(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "कलम मेरी पहचान" )
आकाश में बादल लगातार भीषण चीत्कार कर रहे थे जैसे उनके पेट में असहनीय पीड़ा हो रही हो। अमावस की वर्षा भरी रात आस पास का गहरा अंधेरा समेटे हुए डरावनी लग रही थी। निरंतर बरस रही बरसात से गांव के सब घर भीग रहे थे। आधी रात में इंद्र देव का तांडव कुलकर्णी राघवेंद्र को जगा देता हैं। वह पास ही सो रही सिनांगी से लिपट गया। टीन की छत पर वर्षा के शोर से वह जाग उठी।
कैसी बरसात हैं..इसका सर्वनाश हो.. दो दिन से बरस ही रही हैं। कुलकर्णी कंबल ओढ़ कर ठंड दूर करने का विफल प्रयास करता रहा कि उसके सीने में तेज दर्द होने लगा और वह कराहने लगा।
सिनांगी आहत हो कर माचिस टटोलने लगी। जैसे ही वह तीली खींचती दरवाजे की चीरी से हवा उसे बुझा देती। तीन बार के बाद वह दिया जला पाई।
अब कैसा है दर्द पूछने पर कोई उत्तर नहीं मिला। दर्द से तड़पता कुलकर्णी सीने पर हाथ रखकर शांत हो गया था। उसका चेहरा विकृत हो गया था। वह उसका हाथ सीधा करने लगी जो धम से एक तरफ गिर पड़ा।
सिनंगी ने शरीर छू कर देखा वह भी ठंडा पड़ गया था। नाक के पास हाथ रखा सांस बहुत देर पहले से बंद थी। उसका मन धसकने लगा। डर के मारे वह उसे हिलाने लगी मानो जगा रही हो, अब वह सिर पर हाथ रख बैठ गई।
बरसात उसे राक्षस लगी। उसके घर के दूर तक कोई झोपड़ी तक न थी। अमावस की गहरी रात में वह कुलकर्णी के शव के साथ थी।
मिट्टी के सिवाय यह शरीर क्या है.. प्राण जाने के बाद इसकी कीमत रत्ती भर भी नही..बीस बरस प्रेम से बिताने के बाद साथी का शव भयंकर दिखने लगा। उसके मन में डर के मारे नगाड़े बजने लगे।
अगले ही क्षण वह संभल कर उठ बैठी। शव पर कंबल डाल कर उस पर कुल्हाड़ी रख दी। दूर बैठ कर तंबाकू मसल कर चबाने लगी।
बीस साल पहले के विचार यादों के कमरे से बाहर आकर सिनंगी के सिर में शोर मचाने लगे। बरसात, डर, सन्नाटा गायब हो गया। सिनंगी का नाम शिवगंगा था जो बिगड़ कर सिनंगी हुआ मां बाप ने देवी के नाम समर्पित कर उसे देवदासी बना दिया। छह महीने में मां चल बसी पिता नीची जाति की औरत को रख लिया।
बलपूर्वक देवदासी बनाने पर भी उसके अपने गांव में जगह न मिलने पर उसने गले में कौड़ियों की माला, देवी मूर्ति की पलड़ी को कुएं में डाल दिया और वहां से चली गई।
कदल्ली गांव पहुंचने पर युवा सिनंगी शिला बाला लगने लगी। उसका सौन्दर्य देख बच्चे बूढ़े दंग रह गए। उसकी चर्चा होने लगी आशा पूर्ण दृष्टि से सब उसे देखते। सिनंगी ने गांव के जमींदार से रहने भर की जगह मांगी। कुलकर्णी ने दया कर गांव की सीमा पर हरिजन वाडा में खेत किनारे झोपड़ी डालने की अनुमति दी। जंगली पत्तों और लकड़ियों से उसने अपनी झोपड़ी बनाई। मजदूरी करते हुए दिन बीतने लगे। अकेली औरत कब तक सुरक्षित रह पाती। आदमियों की कुत्सित दृष्टि पड़ने पर वह उनसे अकेले ही निपट लेती।
एक दिन गांव के सब लोग ग्राम देवता को बलि चढ़ाने गए हुए थे। सिनंगी पूजा में जाने से इंकार करती हुई अपनी झोपड़ी में रोटी, प्याज़ चटनी खाने बैठी कि सामने उसका शरणदाता राघवेंद्र कुलकर्णी आ खड़ा हुआ। सिनंगी उसके मन के भाव जान गई और सोंचने लगी अकेली औरत को समाज कब तक जीने देगा, रोज ही कोई उसका पीछा करता रहता। कुलकर्णी गांव का मुखिया हैं क्यों न इसके नाम से जीवन बिताया जाय। सिनंगी ने शर्त रखी तुम दूसरी औरत नहीं रखोगे कुलकर्णी ने शर्त मान ली। उस दिन काला शूद्र, सफेद ब्राह्मण रंग एक हुआ।
