(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. मैत्री सिंह कृत साझा संकलन "कलम मेरी पहचान")
पांचाल नरेश की पुत्री
अग्नि से जन्मी अग्निसुता
परमविदुषी अद्वितीय सुन्दरी
चतुर प्रवीण मैं द्रोपदी
अंततः थी तो एक स्त्री ही
मेरे योग्य ना कोई ऐसा
वरण जो कर सकता मुझे
स्वयंवर रचा तब मेरे लिए
वीर, प्रतापी राजाओं से था दरबार सजा
जिसमें सखा कृष्ण भी थे
किया विजयी मुझे अर्जुन ने
मन था मेरा आनंदित
मान कुंती मां की आज्ञा को
बनी भार्या पांच वीरों की मैं
किसी ने ना जानी मेरी इच्छा,ना ही मेरी स्वीकृति ।
अंततः थी तो मैं एक स्त्री ही
बन कुरु वंश की वधु मैं बहुत इठलाई
था सभी बड़ों का आशीर्वाद मेरे उज्जवल शीश पर
तन पर थी फिर भी कईयों की कुदृष्टि
अंततः थी तो मैं एक स्त्री ही
द्धुत्त क्रीड़ा का फैला जाल
अनिष्ट का हो रहा था आभास
लगाया दांव पर धर्मराज ने
राज्य, संपत्ति और भ्राताओं को
लज्जा से था शीश झुका हुआ
हारे जब मुझे भी दांव मैं
अंततः थी तो मैं एक स्त्री ही
दुर्योधन ने किया अश्लील उपहास
कहे अंगराज ने कटु वचन
चीरहरण किया दुशासन ने
गुरु द्रोण, कृपाचार्य,काका विदुर और पितामह भीष्म
धारण किए रहे सब मौन
देखे किसी ने ना मेरे अश्रु ना ही समझी पीड़ा मेरी
अंततः थी तो मैं एक स्त्री ही
भाइयों ने भाइयों को मारा
शिष्यों ने की गुरुहत्या
युद्ध ने किया शून्य पृथ्वी को वीरों से
थी ये धर्म और स्वार्थ की लड़ाई
दोषी मैं ही ठहराई गई
अंततः थी तो मैं एक स्त्री ही
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© सिम्मी
95424 73619
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