(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *कम्पन शब्दों का* साझा संकलन से)
घर का कोई अता है ना पता
बस ऐसे ही घर मे रहने निकल पड़े
ठीक से पढ़ना आता ना लिखना
बस ऐसे ही नौकरी करने निकल पड़े
घर मे माँ का ना बाप का ठिकाना
बस ऐसे ही रिश्ते जताने निकल पड़े
रसोई मे चावल रहता ना दाल बराबर
बस ऐसे ही अपनो को खिलाने निकल पड़े
नये कपड़े सिलाये ना तरह तरह के भोजन
बस ऐसे ही त्योहार मनाने निकल पड़े
बारात मे दुल्हन का पता ना दुल्हे का
बस ऐसे ही शादी के सात फेरे लेने निकल पड़े
एलक्शन मे ठीक से प्रचार किया ना पैसा बाटा
बस ऐसे ही मिनिस्टर बनने निकल पड़े
कभी बीज बोया ना पौधे को पानी डाला
बस ऐसे ही फल खाने निकल पड़े
सिमेंट खरीदे ना ईंट ना लोहा लाया
बस ऐसे ही अपार्टमेंट बनाने निकल पड़े
हाथ मे आधार कार्ड रहता ना टिकट
बस ऐसे ही यात्रा करने निकल पड़े
मैदान मे एक रन बनाया ना विकट लिया
बस ऐसे ही वल्ड कप लेने निकल पड़े
बच्चो को पढ़ाया ना लिखाया ना पाला - पोसा
बस ऐसे ही बुढ़ापे मे सहारे के लिए निकल पड़े
किसी को कुछ दिया ना भला किया
बस ऐसे ही भगवान से कामना करने निकल पड़े
💐💐💐💐💐💐
© के कृष्णा कुमारी
97042 09042
----------------------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363
.jpeg)
No comments:
Post a Comment