गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कृत साझा संकलन "कम्पन शब्दों का"
(यह कहानी है खुशीलाल की, जिसकी उम्र 79 वर्ष है और वह विगत कई वर्षों से अपने बकाया पेंशन के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा है। लेकिन उसका आधार में नाम गलत होने की वजह से उसको पेंशन नहीं मिल पा रही है। इस सब से वह परेशान होकर खुशीलाल आत्मत्या कर लेता है, और जब उसकी ऑंख खुलती है तब.................)
एक अनजानी सी जगह खुशीलाल को होश आता है और कहता है....... अरे मैं कहॉं हूॅं ? यह कौन सी जगह है, लगता है कोई प्लेटफार्म है.... हॉं यह कोई प्लेट फार्म ही है, वहॉं कोई गाड़ी भी खड़ी है। पर मैं यहॉं आया कैसे मैं तो मर चुका था, फिर मुझे बचाया किसने? ऐसे बहुत से सवाल खुशीलाल के मन में चल रहे थे।
फिर उसने सोचा कि वह किसी से जाकर पूछता है, प्लेटफार्म पर काफी भीड़ थी। तथी एक काली वर्दी वाला व्यक्ति खुशीलाल के पास आकर पूछता है, तुम्हारा नाम बताओ कौन हो? खुशी लाल थोड़ा घबराते हुए जबाब देता है........ ‘‘मैं खुशीलाल हूॅं,,,,’’
वर्दी वाला:- कहॉं रहते हो?
खुशी लाल:- मैं... मैं.... भोपाल से शिवनगर में।
वर्दीवाला: अच्छा भारत से हो, ठीक है प्लेटफार्म नम्बर 41 पर चले जाना और वहॉं से तुम्हारा नाम बताकर टोकन ले लेना।
खुशीलाल: पहले यह तो बताओ यह कौन सी जगह है? मैं यहाँ कैसे आया? मैं तो भानपुर के पुल पर से कूदकर मर चुका था।
वर्दी वाला (गुस्से में): अरे दादा तुम अब भी मरे हुए ही हो और अब तुम्हें स्वर्ग या नर्क जाना है। यह आखरी स्टेशन है.....। पहला प्लेट फार्म नंबर 41 पर जाओ वहॉं अपना वेरिफिकेशन कराओ। टोकन लो, फिर वो वताऐंगें कि तुम्हें कहां जाना है? स्वर्ग या नर्क। अब जाओ यहॉं से कुछ और लोग आ रहे हैं... जर्मनी में एक बिल्डिंग गिर गई 200 लोग मर गए हैं। उन्हें रिसीव करने जाना है।
वर्दी वाले की बातों को सुनकर खुशीलाल सहमा सा रह जाता है, और सोचता है क्या यह सच है? मैं सच मैं मर चुका हूॅं। शायद उस वर्दीवाले में मुझसे मजाक कर रहा होगा, मैं यहॉं किसी ओैर से पूछता हूॅं।
खुशीलाल ने इतना बड़ा प्लेट फार्म पहले कभी नहीं देखा था। वहॉं पर सभी देशों के नाम लिखे हुए थे और सभी जगह विदेश के ही लोग नजर आ रहे थे लेकिन वह भी एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे। ऐसा लग रहा था सिर्फ ट्रेन के आने का इंतजार कर रहे हों। खूशीलाल धीरे धीरे प्लेटफार्म नम्बर 41 पर जाता हैं वहॉं पर भारत लिखा हुआ था अंदर जाते ही लगता है कि अपने देश में आ गया हो। यहॉं पर भी लोग डरे और सहमें से दिख रहे थे। बहुत भीड़ थी कई सारे काउन्टर थे लाइन लगी हुई थी। कुछ लोगों से खुशीलाल ने पुछने की कोशिश की पर किसी ने उससे ठीक से बात नहीं कि, कुछ ने कहा हमें नहीं पता, खुशीलाल परेशान होकर एक जगह बैठ जाता है।
तभी खुशीलाल को पड़ोस के गुप्ता जी दिखाई देते हैं, जो उनके मित्र थे लेकिन पिछले कुछ दिन पहले ही दिल का दौहरा पड़ने से उनकी मौत हो गई थी। खुशीलाल गुप्ताजी को देखकर हैरान रह जाता है, और डरते हुए खुशीलाल गुप्ता जी के पास जाकर पूछता है, सुनो तुम गुप्ता ही हो ना।
अरे खूशीलाल तुम यहॉं.... क्या हुआ? तुम तो ठीक थे।
मैं भानपुर पुल पर से कूद गया था, इसके बाद मुझे कुछ नहीं पता, मुझे समझ नहीं आ रहा यह कौन सी जगह है? और मैं यहॉं कैसे आया? पर तुम तो मर चुके थे ना।
गुप्ताजी: खुशीलाल तुम भी मर ही चुके हो।
खुशीलाल: पर यह कैसे हो सकता है मैं तो जिन्दा हूॅं और तुम भी और मेरे पास मेरा शरीर भी है और मैं यदि मर भी गया हूॅं तो क्या मतलब मैं भूत बन गया हूॅं... और इतने सारे लोग यह सब भी भूत ही हैं। पर यह जगह है कौन सी?
