Friday, December 22

राष्ट्रीय गौरव नेताजी सुभाष चंद्र बोस - पूर्णिमा ढिल्लन (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "कलम मेरी पहचान" )

 (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित साझा संकलन "कलम मेरी पहचान" )



     
राष्ट्रीय गौरव नेताजी सुभाष चंद्र बोस
💐.....................................................................💐

    साथियों ! हमारी जिंदगी का हर पल हर दिन महत्वपूर्ण होता है ,क्योंकि हर क्षण हम जीवन को उत्तरोत्तर प्रगति की ओर ले जाने की दिशा में सोचते हैं, कार्य करते हैं । परंतु कुछ दिन ऐसे होते हैं जो इतिहास में अमर  बन जाते हैं ।वह ऐसी याद बन जाते हैं जो ज़हन कभी मिटा नहीं पाता ।दिन महीने वर्षों का समय भी उन यादों को धुंधला नहीं कर पाता जब भी ऐसी यादों के साए में जीवन जाता है वह सुबह की सुनहरी धूप की तरह ताजा हो जाती है ।जीवंत हो जाती हैं ।इतिहास में ऐसे ही एक दिन 123 वर्ष पूर्व एक महान व्यक्तित्व ने दुनिया में पदार्पण कर इस देश को कृतज्ञ किया था। उस विस्मयकारी अद्भुत प्रतिभा के धनी अविश्वसनीय क्षमताओं से परिपूर्ण ओजस्वी व्यक्तित्व को हम सुभाष चंद्र बोस के नाम से पहचानते हैं ,और सम्मान के साथ उन्हें नेताजी संबोधित करते हैं ।उनकी निडरता और साहस इन पंक्तियों में प्रकट होता है.......

    "सर पर कफन बांध कर चलते हैं हम,

    मौत को अपना हमसफर मानते हैं हम,

    आ जाएं कितनी भी बाधाएं राह में,

    आजाद हिंदुस्तान को करा कर रहेंगे हम !

    जब ऐसा जज्बा हो तो देश को आजाद होने से कौन रोक सकता थाl

    नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जीवन यात्रा सदाबहार नदी की तरह दुध॔ष  भरी आत्मकथा है। जो अपने में सत्य को चरितार्थ किए ज्ञात अज्ञात  दिशोन्मुख   होती हुई कभी विराम नहीं लेती। जैसे नदी कभी मरती नहीं सदा समर्पित होती है, ठीक उसी तरह सुभाष का जीवन सदा देश के लिए समर्पित रहा । !जिसने जन्म तो लिया परंतु जो मरा नहीं! निसंदेह उनका जीवन मरने के लिए नहीं सदा जीते रहने के लिए ही हुआ था। ऐसे महापुरुष तपस्वी योगी और कालजई व्यक्तित्व वाले सुभाष का जन्म 23 जनवरी 1897 में उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था l धार्मिकता और राष्ट्रभक्ति उन्हें अपनी माता प्रभावती और पिता जानकीनाथ बोस से मिली थीl उनकी माता स्वामी रामकृष्ण परमहंस की परम भक्त थीl वह अपने माता-पिता की नौवीं संतान थे, कहावत है पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं बचपन से ही उनके क्रियाकलाप यह संदेश देने लगे थे कि बड़े होकर वह एक महान पुरुष अवश्य बनेंगे। मां से पौराणिक कथाएं सुनते सुनते वह भगवान शिव का अनुसरण करने लगे। एक बार उनकी मां ने उन्हें दुर्गा मां का प्रसाद दिया ,तो वह मां से बोले ,क्या दुर्गा मां का प्रसाद ग्रहण करने से उनके अंदर मां दुर्गा की शक्ति आ जाएगी ।मां दुर्गा शक्ति की देवी है उनकी पूजा अस्त्र शस्त्रों से की जानी चाहिए। ऐसा कहते हुए सुभाष ने मेज से चाकू उठाया और अपनी उंगली काट कर मां दुर्गा के चित्र पर खून का तिलक लगाकर नतमस्तक किया। मां प्रभावती स्तब्ध रह गई इसी तरह बचपन की एक और घटना ने मां को यह एहसास करा दिया था कि उसका बेटा मनुष्य नहीं अवतार है। एक दिन सुभाष की अलमारी में सूखी रोटियों को देख मां ने पूछा यह रोटियां क्यों रखी है , तब सुभाष बोले " मैं अपने हिस्से की दो रोटियां रोज बचाकर एक बूढ़ी भिखारिन को दिया करता था अच्छा हुआ, मां तुमने फेंक दी, अब इसकी जरूरत नहीं है, उस भिखारिन का स्वर्गवास हो गया है इतना कह कर सुभाष सिसकियां भरने  लगे बेटे की सहृदयता और उदारता को देख मां गदगद होकर बोली तुझे जन्म देकर सचमुच मेरी कोख धन्य हो गई ।