गांव में यह समाचार आग की तरह फैल गया। कुलकर्णी के घर भाई भाई में झगड़ा हुआ। घर में अंदर ही चिंगारी जलती रही लेकिन धुआं सिनंगी की झोपड़ी तक नहीं पहुंच पाया। कुलकर्णी शान से सिनंगी की झोपड़ी में आने लगा। धुआं हटा,आग जली, भाइयों में संपत्ति को लेकर विवाद खड़ा हुआ। सिनंगी को चरित्रहीन,नीच, वैश्या,बेईमान नाम दिए गए। आखिर में कुलकर्णी के हिस्से एक बगीचा आया, गांव की पंचायत ने मांस, मदिरा, नीची जाति की औरत की संगत करने के कारण धर्म, समाज से उसे बहिष्कृत कर दिया। नींद आने वाले को बिस्तर देने जैसी बात हुई। अब सिनंगी ने काम पर जाना बंद कर दिया। झोपड़ी है गई टीन शेड के दो कमरे बने, बगीचे से सामान आने लगा। आंगन में गाय, मुर्गी, भैंस पलने लगे। नौकर मटके में ताज़ी सेंधी ले आता। सिनंगी की मदद के लिए नौकरानी आई। कुलकर्णी सोचा स्वर्ग गया भाड़ में। इससे बढ़कर स्वर्ग और क्या हो सकता हैं। शूद्र सिनंगी स्वर्ग नर्क से परे सुख पाने लगी।
यह घटना पुरानी हो गई। दोनों प्राणी अपनी बात के पक्के थे। सिनंगी एक सम्मानित गृहिणी से ज्यादा कुलकर्णी के प्रति समर्पित, कुलकर्णी ने भी कभी किसी औरत को आंख उठाकर नही देखा। पर सिनंगी संतान सुख न देख सकी। दोनों को बुढ़ापे ने घेर लिया। और ऐसे ही एक दिन दबे पांव मौत ने कुलकर्णी को दबोच लिया।
सिनंगी का अंतर्मन दुख से भर गया। मुर्गे की बांग ने स्मृतियों को काट दिया। वह होश में आकर शव की तरफ़ देखने लगी। केवल यादें, चिंता, समस्या अपनी प्रेयसी के गले बांध कर कुलकर्णी निश्चिंत होकर चला गया था। ठंडी आह लेकर वह बाहर आई बरसात पहले ही थम गई थी। सामने पहाड़ों में लालिमा लिए सूर्योदय हुआ। आंगन में पशुओं का क्रंदन सुन उन्हें खोला मुर्गियों का दरवाजा खोल दिया।
नौकर मल्लू को बुलाकर बोली कि रात कुलकर्णी हृदयाघात से चला गया। दिया लगाने तक वह चल बसा। सेवक ने पूछा अब क्या करना हैं दीदी! मैं बड़े कुलकर्णी से बात करूंगी, देखते हैं क्या होगा। सेवक ने भैंस दुह कर दूध दिया चाय पी कर दुख भरे मन से पशुओं को भेज आंगन साफ़ करने को कहने लगी कि ब्राह्मण आयेंगे अपने आदमी का दाह संस्कार करेंगे।
ख़बर सुन कर सब दंग रह गए, दया, अनुकंपा, अंत:करण से दुख बांटने लगे। मरे हुए की बुराई नहीं की जाती। तरह तरह की बातें ब्राह्मण का शूद्र के घर प्राण त्यागना, कर्मों का फल हैं सब..
एक बुढिया ने कहा उसे अपनी जाति की औरत नहीं मिली? अब बहिष्कार डाले हुए का दाह संस्कार कौन करें। मरा या मारा कहा नहीं जा सकता।
सिनंगी को कई तरह की बातें सुननी पड़ी।
कुलकर्णी के भाई ने पल्ला झाड़ा। अब मठ के स्वामी की सहमति के बिना शव उठ नही सकता। उसकी संतान भी नही हैं।
सिनंगी अपने आंगन में थी। वह शव पर सिर रख रोने लगी।
सूरज सिर पर दहक रहा था पर गांव की मक्खी तक शव देखने सिनंगी के घर नहीं आई। अंधेरा होने से पहले सिनंगी उठी। वह तेजी से मुस्लिम गली की ओर चली, वहां गुड़ी साब की मदद से चार आदमी को मजदूरी का वादा कर बैलगाड़ी, लकड़ियां, उपले की व्यवस्था की। बैलगाड़ी में शव रख कर ब्राह्मणों के शमशान में राघवेंद्र कुलकर्णी का दाह संस्कार किया हाथ जोड़ कर विदा किया, आदमियों को उनका मेहनताना दिया, घर आकर सफाई की स्नान किया।तब तक आग लगा कर सूर्य पश्चिम दिशा में अस्त हो चुका था।
अगले दिन गांव में ढोल बजा कि ब्राह्मण शमशान भूमि में कुलकर्णी की अंत्यक्रिया करने के अपराध में सिनंगी को पंचायत में हाज़िर होने को कहा गया था। मठ में पंचायत में सिनंगी पर दंड लगाया गया जिसे उसने मान लिया और तेजी से घर जाकर कुलकर्णी की अस्थियां, राख की गठरी खोल कर उन पर बिखेर दी कहा अब आप जानें और आपका शव। और गांव को त्याग दिया
सिनंगी का दुस्साहस देख पंचायत सदस्यों के मुंह पर मुर्दांगी छा गई, विकार, निर्लिप्त भाव से वहां से जाने लगे।
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डॉ. मैत्री सिंह
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