(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन " कम्पन शब्दों का " )
सारे वहशी ख्वाब ,पिंजरे में बंद हैं,
बच्चों की कल्पना,
समझदारी में नज़रबंद है,
हर बच्चे की पीठ पे ,भारी बस्ता लदा है,
जो गधे सा नहीं लादे,
वही गधा है,
सज़ा भी कभी मिली तो ,भूखा रहने की,
यानी शिक्षा मिली भूख के सिवा,
सब कुछ सहने की,
जिसके मन ने पृथ्वी के ,
सौ चक्कर काट लिए,
हमने उन्हें खेलने को,
बस रोटी के मैदान दिए,
तन उसका जतन से सींचा ,
बड़ा कर दिया,
अंतर्मन का दरिया सुखा के,
घड़ा कर दिया,
हम मछली को रेत पे धर देते हैं,
कौशल के जनमते ही,
अंतिम संस्कार कर देते हैं,
उसकी कोई चाह तो होगी,
मुस्तकबिल की नई राह तो होगी,
पर इतना विचार कौन करे?
उड़ने वाले भी दौड़ मरें!!
पंजे से लोहे पे राह बना सकता,
उसे सर्कस का न शेर करो,
वहशी ख्वाब अब कुछ ही जाग रहे ,
अब और नहीं तुम देर करो।
विकास गौतम
99385 14872
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