(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")
घुंघराले बाल, नुकीली नाक
काले रंग की चमक
देखने में नहीं लगता इतना आकर्षक
फिर भी देखते-देखते बना मनमोहक
तुम्हारी ऑंखों में दिखते अनेक रंग
देखते उनको मेरा मन चाहता तेरा संग
तेरे संग की कल्पना में बीतता एक युग
लेकिन नहीं होता पूरा मेरा राग।
सच है मेरे दिल का धड़कन तुम
मेरी ऑंखो का रूप तुम
मेरे श्वासों का नाम तुम
मेरे विचारों का सूझ तुम
अब तो मैं नहीं मैं, बना तुम
ऐसा बढ़ गया मेरा दम
क्या कहूॅं क्या बोलूॅं न तो मैं युवक
न तो तुम युवती।।
अरे यार मैं तो पहचाना,
आप केवल नहीं चाहते आईना।
मगर मैं कैसे प्रकट करता तुम्हारी चाह,
निकलेगी वह तुम्हारे मुंह से मेरी इंतजार यह।।
पूछो अपने दिल से क्यों पड़ गई है उसमें दुविधा,
पूछो बार-बार उससे क्या है उसकी इच्छा,
चाहती क्या वह पथ का साथी या राग का साथी,
चाहती क्या वह तन का साथी या दिल का साथी।।
लगेगा तुमको बहुत समय इसकी सोच में,
कह सकता मैं तुम नहीं ठानोगी इस विषय में,
क्योंकि ना तो तुम युवती ना तो मैं युवक,
ना तुझ में जवानी न मुझ में युवकपन।।
© N. Venkat
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