Saturday, May 11

लिटरेचर ने मारा तुम्हें, तभी, प्रेमचंद के फटे जूते --- डॉ ज्योति शर्मा (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कृत साझा संकलन "चंचलता अक्षरों की" )

    (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कृत साझा संकलन   "चंचलता अक्षरों की"  )  






लिटरेचर ने मारा तुम्हें, तभी, प्रेमचंद के फटे जूते
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    नवमी कक्षा में ‘‘प्रेमचंद के फटे जूते’ हरिशंकर परसाई का व्यंग्य निबंध कई सालों से पढ़ा रही पर, हर बार कक्षा में पर हर बार इसका पाठ नया दिखता है। वर्ष के साथ बदले बच्चों के नए चेहरों की तरह | यही तो जादू है हरिशंकर परसाई जी के साहित्य का कि वह ताज़ा रहता है |

    तभी जिज्ञासावश किताब खरीदी जिसका एक निबंध इतना सुंदर है तो संकलन ही क्यों ना पढ़ा जाए।

    संपादकीय में ज्ञानरंजन जी ने खूब लिखा है“परसाई का माहात्म्य क्या है। इसके बावजूद कि सोवियत मॉडल टूट गया आज कलावादी मुहावरे सर्वाधिक मुरझाये हुए हैं। क्योंकि संसार में दुख, क्षय, हिंसा, भूख, पलायन, विकृतियाँ बाढ़ पर हैं । अब कलावादी मुहावरे अश्लील लगने लगे हैं। जो लोग दावा करते थे कि हम तो बस सहज झरनेदार लेखक हैं, हमें बाकी से कुछ लेना देना नहीं है आज बिलकुल पीले पड़ गये हैं। परसाई लिखने के अलावा उससे अलग जो अनिवार्य राजनैतिक कर्म करते हैं, जो उनके लेखन की आत्मा है वही उनको चमकाता है। उनका स्वाद लेनेवाले लोग भी दरकिनार हो गये, क्योंकि परसाई का स्वाद नहीं लिया जा सकता। उनका लेखन एक भयावह चित्रकथाओं वाला दर्पण है। संसार के अनेक रचनाकारों की तरह परसाई ने भी अपने लेखन के अलावा एक देशभक्त संग्राम लड़ा जो उनका माहात्म्य बढ़ाता है। अधिकांश रचनाकार इस तरह लिख रहे हैं जैसे लुड़कने वाला पत्थरहो। उन्हें अपनी भूमिका तैयार करने, एजेण्डा बनाने, इतिहास के परिवर्तनशील मार्गों पर डटकर अपना चेहरा दिखाने की जरूरत महसूस नहीं होती। वे आजीवन लिखते होते हैं और एक मुग्ध देहावसान उनका हो जाता है। अगर हमारे पास अपने संघर्ष के मुख्य विषय नहीं होंगे और हम मनुष्य के शत्रुओं से ही लड़ने के विषय माँगते-ढूँढ़ते रहेंगे तो यह एक बासी, ऊबा हुआ, मरियल और मन्द जीवन होगा। आजादी के बाद हिन्दी के समकालीन रचना-संसार में पक्षधरता तरल होती गयी। हमारे यहाँ टकराने और स्पष्ट तौर पर सत्ता के गलियारों में न जाने की गहरी और जबरदस्त परम्परा रही है। कबीर से निराला, मुक्तिबोध और परसाई तक। लेकिन नवआधुनिकतावादी इस तर्क और शैली को पलट देते हैं । वे सत्ता प्रतिष्ठानों पर कब्जा करने की व्यस्तताओं