटी राहें प्रेम की, नफरत बोया बीज।
डर - डर कर सब रहे, मने न मन का तीज।
मेड़ तोड़ कर कर रहे, निजता का प्रारंभ।
प्रेम संस्कृति छोड़ कर, किया द्वेष आरंभ।।
बैठ खेत की मेड़ पर, देखे नभ की ओर।
धूप चमकती तेज है, नहीं मेघ का छोर।।
करती हूं मैं वंदना, अपने प्रभु से खूब।
फल जाए आराधना, जैसे फलती दूब।।
गरिमा अपनी भूलकर, करते सारे काम।
हो जाएंगे वो सदा, जग में फिर बदनाम।।
अपने वर्कर से सदा, लेते काम अधिक।।
दया धर्म बाकी नहीं, बनते सेठ धनिक।
देखा जब अवाक उसे, बात गए हम भूल।
आए लेकर हाथ में, खुशबू का जब फूल।
कलयुग में करती रही, धरती यही पुकार।
अशुद्ध भावों का सदा ,करो होम स्वीकार।
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© शगुफ्ता रहमान 'सोना'
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड
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