(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का" )
कहां होती है विदा बेटी केवल घर ही तो बदलती है।
नैसर्गिक की जगह पालनहार की छत्रछाया में पलती है।।
बचपन खेल खिलाते बीता मात पिता में बांटी खुशियां।
ज्ञान विज्ञान ग्रहण करने को विद्यालय की ओर चलती है।।
कहां होती है विदा बेटी...
उच्च शिक्षा को दूर हो जाएं अपने प्रियजनों और शहर से।
गृहस्थ जीवन चलाने की सीख तो मां से ही मिलती है।।
कहां होती है विदा बेटी...
किसी की पुत्री जब वधु हो जाए विवाह के उपरांत।
नए परिवार में सुसंस्कारों से दिलों पर राज करती है।।
कहां होती है विदा बेटी...
परिवर्तन तो रीत है हर युग की नारी शक्ति के लिए।
प्रेम सम्मान के भाव सीखकर दूसरों में बांटती फिरती है।।
कहां होती है विदा बेटी...
कन्या दान से बढ़कर नहीं कोई दान है किसी वेद पुराण में।
जनक बनने हेतु पिता को घोर तपस्या करनी पड़ती है।।
कहां होती है विदा बेटी...
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© संजय गुप्त
आगरा
8937001495
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