Monday, April 8

सांप्रदायिकता और भारत विभाजन-मंटो की 5 कहानियों के दृष्टिकोण से (ख़ुदा की कसम, सहाय, मूत्री, भाई नानकी, शहीद-साज) - प्रो. गीता यादवेन्दु (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का" )

  (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन   "स्वराभिषेक विचारों का"  )  




  सांप्रदायिकता और भारत विभाजन-मंटो की 5 कहानियों के दृष्टिकोण से (ख़ुदा की कसम,सहाय,मूत्री,भाई नानकी,शहीद-साज)
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    सआदत हसन मंटो उर्दू के एक ऐसे कहानीकार हैं जिनकी कहानियों ने हंगामा खड़ा कर दिया था ।समाज बिलबिला उठा था,क्योंकि तथाकथित सभ्यता का चोला ओढ़े हुए समाज नाम की इस संस्था की नंगी सच्चाई जब सामने आ जाए ,तो उसका बिलबिला उठना स्वाभाविक ही है।

    मंटो का जन्म 11 मई सन् 1912 को समराला ज़िला लुधियाना (पंजाब) में हुआ था । उनकी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में हुई । एक पत्रकार अब्दुल वारी साहब के प्रभाव में आकर उन्होंने विक्टर ह्यूगो,पुश्किन,गोर्की,ऑस्कर वाइल्ड,मोपांसा को पढ़ने और समझने का प्रयास किया । सन 1934 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया और वे उर्दू में मौलिक कहानियाँ लिखने लगे । अलीगढ़ पत्रिका के मार्च 1935 के अंक में उनकी कहानी 'इंकलाब पसंद' प्रकाशित हुई । ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों को शील-अश्लील के दायरे में हम छद्मत्ता पसंद मनुष्यों ने बाँटा और मंटो ने इन्हें बिना भेद के उजागर किया । उनकी कहानियाँ मनुष्य के जीवन की वे सच्चाइयाँ हैं ,जो मनुष्य के भीतर छिपे शैतान को दिखाती हैं । मानव की उस प्रकृति को उजागर करती हैं ,जिसे वह दिन के उजाले में ख़ुद अपनी आत्मा की आँखों से भी देखने से इनकार कर देता है 

    मंटो ने भारत-विभाजन की त्रासदी को देखा और अपनी कहानियों में उजागर किया । प्रस्तुत लेख में मंटो की पाँच कहानियों-"ख़ुदा की कसम,मूत्री,भाई नानकी और सहाय" के माध्यम से सांप्रदायिकता और भारत विभाजन को जैसा मंटो ने देखा,समझा और वर्णित किया अर्थात् सआदत हसन मंटो के दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया गया है । त्रासदी के समय में ही मनुष्य और मानवता का वास्तविक रूप उजागर होता है और अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि यह रूप बड़ा ही भयानक,वीभत्स और अफ़सोसजनक होता है और मनुष्य के बुद्धि,विवेक और मानवीयता की प्रकृति पर प्रश्नचिन्ह खड़े करता है ।


1. ख़ुदा की कसम

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    ‘ख़ुदा की कसम ‘कहानी में मार्च सन् 1948 का समय दर्शाया गया है । हिन्दू और मुसलमान इधर-उधर आ-जा रहे हैं । शरणार्थियों से कैम्प भरे पड़े हैं । इस त्रासदी का सर्वाधिक असर लड़कियों और औरतों पर दिखाई पड़ रहा है । इसी बीच कहानी में एक बूढ़ी औरत की दास्तान सामने आती है । जो अपनी इकलौती बेटी को ढूँढ रही है । उसको पूरा यकीन है कि उसकी लड़की जीवित है । उसे कोई कत्ल कर ही नहीं सकता क्योंकि वह अत्यंत ख़ूबसूरत है । वह माँ अपनी बेटी को निरंतर ढूँढती है और  ऑफिसर को कई जगह मिलती है और हर बार उसकी हालत पहले से बदतर होती जाती है ,लेकिन उसका यकीन कायम रहता है कि उसकी बेटी ज़िंदा है क्योंकि उसे कोई कत्ल कर ही नहीं सकता है । अमृतसर के फ़रीद चौक में लेखक को वह बूढ़ी औरत दिखाई देती है-साथ ही एक सिख युवक के साथ एक ख़ूबसूरत लड़की भी । सिख युवक उस ख़ूबसूरत लड़की को पगली बूढ़ी औरत को दिखाता है और कहता है कि वह तुम्हारी माँ है । लेकिन वह लड़की अपनी माँ को न पहचानकर उस सिख युवक को वहाँ से खींच ले जाती है। वह माँ अपनी बेटी को पहचान जाती है । लेखक भी समझ जाता है लेकिन वह पगली बूढ़ी औरत से ख़ुदा की कसम खाकर उसे समझाता है कि उसकी बेटी मर चुकी है । और वह पगली भी अमृतसर के उसी फ़रीद चौक में ढेर हो जाती है । उसका यकीन मर जाता है ,तो वह भी मर जाती है ।