गुप्ता जीः अरे घबराओ नहीं तुम, मैं और यह सब लोग सिर्फ मरे हैं, भूत नहीं हैं। और यह वो जगह हैं जहॉं मरने के बाद हर इंसान को आना पड़ता है, जाहे वो किसी भी देश से क्यों न हो। यही उसका आखिरी स्टेशन होता है। यहॉं से उसको वेरिफीकेशन करके स्वर्ग या नर्क भेजा जाता है। वो देखो वो काली ट्रेन दिख रही है उससे लोगों को नर्क ले जाते हैं, उस तरफ देखो वो चमकती हुई सोने की ट्रेन दिखाई दे रही है उससे स्वर्ग ले जाते हैं।
खुशीलाल: वेरिफिकेशन.... वो क्या होता है?
गुप्ता जीः वेरिफिकेशन मतलब तुम सही व्यक्ति हो या गलत तुम्हारा जन्म से लेकर अब तक का रिकार्ड निकाला जाता है, और 70 प्रतिशत से कम रिकार्ड होता है तो तुम्हे नर्क भेजा जाएगा। यदि 70 से ज्यादा हुआ तो स्वर्ग और हॉं हर एक पुण्य का 1 नम्बर मिलता है और हर 4 पापों का 1 नम्बर काटा जाता है।
खुशीलाल: तो फिर तुम्हारा कितना है?
गुप्ता जी: नहीं.... मेरा आधार कार्ड अपडेट नहीं था इस कारण मेरा रिकार्ड निकलने में देरी हो रही है। लेकिन तुम ये बताओ तुम मरे कैसे?
खुशीलाल: अरे इसी आधारकार्ड की वजह से, जब आधार कार्ड बना था तो उसमें मेरा नाम खुशीलाल की जगह खुशी कर दिया था। जब पेंशन का पैसा आया तो बैंक वाले कहने लगे आधार कार्ड और पेन कार्ड दिखाओ, पेन कार्ड बनवाने गया तो कहा कि आधार में नाम सही कराओ पहले, आधार पंजीयन केन्द्र पहुॅंचा तो कहा कि ऐसा कोई सबूत लाओ जिसमें खुशीलाल हो। अब बहुत बार उसको सारे दस्तावेज दे दिये लेकिन न तो आधार आया और न ही मेरी पेंशन निकली। उधर घर की माली हालत मुझसे देखी नहीं जा रही थी और न ही इतनी हिम्मत थी कि इन सरकारी ऑफिसरों को और कागज बनाने के लिए पैसे दे सकूॅं। सोचा था पेंशन का पैसा निकलेगा तो सबके पैसे चुका दूॅंगा। पर सह न सका तो एक दिन कूद गया भानपुर पुल पर से।
गुप्ता जीः लेकिन यहॉं भी आधार कार्ड ही मॉंग रहे हैं। यदि वो हो तो जल्दी रिकार्ड मिल जाता है नहीं हो तो 7 दिन यहीं रूकना पड़ता है, प्लेटफार्म पर ही। अब जाओ लाईन में लगकर टोकन ले लो।
खुशीलाल: यहॉं भी सरकारी ऑफिसों की तरह कार्य हो रहा है, है भगवान न जाने अब आगे क्या होगा, मरने के बाद भी शांति नहीं है।
खुशीलाल और गुप्ता दोनों टोकन ऑफिस जाते हैं और वेरिफिकेशन में खुशीलाल का आधार न होने के स्थिति में अंगूठा लगा कर उसे कुछ दिन रूकने को कहा जाता है।
खुशीलाल और गुप्ता जी दोनो आपस में बातें करते हैं............।
खुशीलाल ट्रेनों की ओर देखता है और गुप्ता से पूछता है कि स्वर्ग की गाड़ी इतनी खाली क्यों जा रही और और देखो यह नर्क की गाड़ी पूरी भरी है कितनी भीड़ है इस ट्रेन में।
