(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "डॉ ज्योति शर्मा" कृत साझा संकलन "चंचलता अक्षरों की" )
यह न मित्र भी अजीब बला होते हैं।सारे अधिकारों पर उनका स्वामित्व होता है। स्नेह का वेग ही कुछ ऐसा होता है कि आपको पता ही नहीं होता कि कब आपके निर्णय स्वयं ले आयें।कहाँ कितना योगदान देना है, किसको आर्थिक रूप से सहयोग करना है ,यह तो रजत को समझ आ सकता था।पर रजत कहानी लिखेगा और वह भी एक दिन में,सचमुच एक अटपटा सा सवाल था, जो रजत के मित्रों ने डाल दिया था और उपर यह कह देना कि हमने प्रकाशक को आपकी ओर से वायदा भी कर दिया है।
अभिमन्यु चक्रव्यू में था।कहानी कोई मेज़ पर पड़ी कोई वस्तु है नहीं, कोई ज़ेब में पड़ा काग़ज़ का टुकड़ा तो है नहीं कि निकाला और थमा दिया। भाव चाहिए, विचार चाहिए, परिस्थिति चाहिए और सबसे बड़ी बात एक चोट…..अंतःकरण को हिला देने वाली। पर ऐसा कुछ भी न था।मित्र शायद इस लिए वायदा कर आये कि बातूनी है,बैठा बैठा किस्से घड़ लेता है , तो वह कहानी भी लिख देगा।मैत्री तो ठीक है, पर विश्वास की यह पराकाष्ठा, आज रजत की परीक्षा थी। हाथ की तली को दूसरे हाथ की मुष्ठी लगातार ठोक रही थी।पर कहानी कहाँ ! विचारशून्यता से रजत जड़ था।पूरा दिन बीत गया कहानी ढूँढते ढूँढते ,कहीं नहीं मिली।दहेज,नारी,परिवार इत्यादि पर लिखूँ ,सोचता रजत किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाया।रात का अंधेरा ,मन,बुद्धि में भी पसर गया था।जब विषय ही नहीं था,कल्पना ही नहीं थी तो कहानी अपने सफ़र पर कैसे निकलती। मित्रों के फ़ोन बार बार आ रहे थे। जो शाम तक प्रोत्साहित कर रहे थे अब कोसने लगे थे।अपने वचन का स्मरण करवा रहे थे।कहानी उसके घर नहीं थी।कहानी…..कहानी…..कहानी ढूँढने उसने स्कूटर उठाया और बाज़ार की ओर चल दिया।मस्जिद, मंदिर चौराहे के पास तरबूज़ की रेहड़ी उलट गई थी।आते जाते बड़े वाहन तरबूज़ों को कुचल रहे थे।रजत ने स्कूटर रोका और सड़क को साफ़ करने लगा क्योंकि वह जानता था कि छोट्टे वाहन भी यहाँ से गुज़रते है।काफ़ी सफ़ाई कर दी थी कुछ होने वाली थी कि एक ट्रक के आ जाने पर वह थोड़ा हटकर खड़ा हो गया।ट्रक के निकलने की इंतज़ार ही कर रहा था कि एक स्कूटर जिस पर पति पत्नी और मासूम बच्चा सवार थे ज़ोर से टकराया। भगवान ने भी शायद कोई तरबूज़ का एक छिलका ढूँढ निकाला था,जो इस भयंकर हादसे का कारण बना।रजत एक भले मानस की गाड़ी
से इमरजेंसी में पहुँच गया। डॉक्टर एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे थे पता नहीं कि भगवान की एड़ी चोटी होती है कि नहीं ,पर यमराज लेने आ ही गया था।पति पत्नी के चेहरे को सफ़ेद चादर से ढकते हुए डॉक्टर ने रजत को शायद यही कहा होगा कि इनकी कहानी ख़त्म…..उसकी आँखों से टपकते हुए आँसू उस नन्हें से बच्चे के मुँह पर पड़ रहे थे,जिसकी कहानी आज के हादसे से शुरू हुई थी।
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© विजय कुमार शर्मा
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