    यह हृदयविदारक कहानी पाठक के कलेजे को चीर कर रख देती है । एक माँ जिस विश्वास की लौ के सहारे जीवित थी ,जब वह लौ ही बुझ जाती है ,तो उसके प्राण-पखेरू भी उड़ जाते हैं । जिस बेटी की तलाश में वह दर-दर भटक रही थी और अपने यकीन को बनाए हुए थी,जब वही बेटी अपने सामने से अपनी माँ को अनदेखा कर अपने प्रेमी के साथ खिसक जाती है ,तो उस माँ का विश्वास टूट जाता है । वह विवश हो कर लेखक की बात मान लेती है कि उसकी लड़की मर गई और उसके अपने प्राण भी छूट जाते हैं ।

    क्या मनुष्य इतना स्वार्थी होता है.....? हाँ मनुष्य इतना ही स्वार्थी होता है.....! यही कहती है कहानी....और यही जीवन का सत्य भी है । जिसने इस सत्य को जान लिया,स्वीकार कर लिया वही सुखी हो जाएगा और सुकून  के साथ अपना जीवन जी सकेगा । यही कहती है कहानी । इसलिए कोई माँ अपनी औलाद के इंतज़ार में न मरे और न कोई और । ये जीवन जिसका भी है वो उसे अपने लिए जिये ,किसी से कोई आस या उम्मीद न रखे.....!" यही इस कहानी 'ख़ुदा की कसम' का अंतिम सत्य या निचोड़ है ।


मूत्री

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    मूत्री यानी कि पेशाब करने का स्थान.....! यह बम्बई में कांग्रेस हाउस और जिन्ना हाल से थोड़ी ही दूर है । यहाँ भयंकर बदबू और गंदगी है और लेखक नाक पर रुमाल रखकर वहाँ जाता है । यह बदबू सिर्फ़ पेशाब की नहीं सोच की भी है । कांग्रेस हाउस और जिन्ना हॉल पर सरकार का कब्ज़ा है लेकिन यह पेशाबगाह आज़ाद है......अपनी बदबुओं को फैलाने के लिए....! तभी तो   पेशाबघर की दीवारों पर कोई लिखता है.….

    "मुसलमान की बहन का पाकिस्तान मारा ।"

    तो कोई ज़वाब में लिखता है

    "हिंदुओं की माँ का अखंड हिंदुस्थान मारा ।"

    पेशाबघर की बदबू और गंदगी में आदमी की धर्म के नाम पर पल रही सोच की बदबू भी मिल जाती है ।

    महात्मा गाँधी रिहा होते हैं । जिन्ना की पंजाब में पराजय होती है ।  जिन्ना हॉल और कांग्रेस हाउस जो पाकिस्तान और भारत के प्रतीक हैं.......उन पर सरकार का कब्ज़ा रहा और मूत्री या पेशाबघर इन सत्तानशीनों की धर्म के नाम पर फैलाई गई नफ़रत की बदबू से बज़बज़ाता रहा, जो इन दोनों देशों की जनता का प्रतीक है । चाहे पाकिस्तान बना या भारत, बँटा तो हिंदुस्तान ही जो एक था, अखंड था और इसीलिये पेशाबघर की दीवार पर कोई लिख जाता है ।

    "जिन्ना की बहन का पाकिस्तान मरा । हिंदुओं की माँ का अखंड हिंदुस्तान  मरा । दोनों की माँ का हिंदुस्तान मरा ।"


शहीद-ए-साज

***

कहानी गुजरात के काठियावाड़ के एक बनिये की है ,जो हिंदुस्तान-पाकिस्तान फ़साद के समय बेकार था और जब बँटवारे के समय हज़ारों लोग पाकिस्तान जा रहे थे ,वह भी कोई धंधा करने का विचार लेकर पाकिस्तान चला जाता है । पाकिस्तान पहुँचकर वह पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में मकान-दुकान अलॉट कराने का धंधा करने लगता है । धंधा अच्छा चल जाता है और वह अमीर हो जाता है ।

    "उसके पास सब कुछ होता है पर सुकून नहीं.....!"

