(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "कलम मेरी पहचान")
हुई जिंदगी से जिरह,
मन को हमने भी टटोला !
तो पाई हमने मन में कुछ गिरह..
हमें जब जिंदगी का आया ख्याल,
जिंदगी को हमने पाया बेहाल!
कुछ उलझी सी कुछ सहमी सी,
खुशियां कहीं गुम,
मिली बस नमी सी!
जिरह जिंदगी से अब करना छोड़ दिया
करते नहीं अब जिंदगी से कोई तकरार,
करती रहे अपनी मर्जी हमें क्या यार!
मनमर्जियाँ अब हम करेंगे...
भागती रहे जिंदगी हम भी उसे रोकेंगे नहीं,
हो जा कुछ वक्त के लिए तू ओझल
हम तुझे टोकेंगे नही!
तू कभी मुझे सुनती नहीं,
ख्वाब जो देखू उसे बुनती नहीं!
ताकती रहती है दूर से,
ना सुन चाहे तू हम जिएंगे गुरुर से!
जिंदगी कैसे समझे तुझे
हर पल तू रुख अपना मोड़ लेती है,
बदलती है तू पल पल रंग हर नया ओढ़ लेती है!
जब लगता है तुझमें आया है ठहराव..
कभी खुशी कभी नमी
कभी संजीदा तो कभी जिंदादिली
तू बदल लेती है ठिकाना,
होता नही तेरा कोई एक आशियाना!
तू जो इतना सताती है
ऐसी भी क्या है हमारी खता,
तू इतना तड़पाती है जैसे
आशिक हो कोई बेवफा!
जिंदगी अब नही करते कोई जिरह,
तू भी रख ना कोई गिरह!
बस इतना बता दे कैसे करे तुझसे निबाह,
राब्ता है तुमझे चले कैसे संग एक ही राह!
तू बता तेरी चाहत क्या है,
कैसे जिएं हम तेरी राहत क्या है!
यूं खामोश ना रह खोल अपने मन की गिरह,
बता अपनी रजा भी करेंगे तूझसे जिरह!
क्यों बनती है तू इतनी मगरुर,
किस बात का है तुझे शुरूर!
हमारे बिन जिंदगी तेरा भी नही कोई वजूद,
हमारे बिन तू भी ना रहेगी मौजूद!
चल छोड़ दे मेरा साथ,
मै भी कह देती हु अलविदा ना थामु तेरा हाथ!
मेरा तुझसे नही खुद से है वजूद,
हूं जिंदा मैं मुझमें हूं मौजूद...
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© काव्या सोनी
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