(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. मैत्री सिंह कृत साझा संकलन "कलम मेरी पहचान")
सृष्टि का जब ईश्वर ने किया निर्माण
था हमारा भी अस्तित्व उसमें
पर नाकार दिया सबने मिलकर
मानो सांस भर लेते हुए कोई जीव है हम,पर मनुष्य नही
पैदा होते ही परिवार ने ठुकराया
हम समझ ना सके ऐसा हमने क्या किया के समाज ने भी ना अपनाया
थी हम भी योग्यताये इतनी
के कुछ भी बन सकते थे हम
पर दुनिया का अन्याय तो देखिए
ताली बजाने वाले बना दिए गए हम
देख कर लोग हमें रास्ते बदल लेते हैं
कुछ डर जाते हैं कुछ उड़ाते हैं मजाक
कुछों के लबों पर आती हैं भद्दी गालियां
तो कुछो के चेहरों पर घृणा के भाव उभर आते हैं
है कितना संघर्षमय जीवन हमारा
रोज़ी रोटी का है ना कोई ठिकाना
खुशियों के मौकों पर, दुआओं पर हमारी लोग हज़ारों उड़ाते हैं
ये चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात है जिंदगी हमारी
यहां हर किस्से का कुछ ना कुछ है
किसी की जमीं तो किसी का आसमां है
अपनी ना तो जमीं हैं और ना ही आसमां
हक मैं हमारे ना कोई बोले वाला ना ही कोई लड़ने वाला
हमें तो बस कर दिया गया है दर किनारा
फिर भी हमारे होठों पर दुआ और दिल में खुशी है सबके लिए
हम ताली बजाने वाले ही सही पर इंसानियत की कद्र करते हैं
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© सिम्मी
95424 73619
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