Saturday, July 23

क्या बचा है...? - रफीखा बेगम 'शायरिन' (भारतीय साहित्य विविध स्वर)

 भारतीय साहित्य विविध स्वर



क्या बचा है...?
                                                                 

क्या बचा है मेरे जीवन में..?

अवशेष सी बन गई हूँ मैं। 


स्वच्छ था सपना मेरा,

सपने में विशेष सी बन गई हूँ मैं। 


पर क्या... एक ही क्षण में टूटे सारे सपने ..

उन टुकड़ों में विच्छिन्न सी बन गई हूँ मैं। 


क्या बचा है मेरे जीवन में..?

अवशेष सी बन गई हूँ मैं।


मंज़िल तो दूर है मेरी,

सदा की पथिक बन गई हूँ मैं। 


सावन की बारिश में भी ,

प्यासी चातक बन गई हूँ मैं। 


हमेशा हँसती रहती हूँ पर,

भीतर से मुरझा गई हूँ मैं।


क्या बचा है मेरे जीवन में..?

अवशेष सी बन गई हूँ मैं।


सोंचती हूँ कि सपनों को फिर से बटोरूँ हाथों में,

ऐसे ही सोच में पड़ गई हूँ मैं। 


कब वह दिन आएगा ? जो मेरी तकदीर बदलेगा ...

कब वह सुबह आएगी? जो नई आशा ले आएगी...

बस... एक इंतज़ार सी बन गई हूँ मैं।


क्या बचा है मेरे जीवन में..?

अवशेष सी बन गई हूँ मैं।



रफीखा बेगम 'शायरिन'

हिंदी अध्यापिका, जिला परिषद उन्नत पाठशाला रामपुर, 

मंडल: खाजीपेट, जिला: हनुमकोंडा

चरवाणी: 7093716276

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GEETA PRAKASHAN

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