    विद्यार्थी जीवन से ही सुभाष बोस अपने राष्ट्रप्रेम के लिए जाने जाते थे। कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने प्रोफेसर ब्लेंटन को तमाचा मारा ।इस घटना का कारण उनका भारत विरोधी वक्तव्य और भारतीय विद्यार्थियों के प्रति अपमानजनक व्यवहार था। 1920 में अपने पिता की इच्छा पूर्ण करते हुए उन्होंने इंग्लैंड में इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा चौथे स्थान के साथ उत्तीर्ण की। परंतु जालियांवाला बाग हत्याकांड से व्यथित होकर विरोध स्वरूप 1921 में 24 वर्ष की आयु में इंडियन सिविल सर्विस से त्यागपत्र दे दिया, और सक्रिय राजनीति में उतर पड़े ।

    भारत वापस आने पर गांधीजी से प्रभावित होकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सम्मिलित हो गए ।सर्वप्रथम देशबंधु चितरंजन दास के सानिध्य में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया, जिसे बाद में बोस ने अपना राजनीतिक गुरु माना। वह स्वामी विवेकानंद जी से भी विशेष रूप से प्रभावित थे 25 वर्ष की आयु में सुभाष चंद्र बोस ने संपूर्ण बंगाल युवक सम्मेलन का गठन किया। 27 वर्ष की आयु में कोलकाता नगर निगम के मेयर चुने गए ।1928 में बंगाल प्रांतीय कांग्रेस समिति ( बी पी सी सी ) के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1930 तक सुभाष चंद्र बोस एक विस्तृत  रणनीति की संरचना कर चुके थे ।

    मांडले जेल में बिताए वर्षों और अलीपुर जेल में बिताए अल्प समय के दौरान उन्होंने अनेक राजनीतिक विचारधाराओं की पुस्तकों का अध्ययन किया ।1925 से 1927 तक वह बर्मा में नजरबंद रहे। 1928 में कांग्रेस द्वारा नियुक्त मोतीलाल नेहरू समिति ने "डोमिनियन स्टेटस " के पक्ष में अपना प्रस्ताव घोषित किया ।

    परंतु पंडित जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने इसका विरोध करते हुए भारत की स्वतंत्रता से कम किसी भी प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान वह जेल गए। 1931 में गांधी इरविन समझौता होने के बाद जेल से रिहा होने पर उन्होंने इस समझौते का और विशेष रूप से भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्थगन का कड़ा विरोध किया।

    1933 से 1936 तक सुभाष बाबू यूरोप  में रहें। यूरोप में रहते हुए उन्होंने अपनी आत्म कथाएं  "द इंडियन स्ट्रगल "और  "द इंडियन पिलग्रिम" लिखी नेताजी में उच्च कोटि की लेखन क्षमता थी। अपने लेखन कार्य में सहयोग के लिए उन्होंने 1934 में टाइपिंग के कार्य के लिए एमिली शेकल को  रखा बाद में उन्हें एमिली शेकल से प्रेम हो गया। 26 दिसंबर 1937 में उन्होंने एमिली से विवाह कर लिया जो काफी गुप्त रखा गया ।29 नवंबर 1942 में उनकी बेटी अनिता बोस का जन्म हुआ ।

