(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. मैत्री सिंह कृत साझा संकलन "कलम मेरी पहचान")
ऐ मानव तू ही बता ?
क्यों अहंकार- तुझमें भरा
सत्य असत्य दोनों को बसाता
इमानदारी मन का है खरा ।
ऐ मानव कर तू फैसला
तेरा परिवार क्यों उलझा हुआ ?
गर्व के अंगार से क्यों लगा है
कलियों भी सुलगी हुई।
ऐ मानव तू ही बता?
ऐ परिवारों (साथियों) तुम भी देखो
आज के इन्सान को,
ऐसे लागे भूल गया वो
अपनी ही पहचान को, ऐ मानव
ऐ मानव तू ही बता दे
रंग आज न कल फीका तेरा
बात तो ऐ है, पतझड निश्चित है
हर पल पल समय तेरा। ऐ मानव
ऐ मानव तू सोच कुछ तो
तारे क्यों भयभीत हैं
प्रीत भी मतलब की मारी
क्या यही तेरी रीत है, ऐ मानव
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© प्रो. रंजना पाटील
प्राचार्य, अक्का महादेवी महिला डिग्री कॉलेज
बीदर
94803 49733
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