भारतीय साहित्य विविध स्वर
"" नारी"" ( आदि और अनंत )
नारी का परिचय ::=
ना :- नर का प्रारुप और प्रकृती का अंश है नारी ।
री :- रीति- रिवाज़ और संस्कृति का स्तम्भ है नारी ।
कविता ::=
नारी तुम श्रध्दा और आस्था के ध्येय से तृप्त हो ,
अपने जन्म को सार्थक करती ऐसी पाषाण की कृति हो ।
हे नारी ! तुम भोर की उदित , प्रथम ओस की भक्ति का तार हो ,
गोधूली बेला में मधुर स्वर में गूंजती अज़ान का सार हो ।
तुझ बिन ये जग सूना था , कल भी और आज भी ,
तुम तो पुष्प गुच्छ की क्यारी हो , हर स्वर्णिम आँगन की भी ।
इन्द्रधनुष के अंचल में लिपटी, शुद्ध आधार-शिला तुम भूमि की हो ।
घनघोर घटाओं और दामिनी से खेलती ,ऐसी बिरवा तुम ताम की हो ।
कदमों में मुस्कुराकर भी तूने , पग -पग पर शूल धरी हो ,
जन्म ऐसा ही सौम्य और विकराल पाया तू ने , हर तम को हरण जो करती हो ।
नारी तुम तो श्रध्दा हो , ध्येय और धीर की ध्याता हो ,
सरल सघन सी, आस्माँ की, निश्चल सी ज्ञाता हो ।
तुम्हारा जीवन है न आसान , तुम भी तो शिशिर ऋतु समान हो ,
आँचल के कोरो में भी तुम ने , मधुप खिलाएं कई तुम वो वसंत महान हो ।
बवंडर के धरातल पर भी , नित -दिन नवीन स्वप्न बुनती हो ।
पत्थरीलि राहों पर भी चल कर ,हर आन्धी को तुम देती चुनौती हो ।
हर क्षेत्र की ख्याति को मस्तक पर अपने , धारण करती नव-युग की नारी हो ।
पुरुष समाज की ध्योतक बन , प्रकाश पुंज में समाती इस युग की नारी हो ।
न तुम अबला हो , न तुम नश्वर हो , सबल -सबला औचित्य मान हो ।
अपनी अस्मत पर अड़िग तुम ,आत्म बल पर जीती हर हुनर खदान हो ।
नारी तुम श्रद्धा हो , आस्था हो, और ध्येय पूर्ण ममत्व हो ।
अपने जन्म को चरितार्थ करती ,तुम ऐसी विधाता की आध्या हो ।
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