(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ.सुषमा सिंह* कृत साझा संकलन "स्वराभिषेक विचारों का" )
रे कान्हा! बंसुरिया धुन बजईयों नैक हौले हौले|
री राधा ! प्रेम रंग बरसैयों नैक हौले हौले||
यशोदा कौ लल्ला निंदिया में खो रह्यो है,
री सखी, पाजेब खन्कैयों नैक हौले हौले|
कदम्ब की डार पे पर गयो लंबो झूरौ,
री सखी! झोकों दइयों नैक हौले हौले|
हमार बछडाऊ भी चरतें ग्वाल बाल संग,
री सखी! गईँयन कूँ हाँकियों नैक हौले हौले|
राधा कूं चिढ़ावत सबरे ग्वाल बाल मिलके,
रे कान्हा ! प्रेम पिचकारी ते फुहार दइयों नैक हौले हौले|
राधा की पाज़ेब-तोडियां खुल उतर गई, री सखी !
रे कान्हा ! बैठ झुक बंधवा दइयों नैक हौले हौले|
कान्हा की बंसुरिया की धुन चौखी मस्तानी,
री राधा ! तिरक्षी नजरिया ते मुस्कइयों नैक हौले हौले|
मौय शरद पै ऊ बरस रह्यो है प्रेम रंग चौखो,
रे कान्हा ! ऐसे ही देत रहिओं प्रेम नैक हौले हौले|
💐💐💐💐💐💐
© शरद कुमार गुप्ता
A -29, सीताराम कॉलोनी, फेस -1,
बल्केश्वर, आगरा
94104 22461
sharad1964.gupta@gmail.com
--------------------------------------------
------------------------------------------------------------------------------
GEETA PRAKASHAN
Please call us 62818 22363

.jpeg)
No comments:
Post a Comment