साहित्य संगम
अर्थ - व्यवस्था किसी भी देश के लिए रीढ़ की हड्डी है | किसी भी समाज या देश की उन्नति एवं विकास उसकी अर्थ - व्यवस्था पर निर्भर करता है | भारत देश मुख्य्तः कृषि प्रधान देश है | आज कृषि की प्रधानता के स्थान पर औद्योगीकरण आ गया है | भारतीय अर्थ - व्यवस्था उद्योगों पर निर्भर करने लगी | आज़ादी की क्रांति के समय जो जन आंदोलन और समाज सुधार के आंदोलन हुए उन्होंने नारी को भी ''स्त्री मुक्त आंदोलन ' की ओर प्रेरित किया | इसी समय नारी शिक्षा का विकास भी हुआ था | भारतीय संविधान में स्त्री - पुरुष दोनों को समान अधिकार प्रदान किये गये | स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार भी दोनों को समान रूप से मिले | यही कारण है कि आज़ादी के पश्चात् शिक्षा का प्रसार बड़ी तेज़ी से होने लगा | नारियाँ शिक्षित होने लगी | प्रत्येक क्षेत्र में वे काम करने के लिए प्रशिक्षित थी |
अंतिम दशक तक आते - आते वे भी सभी क्षेत्रों में अपने अस्तित्व का अहसास कराने लगी| पहले नारी केवल एक नादान, मासूम पुत्री , बेटी , पत्नी , माँ के रूप में पायी जाती थी|आज वह अपनी स्वतंत्रता के अधिकार लिए लालायित हो उठी | वह अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए जागृत हो उठी | इतना ही नहीं वह सामाजिक , व्यवसायिक , शैक्षणिक क्षेत्रों में अपने आपको सफल बनाने लग गई |
जो क्षेत्र केवल पुरुष के लिए ही थे - जैसे सेना और विमान चालक , इसमें भी स्त्री अपने लिए जगह बनाना प्रारम्भ किया | निर्भीक होकर वह जल , थल , वायु सेना में भी भर्ती होने लगी |
यह आम बात हो गयी है कि मध्य और निम्न मध्यवर्ग में नारियां अपने परिवार की आजीविका चलाने के लिए घर से बाहर जाकर विभिन्न कार्य करने लगी | वह भी अपने परिवार के पालन पोषण के लिए स्वयं को जिम्मेदार समझने लगी | पहले उच्च वर्ग की महिलाएँ इस प्रकार के कार्य के लिए लज़्ज़ा महसूस करती थी | वे अपने घर की प्रदर्शनी एवं साज सज्जा की वस्तु मानी जाती थीं | अब वे भी पुरुषों के साथ सामान रूप से काम करने लगीं |
स्त्री ने शिक्षित होकर पुरुषों द्वारा खीचीं गयी सीमा रेखा को लांघना प्रारम्भ कर दिया, नारी स्वकेन्द्रित होने लगी | उसे स्वनिर्णय लेने में आनंद और तृप्ति होने लगी | आज की नौकरीपेशा महिला के पास स्वतंत्र विचार शक्ति , बुलंद इच्छा शक्ति , संकल्पित मनोबल , उत्तरदायित्व का पूर्ण अहसास आदि भावनाएं हैं |
भारत की अर्थ - व्यवस्था भी एक नवीन मोड़ पर आ खड़ी हुई | शहरों के साथ -साथ गाँवो पर भी पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव आसानी से दिखाई देता हैं | पश्चिमी विचारधारा , वैज्ञानिक प्रगति , नवीन उपलब्धियाँ आदि का आमूल प्रभाव दिन - ब- दिन बढ़ता ही जा रहा है| इस प्रकार के परिवर्तन केवल समाज के लिए ही नहीं बल्कि विशेषकर नारी के लिए भी इन परिवर्तनों ने अपने दरवाज़े खोल दिए हैं | या यूँ कहा जा सकता हैं कि कामकाजी नारी ने इन्हें दरवाज़े खोलने पर बाध्य कर दिया है | इस प्रकार यह आधुनिक परिवर्तन नारी के लिए एक सदिल भविष्य बनकर उभरा है |