    1938 में सुभाष चंद्र बोस हरीपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने सभी राष्ट्रीय नेताओं की उपस्थिति में हुए ध्वजारोहण समारोह में उत्प्रेरक घोषणा की ...." धरती पर ऐसी कोई ताकत नहीं जो अब भारत को पराधीन रख सके ।" पुनः 1939 में वह गांधीजी तथा कांग्रेस के प्रत्याशी डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया  को परास्त कर त्रिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए । इस विजय ने उन्हें राजनीतिक उत्कर्ष के उच्च शिखर पर पहुंचा दिया। मगर गांधी जी के इस बयान पर कि "सीता रमैया की हार उनसे अधिक मेरी हार है।" गांधी जी के साथ वैचारिक मतभेद के चलते उन्हें यह अहसास हो गया था कि महत्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं का सहयोग उन्हें प्राप्त नहीं होगा। अतः उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 1939 ईस्वी में सुभाष चंद्र बोस ने फॉरवर्ड ब्लॉक नामक नए दल की स्थापना करके देश की वामपंथी शक्तियों को एकजुट करने का प्रयत्न किया। मगर इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली मार्च 1940 में उन्होंने ब्रिटिश सरकार से विरोधी सम्मेलन का सभापतित्व  किया ।उन्होंने कहा वर्तमान दौर साम्राज्यवाद विरोधी दौर है साम्राज्यवाद का अंत करना और भारतवासियों को राष्ट्रीय स्वाधीनता प्राप्त कराना ही हमारा मुख्य उद्देश्य है।

    सरकार ने बोस की गतिविधियों को खतरनाक समझकर उन्हें 1940 में गिरफ्तार कर कोलकाता जेल में भेज दिया। सुभाष बोस ने अपनी गिरफ्तारी के विरोध में अनशन किया अत उनका स्वास्थ्य खराब होने पर उन्हें घर में ही नजरबंद कर दिया गया। 17 जनवरी 1941 की रात को वह पुलिस को चकमा देकर पठान के भेष में कोलकाता से पेशावर पहुंच गए ।उन्होंने अपना नाम जियाउद्दीन रख लिया और अपने साथी भगतराम तलवार की सहायता से 21 जनवरी 1941 को काबुल पहुंच गये ।वह भगतराम की गूंगे बहरे चाचा बन कर रहे ।पहाड़ियों में पैदल चलते हुए उन्होंने यह सफर पूरा किया काबुल में सुभाष बाबू 2 महीनों तक उत्तमचंद मल्होत्रा नामक एक व्यापारी के घर रहे तत्पश्चात ओलार्डो मात्सुता नामक इटालियन व्यक्ति बनकर काबुल से रूस की राजधानी मास्को होते हुए जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुंचे।

