Wednesday, August 3

ग़ज़ल - विनोद कश्यप (भारतीय साहित्य विविध स्वर)

  भारतीय साहित्य विविध स्वर

 


ग़ज़ल

                                                                 

हार छप्पर की नहीं है, जीत लपटों की नहीं।

आग की बस्ती अभी तक किसी ने देखी नहीं।

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कुछ चमक है रास्ते में और कुछ आंखों में है

रोशनी माना नहीं है पर अंधेरा भी नहीं ।

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वक़्त की स्याही घुली हर रंग की दावात में

माफ़ करना फूल की तस्वीर बन सकती नहीं।

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आप सुनकर क्या करेंगे, हम सुनाकर क्या करें

हैं बुरी  ख़बरें बुरी, अच्छी ख़बर  अच्छी नहीं।

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लिखता रहता हूँ लेकिन अक्सर यह लगता रहता है

जो अनपढ़ हैं वे भी पढ़ लें ऐसा तो कुछ लिखा नहीं।

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कानों में लफ़्ज़ों का कचरा उफ़ मैंने कुछ सुना नहीं।

सालों से तूं बोल रहा है क्या तूने कुछ कहा नहीं।

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हवा  पूछती  है  सांसों से सांस पूछती सीने  से

सच को कह दे क्या सचमुच कोई रहा नहीं।

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धूप दुखों की थी हर शय पर तुम आये हो शाम ढले

मुझे पता है, कल कहोगे-देखा था कुछ दिखा नहीं।

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मत सुनो ग़ज़लें 'विनोद' से टूट जाएगा  नशा

जो शराबों को चढ़ा दे वह ग़ज़ल आती नहीं ।




विनोद कश्यप

2868, सैक्टर- 38- सी,

चण्डीगढ़-160014

9878933766


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