इन परिवर्तनों को दॄष्टि में रखकर डॉ. सुरेश कुमार जैन ने लिखा है कि - " स्त्री का अपना इतिहास नहीं , उसने अभी -अभी बोलना सीखा है | अतः उत्तर आधुनिकतावाद को स्त्री के इतिहास को नहीं नकारना चाहिए | ......पुनर्जागरण काल के मूल्यों को नकारने के लिए यह विशिष्ट बोध की स्वतंत्रता है | किन्तु आज भी दुनिया की अधिकतम जनसंख्या गरीबी एवं शोषण से पीड़ित है | पढ़ी लिखी स्त्री कुछ बोल पाए या नहीं किन्तु ग्रामीण और अशिक्षित स्त्री के तेवर देखकर सच में आश्चर्य होता है | " १
नारी जागृति ने एक नवीन चेतना का शंखनाद कर दिया है | नारी दॄष्टि से प्रेरित विचारधारा ने नारी को स्वयं अपना इतिहास लिखना सीखा दिया है | इसने उसे भविष्य के प्रति प्रेरित भी कर दिया है |
युगीन नारी समस्यायों से विचलित हुए बिना , उसे नज़रअंदाज़ करके अपने मार्ग पर बढ़ती जा रही है | वह हर एक बंधन ,अड़चन , समस्या , रुकावट को निडरता से पार करती हुई आगे बढ़ती जा रही है | उसके 'मैं' के प्रति जागरूक होने के कारण पुरुष की नींव की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है|
स्वतंत्र आर्थिक बोध - जो नारी पहले केवल अपने परिवार तक ही सिमित थीं वह आज प्राचीन परम्परओं की दहलीज़ लांघ कर 'कामकाजी ' स्वावलंबिता के रूप में दॄष्टिगोचर होने लगी है | समकालीन उपन्यासकारों ने स्त्री के इस नवीन स्वावलम्बी रूप को यथार्थ रूप से प्रस्तुत किया है | स्त्री की इस स्व - पहचान ने एक नवीन युग का आरम्भ किया है | इस सन्दर्भ में यह कथन दृष्टव्य हैं- " स्त्री मुक्ति का सही अर्थ यह हैं की स्त्री को पुरुष के बराबर समाज में हक़ मिल सके | ऐसा न समझो कि स्त्री कोई भोग कि वस्तु हैं उसे विकास कि दिशा प्रदान करते हुए स्त्री स्वतंत्रता कि जगह स्त्री समानता पर अधिक ध्यान दिया जाता | यदि पुरुष अपने ही बच्चे को संभालने में शर्मा रहा हैं तो समानता कहाँ रही ?" २
सकलीन कामकाजी महिला केवल बेटी , बहन , प्रेयसी , पत्नी ,माँ ही नहीं है बल्कि वह समाज कि एक महत्वपूर्ण इकाई है | उसका स्वयं का स्वतंत्र व्यक्तित्व है जो समाज में उसका अस्तित्व बनाता है|
उसका यह जागरूकता सम्बन्धी ज्ञान इस कदर उसकी अंतरात्मा में समां गया है कि उसे कोई डगमगा नहीं सकता | चाहे किसी भी प्रकार की अड़चन आ जाये उसने अपनी सफलता के मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय कर लिया है | ' मुझे चाँद चाहिए ' कि नायिका 'वर्षा ' अपनी पारिवारिक मान्यताओं से विद्रोह करती है | वर्षा के पिता जब उससे शादी के विषय में कहते है तब वह उत्तर में अपने पिता से कहती है कि - " वंश में जो नहीं हुआ वह आगे भी न हो , यह जरुरी नहीं ....... यह ब्याह मैं नहीं करुँगी तुम लोग चाहे मारो , चाहे कुटो |" ३
