(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन " स्वराभिषेक विचारों का " )
प्रकृति
है मनोहारी ये रूप तुम्हारा
मनमोहित कर देता है!!
जब जब मैं तुमको देखूं
विस्मय से भर देता है!!
तेरी ममता के आंचल में
जीवन सुफलित हो जाता है!!
बचपन यौवन और जरा
तेरी गोद में ही सो जाता है!!
हे करूणा मयी प्रकृति माता
हर क्षण तेरा संग होता है !!
हर जीव का तेरी प्रेम भरी
छाया में पालन होता है!!
हे ममतामयी माता मेरी
जग तुझमें ही स्वप्न संजोता है!!
तेरी ही दया से चराचर जगत
निर्भय होकर सोता है!!
तेरी माटी में ही लहलह
धनधान्य देख मुस्काता है!!
सृष्टि का हर एक प्राणी
आधार तुम्हीं से पाता है!!
कैसे बखान हो कृपा का तेरी
मेरा कंठ रूद्ध हो जाता है!!
तेरे उपकारों का बदला
हमसे न चुकने पाता है!!
तेरी मूरत सुंदर मनहर
मानव तुझ में ही खोता है!!
तेरे रूप की ऐसी माया है
संसार चकित होता है!!
सृष्टि के हर एक कण में
संचार नवल होता है!!
हर एक प्राणी से माता तेरा
संबंध प्रबल होता है!!
है बारंबार नमन, तुमको पाकर
मेरा भाग्य सबल होता है !!
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मनीषा सूर्या
89592 98484
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