Saturday, May 7

मेरा गाँव मेरा शहर - सुरेश लाल श्रीवास्तव (साहित्य संगम)

साहित्य संगम


मेरा गाँव मेरा शहर

 सुरेश लाल श्रीवास्तव

    आसेतु हिमालय प्रतिष्ठित तथा हिम के उत्तुंग शिखर से सुन्दर, सुखद बयार से आच्छादित भारत वसुन्धरा गाँवों वशहरों का अप्रतिम वसाव है।गंगोत्री एवं यमुनोत्री से निसृत गंगा और यमुना नदियाँ अपने द्वारा निर्मित भूतल से न केवल प्रकृति प्रदत्त उपहार स्वरूप किसानों के लिए उपजाऊँ मैदान तैयार  करती हैं, अपितु एक संस्कारिक,सर्व धर्म सम भाव की गंगा-यमुनी तहज़ीब का प्रणयन भी करती हैं।

    पचहत्तर प्रतिशत गाँवों तथा शेष शहरों से समृद्ध, विविधताओं में एकता का सुन्दर समन्वय वाला मेरा भारत देश, जिसकी माटी में अनेक विश्व विभूतियां जन्मीं और अपना नाम रौशन किया, जिस किसी भी दृष्टि से देखा जाय महनीयता से ओत-प्रोत है।प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों से समुन्नत रहा भारत भूतल अनेकानेक कृषि उत्पादनों, खनिजों, उद्योग-धन्धों से समृद्ध है ही साथ ही इस देश के ग्रामीण व शहरी जन समूहों को अनेक ऋतुओं का अतिशय आनन्द भी मिलता है, जो वैश्विक स्तर पर अलौकिक है।        षड् ऋतुएं इस मही मध्य हैं।

        ऋतुराज बसंत कहलाता है।।

    गाँव व शहर की संस्कृति आम बोलचाल की भाषा में भले ही भिन्न हो, किंतु दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं।दूसरे शब्दों में गाँवों से ही शहरों का विकास हुआ है।

    भारत में शहर के सापेक्ष गाँव स्वास्थ्य, शुद्ध भोजन व पेयजल की दृष्टि से ज़्यादा उपयोगी एवं सुरक्षित हैं, वहीं चिकित्सा, दैनिक सामानों की उपलब्धता तथा शिक्षण संस्थानों की सुलभता अर्थ में शहरों का महत्त्व गाँवों से अधिक है।गाँव के लोग आपसी प्रेम भाव व भाईचारा अधिक निभाते हैं, जबकि शहरों में इसकी कमी पायी जाती है।

    शिक्षा अर्थ में देखा जाय तो ज्यादातर गांव के ही ज्ञानी-ध्यानी बच्चे शहर पहुँच कर विद्वता की एक से बढ़ कर एक उपलब्धि हासिल करते हैं।कोई आई.ए. एस. की पदवी प्राप्त कर उत्कृष्ट प्रशासनिक दायित्व निभाता है तो कोई आई. पी.एस. सेवा में जाता है।इस अर्थ में  उद्योग धन्धे हों या मानव संसाधन दोनों के लिए अर्थात औद्योगिक प्रतिष्ठानों एवं शिक्षा संस्थानों के लिए कच्चा माल बहुतायत रूप में गाँव पर शहर निर्भर है।रोज़गार की तलाश में ग्राम्य जन ही नगर पहुँच कर सस्ते श्रमिक के रूप में सुलभ होते हैं।

    गाँवों के मधुरिम गीत वह चाहे त्यौहारों के अवसर पर हों या शादी विवाह के मौके पर, बहुत ही मनभावन  होते हैं।पर्यटक स्थलों तथा अन्य अनेक दर्शनीय स्थलों को देखने व स्वास्थ्य सुरक्षा के उद्देश्य से यदि ग्रामीण जन शहर जाने की योजना बनाते हैं,तो शहरी जन भी अवकाश कालों ,विशेष कर मई-जून की छुट्टियों में शांत परिवेश व शुद्ध वातावरण का आनन्द लेने के अर्थ में गाँवों की ओर पलायित होते हैं।

    अत्यधिक घना वसाव होने से और सुविधाओं की कमी के चलते पर्यावरणिक संकट उत्पन्न होने पर ज्यादातर बीमारियों का प्रकोप शहरों में ही विकराल रूप लेता है।ऐसी दशा में जिनके सम्बन्ध गाँव व शहर दोनों से जुड़े होते हैं, वे शहरों से गाँव की ओर उन्मुख हो जाते हैं।

    सारांशवत् हमारी प्रवृत्तियों की शुद्धता, भ्रातृत्वभाव, आचरण की पुनीतता, प्रेम, सहयोग व सामंजस्य की भावना गाँव एवं शहर दोनों को जरूरत है।ज़्यादातर विकृतियां या समस्याएं इसी से उपजती हैं।अब गाँव में भी शहर जैसी सुविधाएं हैं।जबरन गाँव से शहर की ओर पलायन कर जनाधिक्य से शहर को समस्याग्रस्त करने की जरूरत नहीं है।

    मेरा देश गाँवों  की धरती है,

    जहाँ शहर बहुत से वसे हुए।

    शहरों में महलों की प्रभुता है,

    गाँवों में हरियाली  लिए हुए।।




सुरेश लाल श्रीवास्तव

प्रधानाचार्य

राजकीय हाई स्कूल

जहाँगीरगंज, अम्बेडकरनगर

उत्तर प्रदेश,

9415789969

  राजकीय विद्यालय अम्बेडकरनगर

     उत्तर प्रदेश

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