भारतीय साहित्य विविध स्वर
सबकी लता दीदी
इंद्र ने स्वर्ग में सभा बुलाई है,
कहलवाया लता दीदी आई है।
गंधर्व, अप्सराएं शीश झुकाते हैं,
साक्षात् सुर सम्राज्ञी के दर्शन पाते हैं।
सरस्वती ने वीणा की छेड़ी तान,
पूष्प वर्षा कर गंधर्वो ने गाया गान।
विश्वकर्मा ने सिंहासन सजाया,
देवताओं ने उस पर दीदी को बैठाया।
अमरावती में स्वागत की ऐसी तैयारी,
हमारी सौम्य लताजी न्यारी, प्यारी।
फिर परिचय का शुरू हुआ दौर,
सबकी दृष्टि दीदी की ओर।
इंदौर इनका था जन्म स्थान,
स्वयं को बताती मालवा की संतान।
देवता भी थे सुनने को आतुर,
उपस्थित हुए नारद मुनि चातुर।
बातों में दीदी को ऐसा उलझाया,
ऐ मेरे वतन के लोगों दीदी ने सुनाया।
इंद्र हो गए सिंहासन देने को तैयार,
दीदी को नहीं चाहिए ऐसे उपहार।
दीदी ने कहा वरदान चाहिए,
पुनर्जन्म हो तो भारतीय बनाइए।
स्वर्ग में दिखी आनंद की छाया,
लताजी को देवों ने भी दीदी कह बुलाया।
जिनका जीवन था गीत, संगीत को समर्पित,
लताजी को मेरे श्रद्धा सुमन अर्पित।
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