Friday, December 29

भिखारण मैम - डॉ. मीनाक्षी सूर्यवंशी (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "कलम मेरी पहचान")

  (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन  "कलम मेरी पहचान")





भिखारण मैम
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    "जी साहब कितने दे दूं ????? थोड़ा जल्दी कीजिए, आज बहुत डिमांड है पेपर की......भला हो भिखारन मैम का, जिसने आज हम गरीबों को जैसे अमीर बना दिया"।

    "सुनकर अचानक मैंने कहा, मुझे भी एक दे दो.... अरे क्या अखबार भी पांच रूपये का होता है???

    जी साहब.... आज तो पांच रूपये में ही मिलेगा"। 

    "अखबार कम है और पढ़ने वाले ज्यादा है, सुनकर मैं और उत्सुक हुआ और जल्दी से पांच रूपये निकाल कर दे दिए। मेरे मन में एक अजीब सा उत्साह था, आज के अखबार को देखकर लगा.... क्योंकि मैंने पहली बार दो रूपये का अखबार पांच रूपये में लिया। उस अखबार वाले बच्चे की उत्सुकता या यूं कहूं खुशी और  भिखारन मैम"!!!!

    "भिखारन मैम का उच्चारण मुझे विवश कर रहा था कि मैं पूरा अखबार एक साँस में पढ़ लेना चाहता था, तभी अचानक पुलिस की गाड़ियों का सायरन और लंबी चेकिंग की कतार ने मेरी उत्सुकता को और बढ़ा दिया"।

    "मैंने अपने मित्र को गाड़ी साइड में लगी चाय दुकान पर रोकने को कहा ,तो वह आश्चर्यचकित हो गया क्योंकि, शायद बहुत कम मौके ऐसे होते हैं जब मैं चाय का ऑफर दु"!!

    वह बोला वाकई भला हो कौन भिखारन मैम........ जिसकी दुआ से इन जनाब ने हमें चाय के लिए तो पूछा, "इतना कहते  उसने गाड़ी साइड में लगाई, मैं तो जैसे बच्चों को मिले हुए उपहार की तरह तुरंत अखबार को खोलकर देखना चाहता था। लेकिन चाय दुकान पहुंचते ही उसकी जरूरत ही ना पड़ी, क्योंकि हमारे यहां पर चाय की दुकान ही सबसे बड़ा न्यूज़ चैनल होता है"। 

    "वहां हर प्रकार की खबर गर्म चाय के साथ चटपटी होकर पूरी चर्चा के साथ सुनने को मिल जाती है। यही सोच कर मैंने चाय वाले से पूछा, क्या चाचा कौन भिखारन मैम है???

    "जो आज इतनी चर्चा का विषय है और अचानक इतनी पुलिस हमारे शहर में, क्या कोई लूट हुई है जो इतनी चेकिंग?? लगता नहीं आज हम ऑफिस पहुंचेंगे"??

    "चाय वाला बोला हां बाबू सोचा तो हमने भी नहीं था कि एक गुब्बारे बेचने वाली और कभी-कभी मंदिरों में भीख मांगती हुई देखी जाने वाली भिखारन इतनी बड़ी ऑफिसर निकलेगी"। 

    "यह सब उनका ही कमाल है, अब ना जाने किस-किस की बारी आएगी ऐसे और कुछ ऑफिसर हो जाए ना बाबू तो सारा सिस्टम सुधर जाए"। 

    "बड़ी आग लगी पड़ी थी यहां ,कहने को तो बड़ा शांत लगता है यह शहर लेकिन सोचा नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है हमारे यहां....वाकई कितना घिनौना है, यह सब को सजा होनी चाहिए, मरेंगे सब की सब......

    "ऐसा लगा जैसे अपने जन्मों की भड़ास निकाल रहा हो, लगातार एक साथ में बोलते ही जा रहा था, तभी अचानक रुक कर बोला साहब आप पुलिस वाले तो नहीं हो.......नहीं तो आज हमारा बेड़ा गर्त हो जाएगा"। 

    "हम तो बस ऐसे ही कह दिए सब थोड़ी एक जैसे होते हैं, लगा सुनकर जैसे अचानक वो प्रायश्चित करने लगा हो"। 

    "अरे नहीं चाचा हम भला कहां..... बोल कर मैंने पैसे दिए और जल्दी से आकर दोनों गाड़ी में बैठ गए"!!