    "सुकून कहाँ से आएगा....!" 

    कहानी एक व्यंग्य है । एक मुनाफ़ाखोर बनिया जो अपने स्वार्थ व फायदे के लिए लोगों की जान लेता है और उन्हें शहीद का दर्ज़ा दिलवा देता है और फ़िर अपने ख़ुद के ही तर्क गढ़ कर अपनी करनी को ख़ुद ही अपनी दृष्टि में सही सिद्ध कर लेता है । यह मानसिक रुग्णता की निशानी है ,पर समाज में ऐसे लोग बहुत होते हैं जो छद्मत्ता का शराफ़त का आवरण ओढ़े समाज में संपन्नता के आधार पर सम्मानजनक स्थान बनाए हुए रहते हैं और भीतरी तौर पर निकृष्ट कुकृत्य करते रहते हैं । वास्तव में ये लोग मनोरोगी होते हैं और यह उनकी प्रकृति होती है ,जिसका बहुत ही सटीक मनोविश्लेषण मंटो की इस कहानी शहीद-ए-साज में किया गया है ।

    एक चालाक व्यक्ति जो भारत में बेकार था,विभाजन के समय पाकिस्तान चला जाता है एवं परिस्थितियों का फ़ायदा उठा कर स्वयँ को वहाँ स्थापित कर लेता है । बेईमानी से धन बनाता है और ख़ुद को दयालु,दानी,पुण्यात्मा भी सिद्ध करना चाहता है,जो कि वह है नहीं लेकिन उसको स्वयँ को महान व प्रसिद्ध सिद्ध करने की असीम भूख है । अतः अपने पापों को भी अपने ही तर्कों के द्वारा स्वयं ही पुण्य सिद्ध कर ख़ुद को सही सिद्ध कर संतुष्ट करता है । कहानी इस तरह के मनुष्यों की प्रवृत्ति का सटीक, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती है । मंटो मानव मन की थाह ले लेते थे और यही उनके लेखन की सबसे बड़ी ख़ूबी है । हमारे इस मनुष्यों के समाज में तरह-तरह के मनुष्य और तरह-तरह की उनकी मनोवृत्तियाँ हैं । दुष्कर्मी,पापी,मनोविकारों से ग्रस्त लोग जो साधन संपन्न हैं और सभ्यता का आवरण ओढ़ कर समाज में  विधमान हैं और अपने कुकृत्यों को छद्म रूप में अंजाम देते रहते हैं और बड़े आत्मविश्वास से यकीन करते हैं कि उनका वास्तविक रूप कोई नहीं जानता और न कभी सामने आएगा और ना ही कभी उन्हें उनके कुकर्मों की सजा मिलेगी....! मानवीय प्रकृति और प्रवृत्ति को समझ कर उसे हमारे समक्ष कटु यथार्थ अथवा व्यंग्य के रूप में मंटो इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि लगता है कि मनुष्य का छद्दम आवरण पूरी तरह से उतर गया है और वह अपने पूर्णतः,यथार्थ-नग्न रूप  में संसार के सामने आकर खड़ा हो गया है और हम हतप्रभ से देखते रह जाते हैं उस सच्चाई को अपने समक्ष देखकर....!