"आकाश में विभाजक रेखाएँ नहीं " (तेलुगु उपन्यास) में शारदा कि पढ़ाई पूरी होने को है| पिताजी से दोनों भाई शारदा की शादी के बारे में पूछते हैं |भाई, भाभियों का मानना हैं कि - " जवान लड़की को घर में रखे कैसे? छाती पर मुंग दलने को बैठी | इस मामले में शारदा अपना दृढ़ निश्चय सुनाती हैं कि -" सुनिए ! फिर से मेरी शादी के बारे में कोई कुछ मत कहिए |मेरी शादी मेरी मर्ज़ी है | कहीं भी नौकरी करके गुजारा करुँगी | समझे ! " ४
अपने पैरों पर खड़ी नारी पारम्परिक सीमाओं में बंधकर नहीं , बल्कि अपने को स्थापित कर अपने 'स्व' के साथ जीना चाहती है | आधुनिक नारी अपने जीवन के प्रत्येक क्षण के आंनद की अनुभूति चाहती है | ' छिन्नमस्ता ' की प्रिया कहती है - " सच कहूं फिलिप ? वह एक अतीत था जो मुझे याद तो आता है पर में जिसे पीछे छोड़ आयी हूँ | उसका प्रभाव मेरे वर्त्तमान स्वरुप पर है | लेकिन मेरा अपना काम , जिसमें मुझे सृजन और अभिव्यक्ति का सुख मिलता है , मेरा सबसे बड़ा आलम्बन है , यही एक बालिश्त जमीन है जिस पर कभी मैंने मुट्ठीभर बीज रोपे थे | यह पौधा छोटा ही सही ,पर इसे मैंने सींचा है |"५
" जंगल की पुत्री " (तेलुगु उपन्यास ) में पद्मा रेडिकल दल में प्रवेश करती है | सेन्ट्री का ड्रेस पहनते ही उसके मन में उत्साह भर आता है | बीती हुई जिंदगी उसे याद आती है , तो वह उस पल को सोचती है कि - " पद्मा का उस मूर्ख के साथ शादी होना , पति से दी गई यातनाएँ , ठीक से पहनने के लिए चोली का भी न होना| अधनंगा होकर घूँघट ओढ़कर मायके तक पहुंचना , ऐसी दुखत स्थिति में घर वालों का उसके प्रति दया दिखाना आदि |" ६
व्यक्तित्व के प्रति चेती नारी कि विचारधारा ही अस्तित्व बोध से उसका परिचय कराती है | यह विचारधारा ' मार्मिक व्यक्तिगत संबंधों ' पर भी आघात करती है|स्वतंत्रता चेता नारी जब 'स्व' में जीना चाहती है तो स्वत्व कि यह माँग विद्रोह में परिवर्तित हो जाती है | नारी की दॄष्टि चहुँमुखी रूप से परिवर्तित हो गई है उसकी परिभाषा एक नवीन आधुनिक , वैचारिक , बुद्धिवादी सोच ,का निर्माण करती है|
‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया कहती है - " अड़तालीस की इस उम्र में एक पूरी की पूरी साबुत औरत, जो जिंदगी को झेल रही, बल्कि हँसते हुए जी रही , जिसे अपनी उपलब्धियों पर नाज़ है |" ७
'सहजा' (तेलुगु उपन्यास) में शारदा के सामने उषा अपने स्वाभिमान को इन शब्दों में दिखाती है कि- " वापस आए तो भी उसे में स्वीकार करने कि स्थिति में रहूँगी या नहीं | अब उसकी पत्नी के रूप में रहना मेरे लिए अपमान है न ! मेरे स्वाभिमान को बचाना है तो उसे तलाक देना ही है | सब को मालूम होना है कि अब में उसकी बीवी नहीं हूँ |" ८
जिम्मेदारियों का बोझ -