    शत्रु का शत्रु मित्र है। इस सिद्धांत पर विश्वास करते हुए उन्होंने ब्रिटेन के विरुद्ध जर्मनी और जापान का सहयोग प्राप्त किया। तब तक जापान ने सिंगापुर पर अधिकार कर लिया था। जापान में जनरल मोहन सिंह ने फरवरी 1942 में "आजाद हिंद फौज" की स्थापना की थी ।सिंगापुर में बंदी बनाए भारतीय सैनिकों को जापान ने जनरल मोहन सिंह को सौंप दिया ।जिससे उन्होंने "आजाद हिंद फौज "बनाई ।तत्पश्चात आजाद हिंद फौज की कमान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने संभाल ली, जो उस समय ब्रिटिश सरकार से बचने के लिए टोक्यो में रह रहे थे । 2 जुलाई 1943 को नेताजी जर्मनी की पनडुब्बी में 3 माह की कठिन यात्रा कर सिंगापुर पहुंचे । 5 जुलाई 1943 को आजाद हिंद फौज को सशक्त बनाने के लिए नेताजी ने उसका नेतृत्व संभाला। और इस तरह मृत पड़ी हुई आजाद हिंद फौज को पुनर्जीवित किया ।इस दिन पहली बार सर्वोच्च सेनापति के रूप में उन्होंने अपनी फौज से कहा...." हथियारों की ताकत और खून की कीमत से तुम्हें आजादी प्राप्त करनी है lमैं वादा करता हूं दुख और सुख व्यथा और विजय में मैं तुम्हारे साथ रहूंगाl वर्तमान में मैं तुम्हें भूख, प्यास, अभाव, थकावट और मृत्यु के सिवा कुछ नहीं दे सकता ! पर अगर तुम जीवन और मृत्यु पथ पर मेरा अनुसरण करोगे, तो मैं तुम्हें विजय और स्वाधीनता तक ले जाऊंगा l" मेरे वीरो!

    तुम्हारा उद्घोष होना चाहिए.... दिल्ली चलो! दिल्ली चलो ! आजादी की लड़ाई में हम में से कितने बचेंगे, मैं नहीं जानता !पर यह जानता हूं कि अंत में हम जीतेंगे ! जब तक हमारे बचे हुए योद्धा , ब्रिटिश साम्राज्यवाद की कब्रगाह  दिल्ली के लाल किले पर परचम लहरा नहीं लेते हमारा मकसद पूरा नहीं होगा l हमें अपना सर्वस्व बलिदान कर देश की स्वतंत्रता को प्राप्त करना है उनका उद्घोष था "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा" उनके इस जोशीले भाषण ने सेना में जोश भर दिया l

    21 अक्टूबर 1943 को उन्होंने आजाद हिंद फौज के अस्थाई सरकार का गठन कियाl जिसमें स्वयं की मुद्रा, डाक टिकट, संविधान आदि जारी किया गया जिन्हें 9 देशों जर्मनी, ,जापान, इटली, चीन ,वर्मा ,मंचूरिया ,फिलीपींस और यूएसएसआर ने मान्यता भी दी l यह वह स्वर्णिम दिवस था जिस दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने पद की शपथ ग्रहण करते हुए कहा....." परमात्मा के नाम पर, मैं यह पवित्र शपथ ग्रहण करता हूं कि मैं भारत और उसके 38 करोड़ लोगों को स्वतंत्र कराऊंगा और  मैं इस पवित्र युद्ध को जीवन की अंतिम सांस तक जारी रखूंगाl "

    नेताजी महिलाओं का बहुत आदर और सम्मान करते थे ,उनका मानना था की दासता से मुक्ति के लिए पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का सशक्त योगदान जरूरी है। इसके लिए उन्होंने रानी झांसी रेजिमेंट की स्थापना की। डॉक्टर लक्ष्मी स्वामीनाथन इस रेजीमेंट की कैप्टन बनीl

    नारी सेना के प्रशिक्षण स्थल का उद्घाटन करते हुए नेता जी ने कहा ...."यदि झांसी के स्वाधीनता के लिए भारतवर्ष एक लक्ष्मीबाई को जन्म दे सकता है ,और उसने उसे जन्म दिया भी! तो मेरा विश्वास है  ! संपूर्ण देश की स्वाधीनता के लिए और 48 करोड़ देशवासियों की मुक्ति के लिए हजारों झांसी की रानियों को जन्म दे सकता है ,और देगा ! और इस तरह हजारों महिलाएं इस रेजीमेंट में शामिल हो गईl

    नेताजी का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि कोई भी कि कोई भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता थाl

