(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ. दयानंद शास्त्री* कृत साझा संकलन *स्वराभिषेक विचारों का* )
मैंने देखा,
कर्नाटक के मुकुट पर,
युवाओं की व्यथा को,
असली बेरोजगारी, भूखमरी, लाचारी को।
मैंने देखा,
कर्नाटक के मुकुट पर,
इलेक्शन के समय पर,
होश गंवायें, जय जयकार करायें, भ्रष्टाचार को जितायें।
मैंने देखा
कर्नाटक के मुकुट पर,
माता-बहनों को,
पानी के लिए तरसते, रोटी के लिए झपकते।
मैंने देखा,
कर्नाटक के मुकुट पर,
एक-दूसरे, आपस में,
कडी धूप में झगडते दौड़ते।
मैंने देखा,
कर्नाटक के मुकुट पर,
युवाओं की भीड़ को,
मधुशाला के द्वार पर लड़खड़ाते।
देखकर कोई नहीं किया विश्वास,
यही है आज की सरकार।
युवाओं को बनाया अपना हथियार,
कहने लगा, अबकी बार, फिर एक बार,
कर देंगे आपको मालामाल।
पानी दूंगा, रोटी दूंगा,
घर दूंगा, बिजली दूंगा,
इतना ही नहीं मित्रों, मैं
बेरोजगार को भत्ता दूंगा।
गुप्त-गु नेता कहने लगा,
इसी में मनाओ तुम खुशी,
हम और हमारे होंगे युवराज,
आप ऐसे ही रहेंगे पोतराज।
मैंने देखा,
कर्नाटक के मुकुट पर,
अब की बार,
फिर एक बार,
आपकी सरकार।
💐💐💐💐💐💐
© डॉ राठोड राजकुमार टी
हिंदी विभाग प्रमुख
कविरत्न कालिदास डिग्री कॉलेज,
बिदर।
9741401051
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