जिम्मेदारी के कारण नारी को अनेक मानसिक एवं दैहिक कष्टों को पार करना पड़ता है | इस संघर्ष में अपने आत्मीय लोग भी समर्थन नहीं करते हैं | "आंवा " उपन्यास में नमिता कि मौसी अपनी दीदी उर्मिला के कान भरने लगती हैं कि - " पहला काम करो नमी का पर कतरो | नौकरी छुड़वा उसे घर बैठाओ | फिर सुयोगवश, हाथ पिले कर गंगा नहाओ |" ९
'सहजा '(तेलुगु उपन्यास) में उषा की तलाक की बात सुनकर रमा भी उसे समझाने लगती हैं कि - " वह तो मर्द है | लाखों कमजोरियाँ होंगी | हमें ही समझौता करना है | इस उम्र में पति को छोड़कर जीवन भर अकेली रहना समाज में कितना मुश्किल है | बच्चों को क्या समझाओगी? अभी से लोग अपमान करने लगे | क्या मालूम कल कौन सी समयस्या शुरू होगी ? "१०
जब कोई पुरुष प्राचीन मान्याताओं का विरोध करता है और विकास की ओर अग्रसर होता है तो वह सम्मान का पात्र बनता है | अगर नारी अपने लिए एक नया रास्ता खोलती है तो समाज इसके खिलाफ हो जाता है | वह समाज में अपराधी बना दी जाती है | उसे सामाजिक न्यायालय के सामने दण्डित किया जाता है|
इस सन्दर्भ मैं 'छिन्नमस्ता ' की प्रिया कहती है कि - " व्यवस्था को तोड़ने वाली औरत को समाज यहाँ सौ कोड़े लगते हैं , वहीं पुरुष को मंच पर क्रांतिकारी कहकर बैठाता है | और नारी हर तरह मरती है , लेकिन रोती हुई औरत मुझे अच्छी नहीं लगती | मुझे औरत की इस निष्क्रियता पर झुंझलाहट होती है|"११
डी . कामेश्वरी के 'मरीचिका ' ( तेलुगु उपन्यास ) में कविता के प्रति बच्चों के उपेक्षित व्यव्हार को को देखकर कविता अपनी मौसी कामाक्षम्मा से प्रश्न करती है कि- " मौसी जी ! बताइए! कोई ऐसे है जो गलतियां न किया हों ? ये मर्द सदियों से कितनी बार गलतियाँ किये थे , कर भी रहे हैं, और करते भी रहेंगे | पुराने ज़माने में मर्द पर स्त्री से सम्बन्ध रहने पर भी समाज उसे मर्द का स्वाभविक मानकर अनदेखा करते थे| वह रखैल को घर में रखकर , बीवी के साथ उसके पैर भी धुलवाता था |"१२
कामकाजी स्त्री के लिए समाजवादी रूढ़ परम्पराएँ बाधक बन जाती है | कभी - कभी उसे झेलना असंभव हो जाता है | ' मुझे चाँद चाहिए ' में वर्षा की जीजी उसे समझाते हुए कहती है कि - " सिलबिल अपना जीवन सवांर बहन | यह क्या तुमने ड्रामे कि लत पाल ली है |सिलाई , कसीदाकारी जैसी कुछ सीखती तो कोई बात भी थी | लडके वालों कि आँखों में कुछ चढ़ेगा तभी नाव मझधार से निकलेगी|" १३
घर और बाहर से जूझती हुई वर्षा कहती है - " मेरे दोनों संसार इतने अलग और प्रतिकूल क्यों हैं?“१४
'मधुमती ' (तेलुगु उपन्यास) में सावित्रम्मा मधुमती को शादी के बारे में मनाने की कोशीश करती हैं - " शादी से लड़की कि जिंदगी सुस्थिर होती है | लड़की की जिंदगी में सुस्थिरता जितनी जल्दी आएगी उतनी ही बहेतर होगी | कितने भी साल नौकरी करने पर भी कभी शादी तो करनी ही है | उस शादी को अब ही कर लो |" १५