    मेरा जीवन भी एक ऐसे व्यक्ति के सानिध्य में गुजरा  जिनकी जीवन रेखा नेताजी के व्यक्तित्व में से होकर गुजरती थीl इसीलिए मेरा "आजाद हिंद फौज "से बहुत गहरा रिश्ता है। मैं दिल्ली लाल किले के ऐतिहासिक मुकदमे के हीरो कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों की पुत्रवधू हूं। मेरा विवाह कर्नल ढिल्लन साहब के बड़े पुत्र श्री अमरजीत सिंह ढिल्लन के साथ संपन्न हुआ था। मेरा वैवाहिक जीवन शिवपुरी से 15 किलोमीटर दूर हातोद गांव से प्रारंभ हुआ lउनके सानिध्य में रहते हुए मुझे अपनी दादी सास ढिल्लन साहब की मां की सेवा करने का भी सौभाग्य मिलाl 1947 में जब देश आजाद हुआ तब आजादी की सारी खुशी को बंटवारे का गम निकल गया तब ढिल्लों साहब पूरी तरह टूट गए और मध्यप्रदेश मे शिवपुरी के पास हातोद गांव के जंगलों में जाकर बस गए ।1953 से लेकर उन्होंने पूरा जीवन इन्हीं जंगलों में गुजारा उनके सानिध्य में रहते हुए जो संस्कार ,आदर्श ,देश प्रेम ,देशभक्ति के बीच हमारे अंदर रोपित हुए उसी धरोहर को हमारी बेटियां आज भी संजोए हुए हैं

    यहां मैं कर्नल ढिल्लों साहब के जीवन के उन सभी पहलुओं पर प्रकाश डालना चाहती हूं,,जिसने उन्हें इस अथाह ऊंचाई तक पहुंचाया! कर्नल ढिल्लन साहब का जन्म 18 मार्च 1914 को लाहौर के अलगो गांव में हुआ ।वह सिपाही के रूप में पंजाब रेजीमेंट में भर्ती हुए ।इसके पश्चात इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून में उनका चयन हुआ ।मार्च 1940 में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन मिला ।मार्च 1941 में 14वी पंजाब रेजीमेंट की पहली बटालियन के साथ मलाया गए ।और  मलाया अभियान के दौरान जापानियों के विरुद्ध युद्ध में सक्रिय भाग लिया ।बाद में नेता जी ने उन्हें फोर्थ गोरिल्ला रेजीमेंट "द नेहरू ब्रिगेड" की कमान सौंपी ।आपने इरावदी  नदी के दक्षिण क्रॉसिंग पर न्यागू और पेगान मे जनरल सर विलियम स्लिम की 14 वी फौज से लड़ाई लड़ी ।इस कार्रवाई के बाद नेहरू ब्रिगेड के ( Mount Pope and kyauk Padaung ) माउंट पोपा और  क्योंक पंडाग  और इरावदी  के क्षेत्रों में आई एन ए की डिवीजन संख्या दो में अभियान की कार्यवाही की, जो मेजर जनरल शाहनवाज खान की कमांड में थी ।इस सैनिक कार्यवाही के कारण दिल्ली के लाल किले में आप पर मुकदमा चला ।स्वतंत्रता संग्राम में आपके द्वारा किए गए योगदान के लिए 1972 में ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया 1992 में नेताजी रिसर्च ब्यूरो कोलकाता द्वारा नेताजी पुरस्कार प्रदान किया गया। 26 नवंबर 1995 को राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने "सलीमगढ़ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय " का उद्घाटन किया जो कि दिल्ली लाल किले में स्थित है। 14 दिसंबर 1995 को भारत सरकार द्वारा आजाद हिंद फौज के सेनानियों को अपने युद्ध के दिनों की याद को ताजा करने के लिए एक अभियान सिंगापुर म्यांमार और मलेशिया की यात्रा पर गया।  जिसमें कर्नल ढिल्लन साहब, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, कैप्टन एसएस यादव, व अन्य स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे। 15 अगस्त 1997 आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर देश के महान सपूतों पर डाक टिकट जारी किया गया।  ढिल्लन साहब का यह सौभाग्य था कि डाक टिकट उनके जीवनकाल में ही जारी हुआ। 12 अप्रैल 1998 को कर्नल ढिल्लन साहब को  पदम भूषण से सम्मानित किया गया

