(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का" )
पहला वसंत जब आया था
तुम ही ने भान कराया था!!
भोली , अल्हड़ अनजानी सी
यौवन बगिया में रंग भरे
नित उठ उमंग की बाहों में
अहसास के पंछी गले मिले
तुम ही ने पल छिन
महक महक आंचल मेरा महकाया था
पहला ------------!
फूलों के हंसने खिलने का
अहसास तुम्हीं ने करबाया
मीठे सुन्दर नव सपनों को
आकाश तुम्हीं ने दिखलाया
मधुरितु से मधुघट छीन छीन
मेरे ऊपर लुढ़काया था
पहला -------------!
वे तन्हा दिन तन्हा रातें
बहुत भले से लगते थे
बातें करते करते दोनों
उस प्रेमनगर में उड़ते थे अंधियारी रातों मेंतुमने उजियारा दीप जलाया था
पहला -----------------!
हम समय की वीणा पर दोनों
नवजीवन गीत बजाते थे
फिर नव लय स्वर में
इक दूजे के
उनगीतों को नित गाते थे
चाहत के वंदनवारों से मन देहरी द्वार सजाया था
पहला ----------------!
हम जोश में थे पर होश में थे
मदहोशी अपनी चाह़ों में
आंखें प्यासी सी रहतीं थीं
रहते थे नजर की बाहों में
जाने कैसा ये जादू था जो
सर चढ़ कर मंडराया था
पहला --------------------!!
💐💐💐💐💐💐
© रमा वर्मा श्याम
आगरा
मो.9760501022
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