में, छलप्रपंचों में अपना पर्याप्त समयलगाते हैं |”वे आगे लिखते हैं,“बुनियादी तौर पर वर्ल्ड ऑफ एप्रिशियेशन में ही बहुत से घातक तत्त्व छिपे हैं। जिस समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं हुए भीतर से, उस समाज में साहित्य रसिक बहुत भोंडा और पाखण्डी हो गया है। वह बिना परिवर्तन के मजा लेना चाहता है। परिवर्तन के माध्यमों पर दुःखान्त और व्यंग्य का असर नहीं है। परिवर्तन गलत दिशाओं में हैं और सचेत सम्भावनाएँ जहाँ थीं वे उदासीन हो गयी हैं। प्रेमचन्द, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन और अनेक महारथियों ने अपनी-अपनी तरह से रास्ते बढ़ाने और मनुष्य को मुक्त करने के प्रयास किये, पर शिकंजा कसता ही गया। परसाई के रचने के बावजूद शिकंजा कमजोर नहीं हुआ। इसलिए लेखक की सफलता और असफलता को हम इस तरह नहीं आँक सकते। परसाई ने अग्रिम देखा, दूर दूर तक देखा और रचना में उसे अभिव्यक्त कर दिया। उन्होंने शिक्षण किया। यह उनका जबरदस्त पहलू है। इसके बाद जिन्हें इसे सँभालना और अग्रसर करना था वे उठ ही नहीं सके, गर्द में तब्दील हो गये । पसन्दगी की दुनिया रोज के भोजन जैसी हो गयी । पसन्द करनेवाला पढ़ता है, पसन्द करता है, वाह-वाह करता है और मर जाता है। वह जल्दी में है, उसकी रेलगाड़ी छूटती है। इस पसन्दकार ने अपनी उम्र किताब के वाल्यूम के बराबर या डिस्क की अवधि के बराबर घटा ली है। अब यह पसन्दकार भी पैदा नहीं हो रहा है।परसाई मुख्यतः जीवन-निर्माता थे। उन्होंने पता नहीं अपनी रचना और व्यक्तित्व से कितनों का निर्माण किया। व्यक्तित्व-निर्माण की प्रक्रिया बहुत जटिल और अमूर्त होती है । वह केवल खुली सामाजिकता के दम पर नहीं काम करती । परसाई का समग्र रूप अनूठा था । उनके पास स्मृति थी और तर्क । तर्क मनहूसी को काटता था और चपल विनोदवृत्ति तथा ठाठदार हास्य की शैली से आगेबढ़ जाता था। सातवें दशक के बाद जो लेखक थे और जो लेखक नहीं थे उन सब पर परसाई का साया पड़ रहा था । उमंग और आदर्श से भरे युवकों, विचारों से संयुक्त विभिन्न पार्टियों के कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्र-संघों के उद्दण्ड और दमदमाते नौजवानों, साहित्य के स्कूली पाठकों-सबके ऊपर परसाई कभी धूप कभी छाँव की तरह निखर रहे थे । यह सब तीस साल से अधिक समय में मैंने जबलपुर में नजदीक से देखा । परसाई को लोग मैटिनी आयडियल की तरह देखते थे। प्यार और भक्ति के समुद्र के बीच परसाई ने अपनी ज्वलन्त और मौलिक खड़ी बोली में भारतीय समाज की असंख्य पेण्टिग्ज़ बना डालीं। प्रेमचन्द के बाद वे हिन्दी में सबसे अधिक पढ़े जानेवाले रचनाकार हैं ।“