    नेताजी ने जब ढिल्लन साहब को फोर्थ गोरिल्ला रेजिमेंट "नेहरू ब्रिगेड "की कमान सौंपी तब ढिल्लन साहब ने नेताजी से कहा ...... " आप मुझे भेज रहे हैं, अब करने के लिए बचा ही क्या है l " नेताजी एकदम बोले----" आजादी की कीमत चुकानी है, इसकी परवाह नहीं कि हम आगे बढ़ते हैं या पीछे हटते हैं ।जब तक अंग्रेज भारत नहीं छोड़ते हम पीछे नहीं हटेंगेl" अंग्रेज आगे बढ़ रहे थे जापानी और हम पीछे हट रहे थे। ढिल्लन साहब ने इरावदी नदी पर न्यागू और पेगान का मोर्चा संभाला जो कि जनरल शाहनवाज खान की कमांड में था। युद्ध के समय एक ऐसा निर्णायक क्षण आया जब इनकी सेना को हथियार डालने पड़े। जैसे ही सैनिकों को पता चला हमें समर्पण करना पड़ेगा पांच छह सैनिकों ने आत्महत्या कर ली ।ढिल्लन साहब और शाहनवाज खान जी ने सारे सैनिकों को इकट्ठा किया और शाहनवाज जी अपनी पिस्तौल को माथे पर लगाते हुए बोले---" यदि अब किसी भी सिपाही ने आत्महत्या की तो मैं स्वयं को गोली मार लूंगा। उनके इस कदम से आत्महत्या तो बंद हो गई पर कुछ समय बाद जब युद्ध की कार्यवाही बंद होने पर थी कर्नल ढिल्लन साहब को अपेंडिक्स का अटैक हुआ ,वह दर्द से कराह रहे थे ,उनके बाएं पैर में मोच थी ,और सीने में गोली लगी थी। शाहनवाज जी ने उन्हें स्ट्रेचर  पर डाला और पास के गांव में ले गए। ढिल्लों साहब और शाहनवाज जी के बीच हथियार डालने की बातचीत चल रही थी ।शाहनवाज जी ने कहा---" मेरी पिस्तौल में 8 गोलियां है, मैं 6 गोलियां फेंक दूंगा और दो गोलियां अपने पास आत्महत्या करने के लिए रखूंगा " ढिल्लन साहब आत्महत्या शब्द से बहुत गुस्से में आ जाते थे। वह एकदम  स्ट्रेचर से उठकर खड़े हो गए और बोले----" आप खुदकुशी की बात सोच कैसे सकते हैं खुदकुशी तो कायरता है ,और नेताजी का सिपाही कायर नहीं हो सकता ।" शाहनवाज जी बोले , "जानते हो किससे बात कर रहे हो" ढिल्लन साहब ने अपने शब्दों को वापस लेते हुए माफी मांगी, और उनसे वचन लिया कि आप कभी ऐसा ख्याल भी मन में नहीं लाएंगे । उसके बाद जब समर्पण का समय आया तो शाहनवाज जी ने कहा , "मैं अपना हथियार अंग्रेजों को नहीं दूंगा उन्होंने अपनी पिस्तौल को चूमा माथे से लगाया और नदी में फेंक दिया" और रोते हुए  ढिल्लों साहब से बोले---- "बख्शी, यह तूने मुझसे  क्या करवा दिया।" और वही जमीन पर बैठकर आंसुओं से भीगी हुई जमीन पर भावनाओं का गुबार उड़ेलते हुए इकबाल का शेर लिखने लगे.........