नारी के भविष्य के सपनों को पग -पग पर चोट पहुँचाने का प्रयास किया जाता है | उसकी आत्मनिर्भरता उसके स्वाभिमान की छोर पकड़कर चलती है | अतः वह अपनी अपूर्व महेनत की भाव भूमि पर उतरती हुई स्वतंत्रता पाना चाहती है | सुरेंद्र वर्मा ‘वर्षा’ की इस मनोदशा को प्रकट करते है -" देह स्वाभिमानी के पद और भावना को तृप्ति से तृप्ति की क्षतिपूर्ति से अपने को सार्थक क्यों नहीं मान लेती ? रीता ने अपनी कलात्मक लालसा को काँटेदार झाड़ियों में फंसे पल्लू की तरह झटक दिया है | क्या इन सबके आत्मसम्मान उसके आत्मासम्मान के सामने हीन है | मजेदार तथ्य यह है की उसकी पारिवारिक पृष्ठ्भूमि इन सबसे हीन है | " १६
'सहजा ' (तेलुग्गु उपन्यास ) - कितने सालों से दबी हुई ऊर्जा चित्र लेखन में भरकर आयी है | चित्र पूरा होने तक शारदा में कोई दूसरा विकल्प नहीं रहा | " उस रात को निश्चिंत सो सकी | शनीचर की रात जितनी निश्चिंत बीती रविवार की रात उतनी ही भयानक रूप धारण कर ली | वह निर्जीव सी बिस्तर पर सोई रही तो उसकी इज़ाज़त के बिना , उसकी घृणा को गौर न करते हुए , उसे एक वस्तु की तरह भोग कर पति रामाराव बड़े आराम से सो गया | शारदा के ह्रदय को इन दोनों रातों के बीच जो अंतर है , उसे विकल और विचलित कर दिया |" १७
दोहरा संघर्ष
वैश्विक नारी को इस जटिल व्यवस्था के साथ ताल -मेल बैठाने के लिए काफी मेहनत- मशक्कत करनी पड़ती है | उसे केवल दैहिक ही नहीं बल्कि मानसिक लड़ाई भी लड़नी पड़ती है | पुरुष निर्मित सामाजिक व्यवस्था में उसे आदरपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं है | इन वैश्विक परिवर्तनों के बाद भी उसे अपना मर्यादित स्थान सुरक्षित नहीं मिल पाया है | इसका कारण यह है कि भले ही आज के विज्ञानं ने अति आधुनिक समाज का गठन करने का दम्भ भरा है , परन्तु पुरुषों की संकीर्ण , निर्धन सोच में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है | खुली मानसिकता का केवल हवाला मात्र दिया जाता है | इसका कारण है कि समकालीन समय में नारी की एक 'शोषित ' के रूप में छवि स्वीकार कर ली गई है | आधुनिक अहं निष्ठ , कर्मठ नारी ने इस बेचारी, अबला और शोषित का रूप बदल लेने का संकल्प कर लिया है |यही मुख्य कारण है कि उसे सभी प्रकार के कष्टों को सहन करना पड़ता है | समकालीन उपान्यासों में नौकरी पेशा दैहिक और वैचारिक अत्याचारों की शिकार स्त्रियों के मर्म को छूनेवाला यथार्थवादी अंकन प्रस्तुत हुआ है | ऐसी नारियों पर हो रहे अनेक अत्याचारों का जीवंत चित्रण किया है |
इस सन्दर्भ में ' इदन्नमम की एक भील औरत का निम्न कथन द्रष्टव्य है -" जीजी बाल-बच्चे भूखे मरते रहे |कोई कुछ नाही | फिर ? पूछे तो जनि मासों को, उन्हें बुलावे रात बिरात | अब बताओ , कैसे काटते जिंदगानी | " १८
