(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. मैत्री सिंह कृत साझा संकलन "कलम मेरी पहचान")
छोड़ कर मां की चौखट को
तुम्हारी दहलीज पर जो रखा पैर
ओ सासू मां, मां के स्नेही आंचल से दूर, आई तुम्हारी छत्रचाय मैं
सोचा बाहें फैलाकर भरलोगी अपने अंक में
और करोगी बौछारें आशीर्वादों की
भ्रम मेरा टूट गया सुखी रहो कह कर
किनारा जब तुमने मुझसे किया
समझा लिया मन को मैने के
सेवा से अपनी निहाल कर दूंगी
धारा समय की रही बहती
पर तुम सासू मां पाषाण बनी रही
बेटे के बचपन के निर्जीव खिलौनों पर
लुटाया असीम स्नेह तुमने
मैं तो थी अर्धांगिनी उन्ही की
कुल को तुम्हारे उज्ज्वल करने वाली ओ सासू मां मुझसे विरक्त तुम क्यों हुई
धारा शीश पर मैने अपने
तुम्हारी सारी आज्ञाओं को
नाचती रही बन कठपुतली
इशारों पर तुम्हारे
पर न रख सकी ममता का हाथ मेरे सर पर कभी
ना कहें मुझसे कभी दो मीठे बोल ना अपनी कही ,ना ही मेरी सुनी
ओ सासू मां तुम मुझे क्यों अपना ना सकी
हृदय हुआ विकल तुम्हार जब पुत्री वियोग में
क्यों ना समझी मेरी वेदना हूं मैं भी किसी कन्या
वो है धन पराया,मैं तो तेरी जमा पूंजी
काम आऊंगी आड़े वक्त मैं
ओ सासू मां, इससे तुम क्यों अंजान बनी
देखी तुम मैं मां की सूरत
देखी क्यों ना मुझ मैं छवि बेटी की
लगा लो मुझ को अपने गले से
और पिघलने दो पत्थर दिल को
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© सिम्मी
95424 73619
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