    " उस मौज के मातम पर रोती है भंवर की आंख

    दरिया से तो उठी लेकिन साहिल से न  टकराई"

    17 मई 1945 में इंडियन नेशनल आर्मी ने समर्पण कर दिया इन्हें pegu जेल मे डाल दिया गया ।  31 मई को इन्हें रंगून जेल भेज दिया गया । 6 जुलाई 1945 मे इन लोगों को दिल्ली लाल किले में कैद कर दिया गया । ढिल्लों साहब बताते थे जब  आजाद हिंद फौज के 100 सैनिकों के साथ हम दिल्ली लाल किले में पहुंचे ,तो हम बहुत खुश थे,  कि हम लोग दिल्ली तो पहुंच गए! नेताजी का "चलो दिल्ली" का सपना तो पूरा हो गया l

    कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लन, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रेम कुमार सहगल ,और जनरल शाहनवाज खान तीनों को फांसी की सजा सुना दी गई। फांसी की सजा का सुनकर ढिल्लन साहब की पिताजी सरदार ठाकुर सिंह ढिल्लन उनके पास आए और बोले -----"तू अंग्रेजों से माफी मांग ले, तेरी सजा माफ हो जाएगी पर ढिल्लन  साहब ने कहा "भाइया जी ( पिताजी ) आप कैसी बात करते हैं, मैं अपने शहीद भाइयों को क्या मुंह दिखाऊंगा, मैं ऐसा नहीं कर सकता" जब वह नहीं माने तो पिताजी ने अपनी पगड़ी उतार कर उनके पैरों पर रख दी रोते हुए बोले-------" ठीक है अगर तू मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं तेरी मां को तेरे पास भेजूंगा"।

    दूसरे दिन मां से उनकी मुलाकात कराई गई , मां ने उनकी पीठ ठोकी, और बोली ---पुत्त तू धन्य है तू मेरी कोख सफल कित्ती ए , मैंन्नू  तेरे उत्ते नाज ए  ( तूने मेरी कोख सफल कर दी मुझे तुझ पर नाज है ) मां की बातों ने उन्हें और अधिक हिम्मत दी। ऐसी मां की सेवा कर मेरा जीवन भी धन्य हो गया । फिर उनकी पत्नी श्रीमती बसंत कौर ने अपने भाषण में कहा ----"अगर मेरा सुहाग बलिदान करने से देश आजाद हो सकता है तो मैं खुशी से  यह बलिदान कर दूंगी ।"

    मगर फांसी की सजा से एक दिन पहले ब्रिटिश सरकार में भर्ती भारतीय सैनिकों को काफी शर्मिंदगी महसूस हुई  उन्होंने राज भक्ति का चोला उतार फेंका , और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत कर दी। दिल्ली, मुंबई, मद्रास,कोलकाता ,कराची ,विशाखापट्टनम तक जल जहाजों में आग लगा दी। विद्रोह इतना बड़ा कि ब्रिटिश सरकार के लिए स्थिति को संभालना मुश्किल हो गया। तब तीनो की फांसी की सजा रद्द कर तीनों पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया गया ।

    जिनके पास मां का आशीर्वाद हो और पूरा देश उनके साथ हो, तो सरकार उनका बाल भी बांका नहीं कर सकती थी उस समय गली-गली चप्पे-चप्पे से गूंजती हुई आवाजों ने लाल किले की दीवारों को हिला दिया.......

    लाल किले से आई आवाज ,

    ढिल्लन सहगल शाहनवाज,

    तीनों की हो उम्र दराज,

    नेताजी जिंदाबाद!

    इंकलाब जिंदाबाद !

    कोमी नारा जय हिंद !

    हमारा नारा जय हिंद !

    लाल किला तोड़ दो,

    आजाद हिंद को छोड़ दो   !

