(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)
बहुत याद आते हैं गाँव के वो दिन
वो बगिया, बगिया में आम, जामुन के पेड़
ढेल से, कभी पत्थर से
साधते अचूक निशाना
तोड़ते कच्ची पक्की अमियाँ
जान से प्यारी
वो अंटी में दबी नोन की पुड़िया
पुड़िया पर झपटते संगी साथी
कभी जमीन पर कभी पेड़ पर
खेलते झिल्लोपाती*
अचानक जामुन के पेड़ पर चढ़ते साथी
रीठा जामुन के चक्कर में
इस डाल से उस डाल पर
छलांग लगाते संगी साथी और
अचानक जामुन के साथ
डाली से टपकते साथी
मानों वख्त के पेड़ पर खड़े हों साथी
वो अठखेलियाँ, वो अल्हड़पन
भाई–बहनों का साथ
गिल्ली डंडे का खेल
कभी डंडे पर गिल्ली , तो कभी
गिल्ली पर डंडा जैसे
खेल रहे हों वक्त के साथ खेल
वो काँच के कंच्चे
कंच्चों को गुच्ची में डालना
कंच्चों से कंच्चों पर साधते निशाना
मानों हयात का कोई हो लक्ष्य पाना
कंच्चों के लिए आपस में लड़ना
झगड़ना
कंच्चों को जीतना–हारना
बिलकुल जिंदगी की जंग की तरह
और सुबह सब कुछ भूल जाना
जिंदगी के संगीत की तरह
बहुत याद आते हैं गाँव के वो दिन
याद आते है बरसात के दिन
छप्पर से टपकता पानी
पानी से बचते बचाते लोग
कच्चे मढ़ों की ओर खिसकाते खटिया
और कच्चे मढ़ों की सोटों से मुलकते साँप
वो घर का आँगन
आँगन में बरसता पानी
मानों जिंदगी का अर्थ हों समझाते
बहुत याद आते हैं गाँव के वो दिन
याद है खेतों की तंग मेणों पर
दौड़ना, गिरना, गिरकर फिर उठना
एकदम जिंदगी की दौड़ की तरह
चौपाल, चौपाल पर खड़ा नीम का पेड़
पेड़ के नीचे खटियों पर बैठे लोग
हुक्का गुड़गुड़ाते,चिलम सुलगाते लोग
एक दूसरे के साथ करते चुहलबाजी
हर कश में फ़िक्र उड़ाते लोग
चौपाल के कोने में बिछे
वो धान के पुआल के
नरम नरम , गर्म बिछौने
उन पर सोते चैन की नींद
सुनते दादा दादी की कहानी किस्से
सारंगी पर ढोला मारू के अफ़साने
एक ही रज़ाई में सिकुड़ते सिमटते
कभी इधर खींचते, कभी उधर खींचते
ढकने को अपना अपना बदन
बहुत याद आते हैं गाँव के वो दिन
याद आता है खलियानों में
गेंहूँ की राश** पर लेटना
लेटकर चाँदनी रात में
चाँद सितारों की आँख मिचौली देखना
देखते देखते सपनों की दुनियाँ में तैरना
याद आता है चुपके से
दोस्तों के साथ घर से बाहर जाना
वो बंबा (रजवाह), बंबा की पुलिया
पुलिया की वो खट्टी मीठी बातें
सच्ची मुच्ची बातें
बातों बातों में पुलिया से छलांग लगाना
जैसे तैर रहे हों जिंदगी के समुद्र में
बहुत याद आते हैं गाँव के वो दिन
चौपाल का वो चबूतरा
चबूतरे पर जलता अलाव
अलाव पर हाथ सेकते लोग
हथेलियों पर तंबाकू का रगड़ना
तंबाकू को साझा करते लोग
और अलाव पर
राजनीति से गहरी राज़नीति की चर्चा
बीड़ी के धुएँ में थकान उड़ाते लोग
करब का बोझ ढोते, ठहाका लगाते लोग
छोटी छोटी खुशियों में
दुनियाँ जहान की खुशियाँ मनाते लोग
एक दूसरे के लिए जीते
अपने पर हँसते, दूसरों को हँसाते लोग
अपने सुख दुख को साझा करते
ठहाका लगाते गाँव के लोग
बहुत याद आते हैं गाँव के वो दिन
पर आज जब भी जाता हूँ गाँव
पता नहीं कहाँ चले गए वो दिन
वे लोग ,वो कहानी, वे किस्से
गाँव की चौपाल पर आग तापते
प्यार से भी प्यारे वे लोग
गाँव हो या फिर शहर
मंजर कुछ ऐसा बदला
जिधर देखो, उधर नजर आते हैं
राजनीति के, ज़हर से भी ज़हरीले साँप
और ज़हरीले साँपों से डसे हुए लोग
बहुत याद आते हैं गाँव के वो दिन .
💐💐💐💐💐💐
© डॉ. चक्रपाल सिंह
स्वतंत्र टिप्पणीकार
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