भारतीय साहित्य विविध स्वर
पल दो पल
सपने के क्यों पंख लगे है
क्यों मृगतृष्णा को जगाते
पूरे होनें से वे पहले ही
पंख समेटे क्यों उड़ जाते
निशा-निशा भर जाग-जाग कर
जाने कितने सपने देखे आँखों ने
कौन निकट कौन दूर खडा़ है
सपने में नहीं पहचाने जाते
सपनों की यह लुकाछुपी
जीवन में कब सच होगी
सपने तुम क्यों शर्माते मुझसे
क्या मेरे भविष्य हो अपने?
सपने अब मन का बोझ बनों न
जीवन जैसा चलता चलने दो अब
उन मीठी यादों के संग- संग
पल दो पल जी लेनें दो अब।
सुनीता चमोली
जबलपुर
मध्य प्रदेश
89827 67845
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INDIA
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