भारतीय साहित्य विविध स्वर
मेरा जीवन
मैं कब तीस से चालीस की हो गयी,
बच्चों के टिफिन बाँधती,
घर से स्टोप तक भागती।
कब में स्थिर हो गयी,
मैं तीस से चालीस की हो गयी,
बरफ सी ठण्डी पडी, रातों में
कब केवल बच्चों की माँ हो गयी।
मैं तीस से चालीस की हो गयी,
घर से स्कूल, स्कूल से घर, भागती -सी जिंदगी कब थम-सी गयी।
मैं तीस से चालीस की हो गयी,
आइने में देखा आज, आँखों की कालिमा,
गालों की लालिमा
कब कहाँ खो गयी,
मैं तीस से चालीस की हो गयी,
सहारा दे सभी को,
आगे बढाते हुए,
न जाने मैं कब बेसहारा हो गयी।
मैं तीस से चालीस की हो गयी,
वक्त से बेवक्त होती,
समय की धारा में बहती,
कब धारा में पीछे रह गयी।
मैं तीस से चालीस की हो गयी।
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