4. माई नानकी

***

माई नानकी जम्मू में रहने वाली एक महिला है जिसकी कहानी लेखक ने बताई है । माई नानकी ख़ुद को जम्मू-कश्मीर क्षेत्र की सबसे बड़ी दाई बताती है । जहाँ भी किसी औरत को बच्चा पैदा होने में कोई कठिनाई होती है उसे बुलाया जाता है । बड़े-बड़े लोगों से उसका परिचय और अच्छी आमदनी है । वह बड़ी निष्ठुर भी है । वह खुद ही बताती है कि उसने अपने ख़ुद के बच्चे को पैदा होते ही इसलिए मार डाला था ,क्योंकि उससे उसका रोना बर्दाश्त नहीं हुआ था । इसी बीच भारत-पाकिस्तान का बँटवारा हुआ और कश्मीर में हिन्दू-मुस्लिम कत्ले-आम शुरू हो गया ।नानकी द्वारा पाले गए सब लोग उसे छोड़ कर भाग जाते हैं । वह जान बचाने के लिए ईसाइयों के मुहल्ले में जाती है ,जो उसे पाकिस्तान जाने की सलाह देते हैं । उसी समय जम्मू के महाराजा का नानकी को बुलावा आता है ,जो नानकी को भारत में ही रखना चाहते हैं और उससे पाकिस्तान न जाने को कहते हैं किंतु नानकी को रश्क(घमंड) हो जाता है और वह कहती है कि वह पाकिस्तान ज़रूर जाएगी । वह सरहद पार कर पाकिस्तान में प्रवेश कर जाती है ,जहाँ वह शरणार्थियों के शिविर में पाकिस्तानियों को जवान लड़कियों से बदतमीज़ी करते हुए देखती है । उसे पता चलता है कि उसके कुनबे के 18 लाड़ले मार दिए गए । पाकिस्तान आकर उसकी सब ठाठ-बाट की ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है । और मान-सम्मान भी....! उसके बचे हुए कुनबे के बेटे छोटे-छोटे धंधे करते हैं । पाकिस्तान में उसकी योग्यता और हुनर की कोई कद्र नहीं है ,न पाकिस्तान की सरकार उसे मान-सम्मान देती है जबकि हिंदुस्तान में महाराजा,ब्राह्मण एवं अन्य सभी लोग उसकी योग्यता का लोहा मानते थे । नानकी पाकिस्तान को कोसती है और हिंदुस्तान के अपने दिनों को याद करती है । वह चाहती है कि पाकिस्तान में जो लोग मुहाजिर नहीं हैं ,वे सब के सब मुहाजिर या प्रवासी बन जाँय ताकि उन्हें मुहाजिर (प्रवासियों) का दर्द पता चल सके। जब लेखक कहता है कि जो लोग पहले हिंदुस्तान से मुहाजिर होकर पाकिस्तान आए ,यदि वे यहाँ से भी मुहाजिर हुए तो कहाँ जाएँगे....! तो वह गुस्से में कहती है कि "जहन्नुम में जाँय ,कोई परवाह नहीं है ,लेकिन वे प्रवासियों का दर्द तो जानेंगे । “कहानी बताती है कि मुसलमानों को विभाजन के बाद पाकिस्तान जाकर भी कुछ नहीं मिला और वे मुहाज़िर या प्रवासी ही रहे । अच्छे-अच्छे हुनरमंद लोग जिनका हिंदुस्तान में खासा मान-सम्मान था उन्हें भी पाकिस्तान जाकर मुफ़लिसी का जीवन जीना पड़ा और सरकार ने उनकी कोई परवाह नहीं की ।लेखक ने तत्कालीन परिस्थितियों का यथार्थ चित्रण किया है ।


सहाय

***

    "ये मत कहो कि एक लाख हिन्दू और एक लाख मुसलमान मरे हैं.....ये कहो कि दो लाख इंसान मरे हैं....! ट्रेडेज़ी असल में ये है कि मारने और मरने वाले किसी खाते में नहीं थे ।"

    "एक लाख हिंदू मार कर मुसलमानों ने ये समझा होगा कि हिंदू मज़हब ख़त्म हो गया........लेकिन वो ज़िंदा है ,ज़िंदा रहेगा ।"

    "इसी तरह एक लाख मुसलमान कत्ल कर हिंदुओं ने बगलें बजाई होंगी कि इस्लाम ख़त्म हो गया है।"

    "मगर हक़ीक़त आपके सामने है कि इस्लाम पर एक हल्की सी खराश भी नहीं आई । वे लोग बेवक़ूफ़ हैं जो समझते हैं कि बंदूकों से मज़हबों के शिकार किये जा सकते हैं........मज़हब,दीन,ईमान,धर्म,यकीन,अकीदत....ये जो कुछ भी है हमारे जिस्म में नहीं ,रूह में होता है.....छुरे,चाकू और गोली से ये कैसे फ़ना हो सकता है ?"