    प्रेमचंद को परसाई जी ने गहराई से समझा है जो इस निबंध की विशेषता रही है | साहित्यकार का आर्थिक संघर्ष पुराना है उसी के बारे में लिखते हुए हरिशंकर परसाई के शब्दों में ‘सम्पन्न फूहड़ता सुरुचि आखिर कैसे आकर्षित हो। साहित्यकार के यहाँ धन-लक्ष्मी का काम ? साहित्यकार के नाम की 'नेमप्लेट' तक क्या पढ़कर सड़क के बाजू हो जाती है।‘ ऐसा ही कुछ उल्लेख परसाई जी अपने लेख ‘लिटरेचर ने मारा तुम्हें’ में करते है। अपने व्यंग्य के लिए जाने, जानेवाले हरिवशंकर परसाई ने साहित्यकार और धन के बीच की खाई का बड़ा सहज पर सटीक वर्णन कि किया है। इस व्यंग्य को पढ़ते पढ़‌ते स्वतः याद आ जाता है 'प्रेमचंद के फटे जूते'क्या विचारों से साक्षात् उदित उदाहरण नहीं लगता? मुझे लगता है किस प्रकार प्रेमचंद साहित्यकार लिटरेचर या सामाजिक भाषा में हिन्दी लिटरेचर' ने नहीं मारा?फोटो खिंचाने गए मुँह पर हल्की मुस्कान और पाँव में फटा हुआ जूता उस फटे जूते के माध्यम से हरिशंकर परसाई, ने प्रेमचंद का जो चित्र खींचा वो उस फोटो से  अधिक सजीव, अधिक गहरा मामूल जान पड़ता है।परसाई जी के अनुसार‘टोपी से अधिक मूल्यवान हमेशा जूता ही रहा है। लोगों की प्रतिष्ठा उनके पैर में पड़े महंगे जूते से आँकी जाती है।‘ जितना महंगा जूता उतना बड़ा उस आदमी का कद। सामाजिक कद? आर्थिक कद ? पर बकौल परसाई जी“यह विडम्बना मुझेइतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं चुभी ,जितनी आज भी चुभ रही है जब फटा जूता देख रहा हूँ।मेरा जूता भी कोई अच्छा नहीं है।' शायद यह बात उस किस्से के संदर्भ में ‘लिटरेचर ने मारा तुम्हें’ में उल्लेख किया ,‘जब परसाई जी के एक व्यापारी मित्र ने उन्हें समझाया कि पैसे को पैसा खींचता है और इस सच का पता लगाने बीच बाजार एक पैसा सड़क पर फेंका। सोचते रहे अब बाज़ार के चक्कर लगाकर आएगा पर अपने साथ दस-बारह बनाकर आएगा ,आया नहीं।‘ आता भी कैसे ? साहित्यकार का पैसा था, व्यापारी. का नहीं। 

    साहित्यकार जैसे प्रेमचंद समझौता करते तो व्यापारी होते साहित्यकार नहीं बकौल परसाई जी 'तुम समझौता कर सके। क्या तुम्हारी भी वही कमजोरी जो होरी को ले डूबी, वही 'नेम-धरम' वाली  कमजोरी ? 'नेम -धरम' उसकी भी जंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुस्करा रहे हो, उससे लगता शायद ‘नेम-धरम' तुम्हारा बन्धन नहीं तुम्हारी मुक्ति थी। नेम -धरम वाले की आत्मा जिन्दा रहती जैसे प्रेमचंद की रही। तभी फटे साथ फोटो खिंचा डाला|

    'आत्मा' के संदर्भ में, हरिशंकर परसाई जी ने बड़ी सुंदर उक्ति दी है 'पगडण्डियाँ का जमाना’ में अच्छी आत्मा 'फोल्डिंग' कुर्सी की तरह होनी चाहिए । जरूरत पड़ी तब फैलाकर उस पर बैठ गये; नहीं तो मोड़कर कोने में टिका दिया। जब कभी आत्मा अड़ंगा लगाती है तब मुझे समझ में आता है कि पुरानी कथाओं में दानव अपनी आत्मा को किसी पहाड़ी पर तोते में क्यों रख देते थे। वे दूर उससे मुक्त होकर बेखटके दानवी कर्म कर सकते थे। देव और दानव में फर्क है एक की अब भी तो यही आत्मा अपने पास ही रहती है और दूसरे की उससे दूर।'

    प्रेमचंद ऐसे, साहित्यकारों में अग्रणी हैं, जिनकी आत्मा अभी भी पास है ,बहुत पास।सुरक्षित।जीवंत। तभी जूता घिसा नहीं हुआ। फटा है। परसाई जी के शब्दों में ‘तुम्हारा जूता कैसे फट गया? मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज जो परत-पर-परत सदियों से जमती गयी है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, अपना जूता आजमाया। तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो सकता जाता है। सभी नदियाँ पहाड़थोड़े ही फोड़ती है, कोई  रास्ता बदलकर घूमकर भी तो चली जाती है |’

