Saturday, March 30

शांति दूत - डॉ अनुसया गायकवाड (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ. दयानंद शास्त्री* कृत साझा संकलन *स्वराभिषेक विचारों का* )

  (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ लक्ष्मण भोसले* कृत साझा संकलन   "अक्षराभिषेक साहित्य का "  )  





   शांति दूत
💐....................💐

सदा शांति का दर्शन दे, वह बुद्ध का ध्यान देखो,

जग में घूम आये और शांति का गीत गाये।

ध्यान करे और एक-तान हो जाए,

नाम उनका स्मरण करे और स्वयं भूल जाएं।


बोधी वृक्ष के नीचे देखो बैठा,

अहंकार, क्रोध, लोभ जिसने जीता ।

वह करुणामयि मूर्ति यहीं से चली,

उसके चरणों की धूल चलो लगाये माथे।


मानव इतिहास में सदैव जंग में,

युद्धों के कारण सदा रक्तपात हुए।

बेगुनाहों के रक्त से लथपथ हाथ,

देख, गौतम स्तब्ध रह गये।


निरपराधी भिक्षुओं का बलिदानी कौन था?

क्या कोई चांडाल निहित था?

कोई बेबस, बेसहारा था, कोई उदास था,

किंतु दुखिताओं का पालनहार कोई न था।


यज्ञ कर्मकांडों में, मूक पशुओं की बली गयी,

इसी से विश्व में धर्मसंकट की घड़ी आई।

कृंदनो की वह चीख, कानों में पडते ही,

याद आयी उस घड़ी, वो धीर वह बुद्ध वाणी।


तब छोडकर ठाठ, वह साम्राज्य वैभवशाही

पाने हेतु, ज्ञान-बोध सिद्धार्थ निकला।

क्यों संसार में दु:ख है? उत्तर कोई न मिला,

किंतु प्रलोभन में पडा हर एक क्षण मिला।


हे मानव! किसलिए यह लडाई?

देखो रोती है यहॉं विधवा धाय-धाय।

मत करों बखान तुम वीरता की,

क्यों? करते हो भाई, भाई से लढाई।


जिसे रक्त चाहिए, वह भगवान कैसा?

यह भक्ति कैसी और यह भाव कैसा?

हृदयहीनता का यह सत्यभाव कैसा?

वह भगवान कैसा और वह धर्म कैसा?


हिंसा किसी की करते हो क्यों?

अरे! एक-दूसरों पर चिढ़ते हो क्यों?

झूठे रास्ते पर तुम चलते हो क्यों?

विनाश की आशा को, धारण करते हो क्यों?


अहिंसा, परधर्म का ज्ञान, घर-घर में देकर,

दया का बीजांकुर मन-मन में उगाकर,

जग को शांति की गवाही देकर,

क्षमा का मंत्र करूणा से देकर।


ऐसा संघ बना, जहॉं केवल समन्वयता हो,

ऐसा धम्म का पाठ पढ़ाया, जहॉं बुराई न हो।

जहॉं असमानता का रंग भेद न हो,

जहॉं वर्ण न हो, वहॉं केवल ममता हो।


बहुसंख्यक जन जब एकसाथ आया,

समाज में चैतन्य निराला छाया।

मानो जंग को एक संजिवन वो मिला , 

जो बुरा भाव मन में था, वो अपने आप जला।


कितने स्तूप और कितने वो विहार,

हर्षने लगे सब शांति से शहर।

और तक्षशिला ने, अपने खोलकर द्वारे,

कहने लगी अब, ज्ञान दूॅंगी मैं, आओ रे।


सहजीवन की वह अमर पंचशीला,

भाईचारे का सरल पाठ जग को पढ़ाया।

एक-एक भिक्षु जैसे, नयी पाठशाला,

पूर्व दिशा से नवधम्म उदय हो आया।


इस शांति की गूॅंजी, विश्व में पुकार,

फिर नहीं गिरी लाशें, समुद्रों में एक बार।

तब प्रेम ने की द्वेष पर अंतिम मात,

फिर जल उठी वहॉं, सत्य की ज्योत।


हे बुद्ध! तेरे लिए समदृष्टि का लाभ हो,

हृदय में मेरे द्वेष क्रोध को जगह न हो।

तेरे लिए मेरा देह क्षीण हो जाए, और

तेरे गीत गाते-गाते मुझे मृत्यु आये।


तेरे लिए मेरा देह कृतार्थ रहे,

तेरे पास ही मुझे जीवनांत मिले।

सुख का वह दिव्य आश्रय मिले,

अहंकार के लिए,तेरे चरणों में यह शीश झुके।


ध्यान में अब तेरे, नेत्र मिटते हैं मेरे,

मन-मंदिर में मेरे, तेरी प्रतिमा विराजे।

तेरा नाम अब, त्रिलोक में गूंजे।

तेरे तत्वज्ञान को, वैराग्य का आभूषण सजे।


हम दीन आये आज तेरे द्वार,

यज्ञ, कर्मकांड का है हमें तिरस्कार।

तेरे तत्वज्ञान का है, जो पालनहार,

ना रहे उसे कोई लंपट आधार।


नमो बुद्ध देव, नमो शांति दूत,

कुंठित हुई मति, गाते हैं तेरे गीत।

दिननित्य गाए हम, तेरी प्रेम गाथा,

तू भाग्य हमारा और तू ही भाग्यविधाता।

तू भाग्य हमारा और तू ही विधाता।।


💐💐💐💐💐💐

© डॉ अनुसया गायकवाड

सहायक प्राध्यापिका, हिंदी विभाग,

शासकीय महाविद्यालय (स्वायत्त)

कलबुरगी। संपर्क-9482605933

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