गुप्ता जी: यहॉं बड़ी मुश्किल से ही 70 प्रतिशत रिकार्ड आता है नहीं तो ज्यादातर 30-40 नम्बर ही आते हैं सभी के, मैंने पिछले पॉंच दिनों में यहॉं बड़े-बड़े महात्मा, साधू-संत, मौलवी-हकीम बैद्य, सभी को देखा है, उनके नम्बर रिकार्ड भी कुछ खास नहीं आते।
खुशीलाल: गुप्ता तुमने एक बात पर ध्यान दिया यहॉं पर जितने भी लोगों का आधार अपडेट नहीं है वह सभी अपनी उम्र के बूढ़े लोग हैं, कोई भी नौजवान व्यक्ति नहीं। जैसा कि उस लड़की को ही देख लो बहुत खुश नजर आ रही, लगता है शायद उसे उसका आधार अपडेट होगा और उसे स्वर्ग मिल गया होगा
गुप्ता : चलो पूछते हैं........।
सुनो बेटी क्या नाम है तुम्हारा............
अंकल प्रियंका ......
गुप्ता जी: लगता है स्वर्ग की गाड़ी से जा रही हो। कितने नम्बर आये।
प्रियंका: 71.45 %
गुप्ता जी: तो मतलब तुम्हारा आधार अपडेट था।
प्रियकाः हॉं मेरे दोस्त अंकित ने करवा दिया था, नहीं तो मुझे भी 7 दिन रूकना पड़ता।
गुप्ता जीः तो बेटी तुम्हारी मौत कैसे हुई?
प्रियंकाः अब क्या कहूॅं अकंल, मुझे अंकित ने ही चाकू मार दिया एक दिन।
गुप्ता जीः क्यों?
प्रियंका: उसको लगता था कि मैं उसे प्यार करती हूॅं, पर ऐसा नहीं था, वो सिर्फ मेरा अच्छा दोस्त था, बहुत समय से, एक दिन मुझे किसी और से प्यार हो गया तो मैंने उसे बताया, पता नहीं गुस्से में उसनें मुझे चाकू मार दिया। (उदास होते हुए)
गुप्ता जी: ओ....... ठीक है बेटी तुम जाओ।
देखा खुशीलाल कैसे कैसे लोग रहते हैं........।
खुशीलाल गुप्ता जी की इन बातों को सुनने लगा और देखते ही देखते 7 दिन बीत गये।
गुप्ताजी का रिकार्ड आया और वह पहले ही स्वर्ग की गाड़ी से जा चुके थे। अब खुशीलाल अपने रिकार्ड लेने के लिए लंबी लाईन में लगा हुआ था। लेकिन अब लाईन में लगने में कोई थकान नहीं हो रही थी और न ही किसी बात की जल्दी थी, न भूख-प्यास। अब शरीर इन सब चीजों से परे था। चिंता खुशीलाल को थी तो बस यह कि रिकार्ड में क्या आयेगा? बहुत देर बाद खुशीलाल को उसका रिकार्ड मिलता है जो कि 50 से 60 पन्नों का था और बहुत छोटे छोटे अक्षरों में तारीख के साथ पाप पुण्यों का लेखा-जोखालिखा हुआ था। सब टोटल करके अंतिम में खुशीलाल को 15.77% दिया गया था। मतलब उसको नर्क की गाड़ी में जाना था, और गाड़ी का समय हो गया था, टिकिट भी रिकार्ड के साथ ही दिया गया था। फिर क्या खुशीलाल बहुत उदास हो गया, कि उसने जिंदगी में कितने सारे पाप किये हैं।