नारी का प्रस्तुत संघर्ष खून के रिश्तों में भी जटिलता और आक्रोश उत्पन्न कर देता है | ' मुझे चाँद चाहिए ' में जब वर्षा साक्षात्कार के लिए जा रही होती है तो उसे पिता और भाई महादेव द्वारा शारीरिक यातना दी जाती है - " उसने दरअसल इस प्रकरण को पेटी से नीचे का प्रहार मारा|भाई पिता के साथ संलग्न उसके मन का एक बहुत नाज़ुक हिस्सा ऐसे टूटा कि , फिर कभी न जुड़ सका | " १९
'फिर से बहार आई ' (तेलुगु उपन्यास) में शारदा नौकरी कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है |शारदा को लेकर भाइयों का गुस्सा है कि - " जवान लड़की को घर में रखे कैसे |" २०
कामकाजी नारी घर गृहस्थी और बाहरी जिम्मेदारियों को निभाते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करती है | कार्य क्षेत्र में जचकी का केस होने के बावजूद कंपनी ने पंढरी बाई को धमकी दी कि - " वह तत्काल काम पर लौटे वरना नौकरी खत्म समझे| इतनी लम्बी छुट्टी कंपनी बरदास्त नहीं कर सकती | अंडर सेक्सन चार का केस था | " २१
पवार का कहना है कि - " कायदे से बच्चा होने के छः हफ्ते बाद ही उसे काम पर लौटना था लेकिन कंपनी की धमकी से घबड़ाकर पंडरी बाई तुरंत काम पर पहुंच गई | अधिक परिश्रम के चलते उसके पेट के गीले टांके टूट गये | " २२
कामकाजी नारी के घरवाले भी उसकी परेशानियों को समझने की कोशिश नहीं करते हैं , उल्टा इल्ज़ामों के कटघरे में खड़ा कर तमाशा देखते हैं | " ठीक ही किया तुम अपने को संभल लो तो महान आश्चर्य होगा ..........हूँ | खुद का ठिकाना नहीं और संजू की बात कर रही हो ? बेटे को साथ लिए विलायत अमेरिका के चक्कर लगाओगी ? व्हाट फ्यूचर विल यू गिव हिम ? टेल मी ? "२३
'सहजा ' ( तेलुगु उपन्यास ) में शेषगिरि के स्वाभाव के बारे में उषा बताती है कि- " किसी भी कीमत पर शेषगिरी कि दैनंदिक आवश्यकताएँ पूरी हो जाना है | उसकी अपनी धारणाएं , अपना काम , अपने दोस्तों के अलावा किसी और विषय के बारे में सोचता ही नहीं | कल रात उसके बुलाते ही में तो गयी | अगर में कभी उसके पास जाती तो मेरी कदर ही नहीं करता | मेरा प्यार, पसंद या इच्छा का कोई मायना नहीं | उसकी और मेरी दुनियां बिलकुल ही अलग है | आज मुझे एकाकीपन बहुत काट रहा है|"२४
विशेष रूप से आधुनिक नौकरी पेशा नारी दैहिक और वैचारिक प्रताड़नाओं को झेलती हुई कार्यरत हो रही है | समाज में इनका निरंतर शोषण होता जा रहा है|ऐसी स्त्रियों का सशक्त वर्णन समकालीन उपान्यासों में दृष्टिगोचर होता है |
यांत्रिक जीवन जीती समकालीन कामकाजी नारी
समकालीन उपन्यासकारों ने नारी के आधुनिक स्वरुप को यथार्थवादी रूप से उकेरने का प्रयास किया है |आज की नौकरी पेशा नारी यंत्रवत होती जा रही है | समाज ने उसके मानसिक - दैहिक यंत्र तुल्य जीवन को उपेक्षित करने का प्रयास किया है | गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों का पालन करने का ठेका नारी को पहले से दे दिया गया था |बाहरी दुनिया में भी उसे अपनी सक्षमता की परीक्षा निरंतर देनी पड़ती है |