    "चूकि ट्रैफिक थोड़ा कम हुआ, दफ्तर जाने की थोड़ी जल्दी ने हमें विवश कर दिया कि हम अति शीघ्र पहले ऑफिस पहुंचे और सारा दिमाग हमने आज दिन भर के एक्टिविटी चार्ट,प्लान पर लगा दिया"। 

    "लेकिन दिल में बार-बार वही सब और आखिर कौन है????यह जानने की उत्सुकता और प्रबल होती जा रही थी। जल्दबाजी में हम दफ्तर पहुंचे तो वहां पर भी चर्चा का विषय था"। 

    "जैसे आज सब का एक्टिविटी चार्ट बदल गया हो। अब मुझसे रहा नहीं गया, मैंने एक गिलास पानी बुलाया और सब काम छोड़कर पेपर हाथ में लिया और जैसे ही पेपर खोला ही था कि जोरदार फोन की घंटी ने मुझे फिर पेपर रख देने पर मजबूर कर दिया"। 

    "ऐसा लगा मानों किसी बच्चे के हाथ से उसका नया खिलौना छीन लिया गया है, और मैं गुस्से से सर के चेंबर तरफ गया ,जैसे ही मैं वहां पहुंचा, उन्होंने मेरे हाथ में पेपर देते हुए बोले, अरे यार यह तो भिखारन है ना, जो उस दिन तुमसे बात कर रही थी और जिसे तुम अक्सर एक्स्ट्रा टीप दिया करते थे"। 

    "मैंने उनके उलाहना पर ध्यान न देकर उनके हाथ से पेपर खींचकर पूरी सरसरी निगाह से पूरा न्यूज़पेपर को देखा और खुशी से झूम उठा और मैंने कहा यही है, और आप जैसा सोच रहे हैं, वह भी सही है"। 

    "सुनते ही जैसे उनके चेहरे का रंग फीका पड़ गया और मैं आतुरता से सब काम छोड़,ऑफिस से बाहर की और भाग आया"!!!!

    "मुझे देखकर वह अवाक से रह गए ,क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ था मेरे दिमाग में अजीब सी उत्सुकता के साथ ना जाने कितने सवाल और पुरानी यादें घूमती चली गई"। मैं एक अजीब से अनुभव में दौड़ा चला जा रहा था, लेकिन कहां कुछ पता नहीं.......

    "कल ही मैंने उसके मुंह से (भिखारन) सुना था  चिंता मत करो बाबू कल का अखबार सिर्फ हमारा ही होगा। यह सुनकर अचानक मेरे चेहरे  पर मुस्कुराहट आ गई। मैं अचानक मंदिर के सामने जा पहुंचा और किसी को तलाशने लगा"। 

    "तभी सामने एक बच्चा गुब्बारे लिए हुए मेरे पास आया और मुझे एक लिफाफा हाथ में थाम कर मुस्कुराकर चला गया। मैंने आश्चर्य से पूछा, यह क्या ?बच्चा बोला गुब्बारे वाले ने दिया, खुद ही देख लो"। 

    "मैंने घबराकर लिफाफा खोला, जिसमें एक खत था, जिसमें लिखा था......मुझे मालूम है कि आप मुझे ढूंढते हुए जरूर आओगे  इसीलिए सिर्फ इतना कहूंगी कि मैंने अपनी जिंदगी में एक मात्र ऐसा इंसान देखा जिसमें मैं अपने जीवन साथी की तलाश करती हूं, मैं जानती हूं कि आप जानबूझकर ऊंचे दामों पर गुब्बारे खरीद कर हम जैसे लोगों को (गरीब) स्वावलंबी बनाने के लिए उन चीजों को भी खरीदते हैं, जिनकी उन्हें कोई आवश्यकता नहीं होती। सिर्फ इसलिए कि हम स्वावलंबी बन सके"।

    "धन्यवाद मैं आपकी ऋणी हूं जो आपने मुझे उस रूप में भी स्वीकार करने के लिए हामी भरी, जिसे समाज में  धूतकारा जाता है। आज मेरा मिशन पूरा हुआ, मैं यहां बच्चों की खरीद-परोख्त (स्मगलिंग )के गिरोह का पर्दाफाश करने इस तीर्थ स्थान पर आई थी, घुमक्कडी बनकर.....जो पूरा हुआ"!!!

    "पुनः धन्यवाद आपका, अगर आप चाहे तो आपको सादर आमंत्रित करना चाहूंगी और अपने परिवार से मिलवाना चाहूंगी। आपकी अपर्णा चौधरी आईपीएस (भिखारन मैम)..... अत्यंत खुशी के साथ मैंने खत को जेब में रखा। उस घुमक्कडी और भिखारन मैम के बताए पते पर निकल पड़ा"।


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© डॉ. मीनाक्षी सूर्यवंशी

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