    प्रेमचंद की जिंदा आत्मा ,नेम – धर्म वाली परसाई जी को आश्वस्त करती है कि प्रेमचंद रास्ते में पड़े टीले को ठोकर मारकर जूता फाड़ लेते हैं। फिर उस फटे जूते में फोटो भी खिंचवा रहे ।चेहरेपर मुस्कान के साथ | शायद यही विशेषता भी थी जो प्रेमचंद को लिकप्रिय बनाती है |

    ऐसे ही रास्ते में सड़क पर पत्थर को ठोकर मरने की हिम्मत केवल सच्चा लेखक ही कर सकता है| वरना, दुनिया सड़क से जाती ही नहीं लोग पगडंडी से निकल लेते हैं |

    शिक्षक होने के नाते समाज के वे लोग भी परसाई जी को मिलते हैं। जो पर्चा आउट करवाने या नम्बर बढ़वाने आते हैं। किन्तु परसाई जी की हैरत का कारण बदलते समय में इन की बदलती हुई हिम्मत है।वक्त के साथ लोगों में गलत काम करना एक रिवाज की तरह हो गया है , हिचकिचाहटहीन होते जा रहा हैं । पगडण्डियों का ज़माना, 'सीधा मेरी आँखों में देखता है अधिकारपूर्वक कहता है कि नम्बर बढ़वाने हैं दस सालों में यह जो प्रगति हो गयी है, यह मुझे परेशान करती है। भयंकर संकोचहीनता है यह। यह साहस मुझे डराता है। मैं इंतजार करता हूँ  कि कोई तो थोड़ा संकोच लेकर मैं कुछ आश्वस्त हो जाऊँ। कोई नहीं आता। मुझे लगता , हम सबने मान लिया कि आम सड़कें सब बन्द हो गयीं हैं।उन पर तख्ती टंगगयी है- “सड़क मरम्मत के लिए बन्द है।“ सालों से ये सड़कें हैं और सब पगडण्डियों से जा रहे हैं |

    साहित्यकारों पर सम्पादकों का दबाव साहित्यकार को अंदर तक दबा देती है। शायद आत्मा तक?

    अपने समकालीन साहित्यकारों पर तंज कसते हुए परसाई जी ‘जिन्दगीऔरमौत का का दस्तावेज' है। वे लिखतेहैं ‘सम्पादक चाहते हैं कि मैं मरूँ, तो मैं मर रहा हूँ। मेरे इस बयान के पत्रिका मुझे पैसे दे देगी। उन पैसों से कुछ समय जिन्दा रहूँगा! सम्पादकों की बात मैंने कभी नहीं टाली। वे कहें रो दो, तो मैं रो पड़ेगा। वे कहें कि नंगे हो जाओ, तो नंगा हो जाऊँगा। साहित्य में नंगेपन का अच्छा पेमेण्ट अच्छा होता है।' साहित्यकार का दायित्व बड़ा है।बकौल परसाई जी 'साहित्य का मूल उद्देश्य लोक शिक्षण है- चेतना देना, प्रेरणा देना'। साहित्यकार लोक मानव को शिक्षित बनाता है। सम्पादकों को आगे | झुका साहित्यकार ऐसा कभी कर सकता जितना यह परसाई जी के दौर में ऐसा असम्भव था आज भी नामुमकिन ही है। 