और फिर एक काली वर्दी में एक व्यक्ति आता है और पूछता है कि कौन सी गाड़ी से जाना है टिकिट बताओ, टिकिट देखकर वर्दीवाला व्यक्ति कहता है वो तुम्हारी गाड़ी वहां खड़ी है जाकर अपनी सीट पर बैठ जाओ गाड़ी निकलने वाली है, नहीं तो वह गाड़ी कल आयेगी। तुम्हे नर्क जाना है। जल्दी करो। उदास मन से खुशीलाल नर्क वाली गाड़ी में चढ़ता है, जहॉं पर अजीब-अजीब से लोग बैठे हुए हैं और ट्रेन भी अजीब ही है जिसमें कोई पटरी भी नहीं है और लंबी इतनी की इंजन दिखाई ही नहीं देता। राम जाने किस चीज से चलती है.............। वह अपनी सीट पर बैठते तभी गाड़ी बिना हॉर्न बजाए ही आगे बड़ने लगती है.... जैसे की उड़ रही हो। खुशीलाल अपनी कुर्सी पर सहमा सा बैठा था। तो सोचा देख ही लूॅं कि मैने क्या क्या पाप कर लिए........। तभी ध्यान से पढ़ने पर उसे बैंक की चोरी दिखाई देती है, तो खुशीलाल सोचता है कि मैंने तो कभी चोरी नहीं की फिर मेरे रिकार्ड में यह बैंक की चोरी कैसे आ सकती है और ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि यह रिकार्ड तो खुशीलाल का है ही नहीं। यह तो किसी और खुशीलाल का है।
तब खुशीलाल जोर से चिल्लाता है अरे भाई ट्रेन को रोको मुझे गलत रिकार्ड दिया गया है। यह रिकार्ड मेरा नहीं है। कोई सुन रहा है मेरी बात को। सब लोग खुशीलाल को चिल्लाते देख खड़े हो जाते हैं, तभी वहां एक काली वर्दी वाला व्यक्ति आ जाता है और पूछता है क्या हो गया दादाजी? क्यों इतना शौर मचा रहे हो?
अरे भाई ट्रेन को रोको यह रिकार्ड मेरा नहीं है, किसी और खुशीलाल का है,,,, तुम्हे कैसे पता, वर्दीवाला पूछता है?
खुशीलाल - इसमें ऐसे ऐसे पाप किये हैं जो कि मैंने किये ही नहीं।
वर्दीवाला- ट्रेन बहुत आगे निकल गई है अब नहीं रूकेगी। फिर भी मैं अपने साहब को सूचना करता हूॅं देखते हैं क्या होता है। तुम यहीं रूको मैं आता हूॅं।
थोड़ी देर बाद ट्रेन को चैन खींचकर रोका जाता है और खुशीलाल को प्लेटफार्म तक पहूॅंचाया जाता है, तो पता चलता है कि यह रिपोर्ट किसी और खुशीलाल की थी जो कि स्वर्ग की गाड़ी से जा चुका था।
खुशीलाल अधिकारियों से बात करता है तो पता चलता है कि दोनों का आधार कार्ड अपडेट न होने के कारण ऐसी गलती हुई। उसका और तुम्हारे पिताजी का नाम एक ही है। तुम्हारी रिपोर्ट में तुम्हारे नम्बर 89.65% हैं। तुम स्वर्ग ही जाओगें।
अधिकारी ने माफी मॉंगते हुए खुशीलाल से कहा - माफ कीजिएगा खुशीलाल जी हमारी गलती के कारण आप नर्क पहुॅंच जाते। वो क्या है अधिकारियों से कभी कभी गलतियॉं हो जाती हैं।
खुशीलाल: कोई बात नहीं साहब, हम जानते हैं अधिकारियों के काम।
और फिर खुशीलाल को सोने की बनी स्वर्ग की ट्रेन में बैठाकर स्वर्ग भेज दिया जाता है।
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रवि पंथी
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GEETA PRAKASHAN
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