(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित "यादगार शब्दों का सफर" प्रीति तिवारी "नमन कृत साझा संकलन )
बरामदे वाले कमरे में रहते थे मेरे बाबूजी,
जिम्मेदारी का बोझ लिए बूढ़े हो गए बाबूजी।
एक तारा भी मांगो, तो पूरा आसमान थे बाबूजी,
मेरे मन की हर हर्फ समझते बबूजी,
एक दृढ़ता की चादर ओढ़े पर बड़े सरल थे बाबूजी।
कुछ भी मांगो उससे पहले लाकर देते बाबूजी।
बरामदे......................।
अम्मा शोर मचाती थी कि कुछ भी नहीं ये करती है,
इक चाय का प्याला लेकर भी कभी नहीं ये देती है,
मुंह पर उंगली रख देते थे अम्मा के मेरे बाबूजी ।
बरामदे वाले ....................।
कितना अटूट विश्वास था मेरे ऊपर मेरे बाबूजी,
सारी बातों को सच कर दी मैंने मेरे बाबूजी।
सारी उपलब्धि है निरर्थक, बेमानी सब लगता हैं,
कोहिनूर के बिना खज़ाना खाली सारा लगता है।
सारे रिश्ते आसपास हैं फिर भी अनाथ हूं बाबुजी,
सबकुछ होकर कुछ भी नहीं है,जब आप नही हो बाबूजी।
बरामदे वाले कमरे में रहते थे मेरे बाबूजी।
जिम्मेदारी की बोझ लिए बूढ़े हो गए बाबूजी।
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अनीता त्रिपाठी
सहायक अध्यापक
बेसिक शिक्षा विभाग
उपाध्यक्ष
सूर्य क्रांति फाउंडेशन, गौतम बुद्ध नगर
उपाध्यक्ष
शैक्षिक नवाचार एसोसिएशन , गौतम बुद्ध नगर।
9818788075
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