(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का" )
किसी से टूट कर जुड़ना ,
तपस्या ही तो है मेरी।
खुशी हो ,गम हो या कोई
अधूरा सा फ़साना हो,
सहज ही सब को ले लेना,
तपस्या ही तो है मेरी।।
तुम्हारे प्रेम की बारिश में
इतना भीगी हूं अब तक,
तुम्हारी सांसों की खुशबू में
इतना डूबी हूं अब तक,
तुम्हारे संग चलना ही
तपस्या ही तो है मेरी।
किसी से टूट कर जुड़ना
तपस्या ही तो है मेरी।।
तुम्हारा हाथ थामा जीवन के
हर एक मोड़ पर मैंने,
तुम्हारे संग बांधे बंध
हर एक तोड़ पर मैंने,
तुम्हारे प्रेम की डोरी में बंधना
तपस्या ही तो है मेरी।
किसी से टूट कर जुड़ना
तपस्या ही तो है मेरी।।
तेरी हर बात को मन में
संजोकर रख लिया मैंने,
तेरी आंखों की भाषा को
समझ कर जी लिया मैंने,
तेरी परछाईं बन तेरे साथ -साथ चलना,
तपस्या ही तो है मेरी।
किसी से टूट कर जुड़ना
तपस्या ही तो है मेरी।।
हमारी रूहों का रूहों से
मिलना हो गया ऐसे,
गगन के चंद्रमा में चांदनी
सिमटी हुई जैसे,
तुम्हारे रंग में ढ़लना
तपस्या ही तो है मेरी।
किसी से टूट कर जुड़ना
तपस्या ही तो है मेरी।।
💐💐💐💐💐💐
© डॉ सुनीता चौहान
आगरा
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