    यही है मंटो की कहानी 'सहाय' का संदेश.....!

    मुमताज़ विभाजन के कारण पाकिस्तान जा रहा है ।  उसके तीन हिंदू दोस्त उसे समुद्री जहाज़ पर छोड़ने जा रहे हैं । उन्हें ऐसा कभी ख़याल भी न था कि मुमताज़ यूँ उन्हें  छोड़ कर जाने का निर्णय ले लेगा । दरअसल बात यह हुई होती है कि आपसी बातचीत में  हिंदू दोस्त अपने मुस्लिम दोस्त मुमताज़ से कहता है....."अगर फ़साद शुरू हो जाय तो मैं क्या करूँगा.....?"

    मुस्लिम दोस्त पूछता है...."क्या करोगे ?”तो

    हिंदू दोस्त कहता है ....."मुमकिन है मैं तुम्हें मार डालूँ ।"

    यह बात मुस्लिम दोस्त मुमताज़ को इतनी चुभ जाती है कि वह पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लेता है ।......लेकिन वह सहज नहीं है...मानसिक रूप से परेशान है....!ज़्यादा बोल रहा है,शराब पी रहा है,अपने जज़्बात छुपाने की कोशिश कर रहा है । वास्तव में वह बम्बई छोड़ना स्वीकार नहीं कर पा रहा है ।

    हिंदू दोस्त ज़ुगल को एहसास है कि मुमताज़ उसकी कही गई बात से ख़फ़ा है....लेकिन मुमताज़ बहुत गंभीर है और दार्शनिक अंदाज़ में कहता है कि...."तुम मुझे मार भी डालते तो तुम एक मुसलमान,एक दोस्त को नहीं एक इंसान को मारते ।"

    तब मुमताज़ ज़ुगल को सहाय की कहानी बताता है जो औरतों का दलाल था किंतु ईमानदार था और हिंदू था ,जिसे दंगों में कत्ल कर दिया गया था ।

    वह मरते-मरते भी जिसकी भी अमानत उसके पास थी ,उसे वापस दे जाता है और मुमताज़ कहता है कि "वह सहाय हिंदू नहीं ,एक इंसान था जो मारा गया था और वह मुमताज़ एक मुसलमान नहीं एक इंसान है जिसे ज़ुगल मार देने का ख़याल कर रहा था ।

    दंगों में,फ़सादों में इंसान मरते हैं...हिंदू-मुसलमान नहीं । इंसानियत मरती है हिंदू धर्म या इस्लाम धर्म नहीं । वे तो सदा बने रहे हैं और सदा बने रहेंगे और इंसानियत को-इंसानों को,कभी हिंदू ,तो कभी मुसलमान मारते रहेंगे ।

    इस प्रकार सआदत हसन मंटो ने सांप्रदायिकता पर अपने गहन विचार इन कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किये हैं,जिनका विश्लेषण मैंने इस लेख में किया है । वैसे देखा जाय तो धर्म ने मनुष्य-मनुष्य को मिलाने की बज़ाय बाँटने का ही कार्य अधिक किया है । विभाजन के दौरान हिंदू-मुसलमानों के मध्य जो अविश्वास,घृणा और नफ़रत की भावनाएँ पैदा हुईं ,उनके बीज इन्हीं धर्म के आकाओं और धर्म का सहारा लेकर आम जनता की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर इस जनता पर सत्ता करने की शक्ति या ताक़त हासिल करने के लिए आधुनिक लोकतंत्र के निर्वाचित राजा या शासक बनने का सपना देखने वाले नेताओं द्वारा बोए जा रहे थे । यही विभाजन के समय हुआ और यही आज भी हो रहा है और भारत ही नहीं समस्त विश्व में हो रहा है । इसीलिए मंटो तब भी प्रासंगिक थे और आज भी प्रासंगिक हैं और हमेशा रहेंगे ।


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© प्रो. गीता यादवेन्दु

प्रोफ़ेसर इतिहास एवं प्राचार्य-बी.डी.एम.एम.गर्ल्स डिग्री कॉलेज,

शिकोहाबाद।

9897137444

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