Sunday, July 24

मुर्दों का शहर न होने दो - शिवनन्दन सिंह (भारतीय साहित्य विविध स्वर)

 भारतीय साहित्य विविध स्वर



 मुर्दों का शहर न होने दो
                                                                 

जागो , कब-तक जागोगे ,

मुर्दों का शहर न होने दो ।

जिन्दादिली  कायम  रखो,

खुद पर कहर न होने दो ।

इतना न अधिक विनम्र बनो,

कि खून ही ठंडा पर जाये ।

हे  क्षत्रप तुम इस दुनिया में,

अब और न जौहर होने दो।

समय के  साथ बदल जाओ ,

अब और न हो काशी-मथुरा।

सम्मान बहुत ही  लुट चुका ,

इसे और न फूहड़ होने दो।

तुष्टिकरण की पीड़ा  हमने ,

सालों  साल  बिताए  हैं।

मर्माहत  बहुत हुए है हम ,

अब और न  टुअर होने दो।

जागो खोलो अॉंखे अपनी ,

कुर्सी का तमाशा बन्द करो।

यह देश तुम्हारे जिम्मे है ,

अब त्राहि त्राहि मत होने दो।

जागो कब तक जागोगे ,

मुर्दों का शहर न होने दो।


©   शिवनन्दन सिंह

          जमशेदपुर, झारखण्ड।

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