    देश के बड़े-बड़े वकीलों ने मुकदमे की पैरवी की डॉ कैलाश नाथ काटजू ,भूलाभाई देसाई ,तेज बहादुर सप्रू , पंडित जवाहरलाल नेहरू की दलीलों और सूझबूझ के आगे अंग्रेज सरकार को हार माननी पड़ी । 3 जनवरी 1946 को इन तीनों को रिहा कर दिया गया।

    अंत में नेताजी के व्यक्तित्व को प्रदर्शित करती ढिल्लन साहब द्वारा लिखी यह पंक्तियां 

    हर लम्हा ढूंढता था जहां मौत को

    मौत थी ढूंढती हर लम्हें को जहां

    जिंदगी खेलती थी वहां बोस की

    मौत थी खेलती जिंदगी से जहां

    सोचिए तो जरा जर्मनी है कहां

    कहां से गए थे कहां और कहां

    जर्मनी और जापान तो इक तरफ

    सागरों का सफर डुबकनी कश्तियाँ 

    सर को अपने सरे -दस्त थामे हुए

    नेताजी बोस थे आगे-आगे रवा

    कदम उठते थे क्या फक्रों अंदाज से

    कराना आजाद था जब कि हिंदुस्तान

    प्यारा हिंदुस्तान न्यारा हिंदुस्तान

    गर्व है मुझे अपने देश पर , और नाज है स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और शहीदों पर । मेरा देश महान!

    धन्यवाद

    जय हिंद

💐💐💐💐💐💐

© पूर्णिमा ढिल्लन

95117 85254

----------------------------------------------------------




चलिए राष्ट्र को समर्पित करें अपनी कलम

हम सब मनायें आज़ादी का अमृत महोत्सव

 साहित्य से जुड़ने का अवसर, अपनी कविता/कहानी/साहित्यिक लेखों से प्रेरणा दें समाज को,,, 

अपनी रचना के प्रकाशन हेतु हमारी योजना का लाभ उठाएं Publish ur writing with ISBN

हर एक रचनाकार के लिए सूचना...

क्या आप अपनी रचना को विज्ञान की मदद से विश्वभर में उपस्थित पाठक तक पहुंचना चाहते हैं?

क्या आप भी भविष्य में साहित्यकार बनना चाहते हैं?

 गीता प्रकाशन की इस योजना से जुड़कर आप यह संभव कर सकते हैं।

जल्द आ रहा है एक साझा संकलन  
" साहित्याकाश रचनाकारों का ... "

प्रकाशित करेंगे जिसे ISBN भी प्राप्त होगा।

उसी रचना को हम हमारे ब्लॉगपोस्ट पर पोस्ट करेंगे जो विश्व में कोई भी कहीं भी मुफ्त में पढ़ सकेगा।

पुस्तक को amazon.in पर भी उपलब्ध कराया जाएगा।

है ना कमाल की योजना।

इस योजना से जुड़ने के लिए आपको बस हमें अपनी मौलिक रचना भेजनी है,,,

सदस्यता शुल्क 

₹500 कविता के लिए

₹1500 कहानी के लिए पर आपके लिए मात्र ₹1100

₹3000 साहित्यिक लेखों के लिए आपके लिए मात्र ₹1500

Gpay, ppay, Paytm 
9849250784

पुस्तक प्रकाशन के बाद 2 प्रति आप को घर पर भेजी जाएगी।

अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें
9849250784

प्राप्त रचना का प्रकाशन
पहले आओ
पहला स्थान पाओ 
के तर्ज पर किया जाएगा।
--------------------------------------------------------------------------
-----------------------------------------------------------------------
Call 9849250784 for more details on Book. 

Book Published by
GEETA PRAKASHAN
Hyderabad
6281822363
-----------------------------------------------------------------------------------------------------


scan to see on youtube



scan to join on WhatsApp

------------------------------------------------------------------------------


BOOK PUBLISHED BY :

GEETA PRAKASHAN

INDIA

Cell 98492 50784


---------------------------------------------------------------------------------

do you want to publish your writing through our BLOGPAGE ?

Please call us 62818 22363

No comments:

Post a Comment

एहसास की खुशबू - सोहन ‘समीं‘ (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "निवेश अक्षरों का")

    (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "निवेश अक्षरों का")     एहसास की खुशबू  💐.......................................💐...