    परसाई जी को समझते पढ़ते हुए उनका आकाशवाणी पर दिया साक्षात्कार सुनने हुए को मिला। शायद, यह ज़रूरी भी था। किसी लेखक की कृति पर लिखना अलग है, अपनी समझसे लिखना अलग है  और साहित्यकार केमुखारविंद से उसके मन-मस्तिष्क को समझते का प्रयास अलग बात है। पहली बार महान और जो पुरखे हैं, हिन्दी-साहित्य के उनके मुख से से उनकी विचारधारा को समझने का मौका या कहें अप्रतिम मौका मिला। यहाँ विषय के अनुरूप ही बात आगे बढ़ाते  हैं।साहित्यकार संबंधी प्रश्न पर परसाई जी ने अपने एक साक्षात्कर में कहा है-“समाज को आगे जाने और पीछे ले आने का काम साहित्यकार के हाथ में है।“ उसका दायित्व, उसे समाज को प्रगतिशील बनाने को लेकर है या सम्पादक के दिए नोटों से जेब भरने को वह उपलब्धि मानता है। चुनाव का अधिकार तोउसी का है। पर, समाज के प्रति उसके उत्तरदायित्व से हटा क्या सच्चा साहित्यकार होगा? यह प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है।

    समकालीन साहित्यकारों हैं, 'जिन्दगी और मौत का दस्तावेज' में पर लिखते कहते हैं-‘मैने एक गलती और की। साहित्य सीढ़ी मानना चाहिए। मैंने उसे छज्जा मान लिया और जिन्दगी-भर सीढ़ी पर बैठा-बैठा छज्जों को देखता रहा। लोग मेरे सामने ही साहित्य की सीढ़ी से चढ़कर छज्जों पर जा बैठे। कोई बड़ा अफसर हो गया, कोई बड़ा सम्पादक, कोई विदेश विभाग में, कोई सांस्कृतिक सलाहकार। कोई कई प्रकाशक हो गये। उन्होंने साहित्य की सीढ़ी से छलाँग लगायी और छज्जे पर जा बैठे। मैं सीढ़ी पर बैठा रहा। मेरे अगल-बगल से लोग सीढ़ी चटते जाते रहे - ऊँचे और ऊँचे|’ आगे कहते हैं 'अच्छा लिखने की मेरी प्रबल इच्छा थी,पर अब वह धरी रह गयी। मैंने कई बार बड़ा और श्रेष्ठ उपन्यास लिखने की कोशिश की। इसके दो कारण थे। एक तो उपन्यास लिखे बिना कोई पक्का लेखक नहीं बन सकता। दूसरे, उपन्यास पकौड़े की तरह बिकता है। खूब पैसे हैं।' किन्तु, प्रेमचंद को नहीं मिले। सारा जीवन अभावहीनता में बीता। सम्पादक के लिए, उपन्यास के लिए ही शायद, खिंचवाया पर, जूते फटे। साहित्यकारों के  विषय में अपने पूर्व और समकालीन साहित्यकारों के विषय में अपने साक्षात्कार के तीसरे भाग में विचार 'शाश्वत लेखन’ पर परसाई जी साहित्यकार पर अपने विचार रखे। जिसका उल्लेख ‘पवित्रता का दौर’ में भी मिलता है। परसाई जी लिखते हैं. 'ये पवित्र लोग और पवित्र ही लिखने वाले लोग बड़े दिलचस्प होते हैं। एक मुझसे बार-बार कहते -आप अब कुछ शाश्वत साहित्य लिखिए। मैं तो शाश्वतसाहित्य ही लिखता हूँ। वे सट्टे का फिगर रोज नया लगाते थे, मगर साहित्यशाश्वत लिखते मुझे वाल्मीकि की तरह बमीठे में दबे हुएलगते थे।शाखत साहित्य लिखने का संकल्प लेकर बैठने वाले मैंने तुरन्त मरते' देखे है।'परसाई  जी के अनुसार साहित्य में तत्कालीनता आवश्यक है |उसी से सार्वकालिकता आती है | सार्वकालिकता ही मूल उद्देश्य होना चाहिए | कहने से या कह कर लिखने से शाश्वत साहित्य लिखना न संभव है और ना हो सकता है |


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©  डॉ ज्योति शर्मा 

राजकीय आदर्श उच्च विद्यालय

सैक्टर ३६ डी 

चंडीगढ़ 

ईमेल:jyotisharma877@yahoo.com

7696236333


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