Tuesday, May 7

राष्ट्रभाषा के रूप में समृद्ध एवं समर्थ हिंदी - डॉ. रश्मि चौबे (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन " कम्पन शब्दों का " )

  (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन   कम्पन शब्दों का "   )  





 राष्ट्रभाषा के रूप में समृद्ध एवं समर्थ हिंदी 
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    सुमित्रानंदन पंत जी ने कहा कि,  – हिंदी हमारी राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्त्रोत है। अतः भाषा की रक्षा करना सीमा की रक्षा करने जैसा है ।

    आज का विषय "राष्ट्रभाषा के रूप में समृद्ध एवं समर्थ भाषा हिंदी" है । भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में २२ भाषाएं हैं। १४ सितंबर १९४९ को संविधान सभा ने एकमत से निर्णय लिया कि,  हिंदी भाषा राजभाषा होगी और उसकी लिपि नागरी लिपि होगी । १९५३ से औपचारिक रूप से हिंदी दिवस मनाया जाने लगा । उद्देश्य है कि,  हिंदी भाषा का प्रचार – प्रसार किया जा सके । इस दिन हिंदी ना बोलने वाले भी हिंदी बोलते हैं , पढते हैं किताबें प्रकाशित होती हैं।  हिंदी की काव्य गोष्ठी और संगोष्ठी एवं अन्य प्रतियोगिताएं होती हैं और ऐसा लगता है जैसे,  त्यौहार है । मानो तो दिन है हिंदी , जानो तो जिंदगी है हिंदी । राष्ट्रभाषा का प्रयोग , किसी देश के निश्चित भूभाग में रहने वाले  लोगों द्वारा होता है । प्रत्येक राष्ट्र का स्वतंत्र अस्तित्व होता है।  देश की एकता बनाने के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता होती है । जिसका प्रयोग संपूर्ण राष्ट्र के महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए किया जा सके और वहां के लोग इसे आसानी से बोल सकें,  सीख सकें ऐसी व्यापक भाषा राष्ट्र भाषा कहलाती है । जो संपूर्ण राष्ट्र के लिए संपर्क सूत्र होती है जैसे फ्रांस में फ्रेंच , इंग्लैंड मैं अंग्रेजी,  जर्मन में जर्मनी और भारत में ऐसे ही हिंदी सर्वाधिक बोली जाती है ।  १९१८ में हिंदी साहित्य के सम्मेलन में इंदौर में सभापति पद पर भाषण देते हुए गांधी जी ने राष्ट्रभाषा के लिए हिंदी का समर्थन किया । कहा कि, हमारे देश में संपर्क भाषा के रूप में स्थापित होने वाली भाषा अगर कोई है तो वह है हिंदी भाषा ।

    निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ऐसा भारतेंदु हरिश्चंद्र जी कहते थे कि, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल।

    हिंदी को हम लिखते बोलते १२० साल से हैं पर उसकी जड़ें ३५२० साल पुरानी है १९०० ईस्वी में किशोरी लाल गोस्वामी जी ने इंदुमती कहानी लिखी हिंदी में , १९१३ में भारत वर्ष का इतिहास , १९१५   में जगत वृतांत भूगोल । १९५०  ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी , रामकुमार वर्मा आदि ने इसका प्रचार- प्रसार किया। 

    इस भाषा को इस तरह हम आजादी के आंदोलन में देख चुके हैं । जहां पर विचारों में क्रांति लाने के लिए अंग्रेजों से लड़ने के लिए समाचार पत्रों को हिंदी में निकाला । पूजनीय तिलक जी ने मराठा और केसरी नामक अखबार निकाले । अकबर इलाहाबादी ने कहा कि,- जब तोप काम नहीं करे तब अखबार निकालो।

    सबसे बड़ी बात हिंदी भाषा में यह है कि,  वह तत्सम , तद्भव , देशज , विदेशी सभी शब्दों को अपनाकर व्यक्ति के भाव अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाती है।  वहीं यह साहित्यकारों के लिए रस और अलंकार से सजकर  के अभिव्यक्ति का उत्तम माध्यम बन जाती है और उसमें चार चांद लगा देती है । अतः इसे हम बच्चे की तरह देखते हैं,  तो कहीं ये स्त्री विमर्श की साक्षी है,   तो कहीं इतिहास को पढ़ें तो बूढ़ी काकी लगती है । इस प्रकार चाहे वह वैज्ञानिक हो,  लेखक साहित्यकार हो , कंप्यूटर के लिए हो  इस तरह से अलग अलग  रंग रूपों में हमें देखने को मिलती हैं । हिंदी सबके लिए समझ  आए वही है।  फिल्मों में , विज्ञापनों में,  गानों में,  दूरदर्शन , वीडियो,  आदि  में और यही नहीं आज कल समाचार पत्र किताबें नेट पर भी उपलब्ध होती है । इस तरह यह भारत ही नहीं बल्कि विश्वव्यापी हो गई है । 

    इन सब के लिए हमारी सरकार एवं शिक्षा मंत्रालय,  राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना जैसी संस्थाओं,  विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान आदि संस्थाओं के योगदान को भी नहीं भुला सकते  । नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषा में शिक्षा देने को कहा है ।

    हिंदी लेखन में यूनिकोड आने से क्रांतिकारी परिवर्तन आ गए । यही नहीं विश्व की २४ से अधिक भाषाओं के अनुवाद  आसानी से कंप्यूटर पर कर सकते हैं । कुछ लोग हिंदी भाषा की शक्ति को जानते हुए प्रांतीयता के कारण उसकी टांग खींचने में लगे रहते हैं । ऐसा नहीं होना चाहिए । हमें हिंदी भाषा की तकनीकी ज्ञान को सीखना होगा । इसे रोजगार परक बनाना होगा।  तभी इस तरह की गोष्ठियों के सकारात्मक परिणाम मिलेंगे ।  इसे जन-जन की भाषा बनाना होगा । मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं जो,  अंग्रेजी का निबंध देवनागरी लिपि में लिखकर याद करते थे और ऐसे भी जो गर्मी में शादियों में कोट  पहन कर आते हैं तो सोच को परिवर्तन कर हमें हमारी भाषा पर लोगों को गौरवान्वित महसूस करना  सिखना होगा और रोमनीकरण को रोकना होगा। कठिन शब्दों के प्रयोग से  बचना होगा नहीं तो हिंदी संस्कृत बन जाएगी । साहित्य कौन पड़ेगा । रोजगार परक बनाना होगा। आज के लिए कहूंगी कि,  हिंदी सरल , सुपाठ्य , सुग्राह्य और अंतरराष्ट्रीय बनने योग्य है । यह अ से अनार से ज्ञ से ज्ञानी तक हमें ले जाती है ।  हमारी संस्कृति को सहेजने के लिए हमें हिंदी को महत्व देना चाहिए । कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भ्रमण करने वाले लोग इसे सीखते हैं ।  

    अंबेडकर जी ने तो यहां तक कहा था कि, – हिंदी भाषा के लिए मराठी भाषा का बलिदान देने को तैयार हूं ।

    राष्ट्रभाषा के बिना देश गूंगा। हिंदी को विदेशों में  महत्व दे रहे हैं ऐसे,  प्रवासी भारतीय साहित्यकारों को  भी हमें प्रणाम करना चाहिए।  

    जय हिंदी जय नागरी।


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डॉ. रश्मि चौबे

बाल सांसद राष्ट्रीय प्रभारी एवं प्रतिनिधी गाजियाबाद , 

विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज, 

उत्तर प्रदेश, भारत

99585 94919

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