भारतीय साहित्य विविध स्वर
ग़ज़ल
हार छप्पर की नहीं है, जीत लपटों की नहीं।
आग की बस्ती अभी तक किसी ने देखी नहीं।
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कुछ चमक है रास्ते में और कुछ आंखों में है
रोशनी माना नहीं है पर अंधेरा भी नहीं ।
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वक़्त की स्याही घुली हर रंग की दावात में
माफ़ करना फूल की तस्वीर बन सकती नहीं।
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आप सुनकर क्या करेंगे, हम सुनाकर क्या करें
हैं बुरी ख़बरें बुरी, अच्छी ख़बर अच्छी नहीं।
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लिखता रहता हूँ लेकिन अक्सर यह लगता रहता है
जो अनपढ़ हैं वे भी पढ़ लें ऐसा तो कुछ लिखा नहीं।
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कानों में लफ़्ज़ों का कचरा उफ़ मैंने कुछ सुना नहीं।
सालों से तूं बोल रहा है क्या तूने कुछ कहा नहीं।
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हवा पूछती है सांसों से सांस पूछती सीने से
सच को कह दे क्या सचमुच कोई रहा नहीं।
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धूप दुखों की थी हर शय पर तुम आये हो शाम ढले
मुझे पता है, कल कहोगे-देखा था कुछ दिखा नहीं।
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मत सुनो ग़ज़लें 'विनोद' से टूट जाएगा नशा
जो शराबों को चढ़ा दे वह ग़ज़ल आती नहीं ।
विनोद कश्यप
2868, सैक्टर- 38- सी,
चण्डीगढ़-160014
9878933766
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