(गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उड़ान मेरी कलम की "साझा संकलन" से संपादन - साधना ठाकुर)
।।। मुसाफिर ।।।
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हर सफर कुछ सिखाता है मुझे
हर नज़र कुछ दिखता है मुझे
हवा का झोंका
लंबी राहें
बस के शोरगुल के बीच
खोई मैं,,,
अकेले कहीं
ज़िन्दगी के अंजान रास्ते खोजती हुई ।
आज़ादी को ढूंढ़ती हुई,,,,
पता नहीं यह राहें मुझे किस दिशा की ओर ले जाएगें,,,
कहते है स्त्री को हमेशा किसी के सहारे जीना पड़ता है ।
उनको आज़ादी की क्या ज़रूरत!
बस की खुली हवा ने
पहली बार
आज मुझे,,,
घर की चार दीवारों से दूर,,,
असली आज़ादी दिखाया मुझे,,,
हाँ,,, मुसाफिर हूँ मैं,,,
ज़िन्दगी की यात्री हूँ मैं !
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कन्नगी
(वन्दना टी के )
92075 52408
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कवि परिचय
नाम : वन्दना टी के
उपनाम : कन्नगी
पिताजी : कण्णन टी ए
माताजी : सिन्धु मोल
जन्म-तिथि : 20 मार्च
जन्म-स्थान : केरल
शिक्षा : बी.ए & एम.ए हिन्दी,
अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा
प्रकाशित कृतियाँ : सुर सरिता (सांझा संकलन)
प्राप्त सम्मान/पुरस्कार :
● मीराबाई साहित्य रत्न सम्मान
● पूर्णोदय रत्न सम्मान
● मातृभाषा साहित्य सम्मान
● ओजस्विनी नारी सम्मान
●हिन्दी गौरव सम्मान 2023
◆अन्य : अनेकों काव्यपाठ, कई मंचों पर प्रतिभागिता, काव्य गोष्ठीयों में सहभागिता।
ऑनलाइन काव्य पाठ हेतु साहित्यिक मंच द्वारा सम्मान ।
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