(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *कम्पन शब्दों का* साझा संकलन से)
हार गया मैं इस, जिन्दगी के खेल में।
कागज गत्ते बिन रहा, गंदगी के ढेर में।
1
बचपन में माता छूटी, उठा पिता का साया।
मुझ गरीब पर किसी को, तरस नहीं आया।
अनाथ हूं मैं इस, किस्मत का मारा।
ढूंढ रहा अब भी, जीवन का सहारा।
पढ़ने की इच्छा, पर पढ़ायेगा कौन।
मेरे इस प्रश्न पर, ये दुनिया है मौन ।
हार गया मैं इस, जिन्दगी के खेल में।
कागज गत्ते बिन रहा, गंदगी के ढेर में।
2
बड़े लोग घूम रहे हैं, मस्त होकर कारों में।
कुत्ते सारे ऊंचे हैं, उनकी भी निगाहों में।
मुझसे तो अच्छे हैं, अमीरों के कुत्ते।
खाने को उसके पास, रोटी तो होते।
मेरा भी जन्म अगर, कुत्ता हुआ होता।
चौराहे की जगह, महलों में सोया होता।
हार गया मैं इस, जिन्दगी के खेल में।
कागज गत्ते बिन रहा, गंदगी के ढेर में।
3
मन में उमंग और, दिल में है निराशा।
गरीब बच्चा कुछ कह रहा, समझो उसकी भाषा।
भूख से तड़प रहा पर, लगा रहा है नारा ।
मानवता का दीप जला दो, जो मूल मंत्र है हमारा ।
हार गया मैं इस, जिन्दगी के खेल में।
कागज गत्ते बिन रहा, गंदगी के ढेर में।
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© चन्द्रहास सेन शिक्षक
ग्राम व पोस्ट कोसरंगी, थाना खरोरा
जिला रायपुर छत्तीसगढ़
पिन 493225
9752468692
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