(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "यादगार शब्दों का सफर" साझा संकलन से)
कौन कहता है कमतर होती हैं बेटियाँ
नाज़ुक हैं, मगर हौंसले बुलंद रखती हैं
बेटियाँ
यह झूठ है कि पराया धन होती हैं बेटियाँ
घर की आन, बान और शान बेटियाँ
पापा की हर सांस, माँ की धड़कन में
बस्ती हैं बेटियाँ
घर नहीं होता वो रोशन
जिस घर में नहीं होती बेटियाँ
रोशनी का दूसरा नाम बेटियाँ
कभी मुस्कान, कभी तमन्ना
तो कभी आँगन की कोयल बेटियाँ
सच मानो अपने आप में होती हैं
इक मासूम कविता बेटियाँ
चीं चीं करते ना जाने कब
फुदक बैठ पिता के कांधे पर
चहचहाने लगती हैं बेटियाँ
बस नहीं चलता उनका, वरना
पापा के ही दिल में
बना लें अपना घौंसला बेटियाँ
अपनी नन्ही नन्ही, नरम नरम
अंगुलियों की कंघी से
ना जाने कब पापा का
सिर सहलाने लगती हैं बेटियाँ
लगता है जैसे
जिंदगी का मर्म समझा रहीं हों बेटियाँ
लिपटे लिपटे माँ के आँचल
बाहों में पिता के झूलते झूला
ना जाने कब बड़ी हो जाती हैं बेटियाँ
कितना होता है उदास मन
घर से बाहर जब क़दम रखती हैं बेटियाँ
स्टेशन या फिर एयरपोर्ट पर
खड़े माँ बाप को
जब मुड़- मुड़ कर देखती हैं बेटियाँ
लगता है मन को जैसे
दिल-ए-आँगन से
रुख़सत हो रहीं हों बेटियाँ
फोन की घंटी, मोबाइल की टिन-टिन में
भी
नजर आती हैं माँ को बेटियाँ
जार जार होता है दिल
जब लग जाती हैं
दहेज भेड़ियों के हाथ
फूल सी नाज़ुक बेटियाँ
यदि बेटी ने नहीं जना बेटा
दकियानूसों के लिए
वंशहीन घोषित हो जाती हैं बेटियाँ
फिर ,
भीषण व्यंगों की तपिश के नीचे
एक वारिस की आश में
ना जाने कितनी बार
जीती और मरती हैं बेटियाँ, और
बेरहम इस दुनियाँ में
बेदखल हो जाती हैं बेटियाँ
कह दो उन मनहूसों से
वंश में बाधक नहीं होती बेटियाँ
वारिस का दूसरा नाम बेटियाँ
देश का भविष्य,सपनों का संसार
दो परिवारों के बीच
होती हैं सेतु बेटियाँ
बतला दो दुनियाँ वालों को
ऐसा कोई काम नहीं
जिसको नहीं कर सकती
हमारी बेटियाँ
नाज़ुक हैं, मगर हौसले बुलंद रखती हैं
हमारी बेटियाँ
कौन कहता है कमतर होती हैं बेटियाँ ।
💐💐💐💐💐💐
© डॉ. चक्रपाल सिंह
स्वतंत्र टिप्पणीकार
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