(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "कलम मेरी पहचान" साझा संकलन से)

कर्मक्षेत्र के सघन वन में,
निर्भय भाव लिए तू बढ़।
लाख आए चाहे बाधाएं,
दृढ़-प्राचीर तू बनकर अड़।
संकल्प यही, यही आशा,
एक ध्येय,एक अभिलाषा।।
शैल-शिखर है लक्ष्य तेरा,
ऊंचाइयों से तू ना डर।
आत्मविश्वास से लबरेज,
बढ़ता जा तू होकर निडर।
संकल्प यही, यही आशा,
एक ध्येय,एक अभिलाषा।।
राह में कई ठोकरें मिलेंगे,
मिलेंगे बाधाएं संग-संग।
गिरना-उठना तो क्रम है,
रोकना न तू बढ़ते कदम।।
संकल्प यही,यही आशा,
एक ध्येय,एक अभिलाषा।।
जैसे गिरती है मस्त नदियां,
हो जाती है सागर विराट।
बांट न जोह तू किसी की,
हर एक राह तू नित पाट।।
संकल्प यही, यही आशा,
एक ध्येय,एक अभिलाषा।।
जैसे सूर्य अग्नि-सा जल,
देता है वो जीवन निश्चल।
संघर्षों से तू भी लड़ कर ,
अग्निपथ से न हो विकल।
संकल्प यही,यही आशा,
एक ध्येय,एक अभिलाषा।।
कर्मक्षेत्र के सघन वन में,
निर्भय भाव लिए तू बढ़।
लाख आए चाहे बाधाएं,
दृढ़-प्राचीर तू बनकर अड़।
संकल्प यही, यही आशा,
एक ध्येय,एक अभिलाषा।।
💐💐💐💐💐💐
पी यादव 'ओज'
साहित्यकार
चौकीपाड़ा, झारसुगुड़ा।(ओडिशा)
99375 10641
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