यांत्रिकता की इस विभीषिका को सुरेंद्र वर्मा ने अपने उपन्यास में अद्भूत ढंग से चित्रित किया है | वर्षा ने अपने उपन्यास में अद्भूत ढंग से चित्रित किया है | वर्षा कहती है - " वह कितनी बार टूटी , कितनी बार लहूलुहान हुई , कैसे तन - मन को पूरी एकाग्रता से कला - कुंड में झोंका | अगर इन तीखी आँखों की प्रेरणा से डर न होता, तो शायद इस अग्नि - परीक्षा में खरी साबित न होती | पर वह कुछ कह न पाई | बस एक छोटा सा आँसू आँख में झिलमिलाता गया | "२५
'सहजा' ( तेलुगु उपन्यास ) में रामाराव शारदा के सिर को पकड़कर बाल खींचते हुए कहने लगा कि - " अमरावती पिकनिक , दोस्तों कि तस्वीरें बनाना, दोस्तों के साथ घूमना - फिरना ....ये सब क्या है ? तुम्हे मालूम है न , ये सब मुझे पसंद नहीं ? ....कभी घर से बाहर नहीं निकलना | मुझसे पूछे बिना , बताये बिना , तुम्हे कभी घर से बाहर नहीं निकलना है | अगर तुम गयी तो.... | " २६ रामाराव का पुरुषहंकार पूरी तरह इन चेष्टाओं में और शब्दों में व्यक्त हो रहा है |
आर्थिक स्वतंत्र नारी अपनी कोमल भावनाओं को रौंदती अपने भविष्य निर्माण का स्वप्न देख रही है | उसका जीवन एक ही ढर्रे पर चलने के लिए विवश हो जाता है ,तो वह एकाकी , नीरस जीवन का शिकार होने लगती है | ' अपने-अपने कोणार्क ' की कावेरी भी एक कामकाजी नारी है जो अपने पति के साथ रहना चाहती है पर नौकरी की जगह अलग -अलग होने से रह नहीं पाती है|कावेरी की मनोव्यथा इन शब्दों में व्यक्त होती है - " शादी के बाद भी वह पति से अलग और अकेली रहने को मजबूर है | उसने मेरे सामने ही बातों के दौरान दिवाकर से कहा कि अकेली रहते -रहते वह ऊब गई है |दिवाकर भी पत्नी के साथ रहकर अपने घर संसार का सुख देखना - भोगना चाहता होगा, फिलहाल इस मामले में कुछ कर नहीं पा रहा था |”२७
'दिखता हुआ अतीत ' (तेलुगु उपन्यास) में दही बेचने वाली माणिक्याम्बा से पिता का झगड़ा हो रहा है | तो माँ कमलाम्बा बीच में आकर दस दिनों में बाकी रुपए चुकाने कि बात बताकर उसे मना ली | जाते - जाते माणिक्याम्बा धीमी आवाज़ में कहने लगी कि - " मैं भी मेहनत करती हूँ | लेकिन तुम्हारी तकलीफ देखकर मेरा दिल पसीज जाता है | ऐसा निकम्मा पति किसलिए ?
समकालीन उपन्यासों मैं आधुनिक मशीन तुल्य नारी के जीवन को सार्थकता से प्रस्तुत किया गया है |इस मशीनी जीवन की करुण गाथा प्रत्येक वर्ग की नारी को झेलनी पड़ती है | इसका प्रतिबिम्ब आज के सामाजिक जीवन की असफल कड़ियों मैं देखा जा सकता है | परिवार टूटन भी नारी के इस रूप से प्रभावित है | आज का समाज जिस छोर पर खड़ा है वह इस समस्या से आप्लावित है |
यौन शोषण
नारी और पुरुष का यौन आकर्षण ईश्वर प्रदत्त है | परन्तु इस प्राकृतिक आकर्षण को समाज ने नैतिक धरातल पर सीमित कर रखा है | सृष्टि को आगे बढ़ाने का यह एक माध्यम है पर इसकी पवित्रता को बनाये रखना होगा |
ईश्वर ने स्त्री शरीर को पुरुष की अपेक्षा कमज़ोर बनाया है | उसके पास पुरुष जैसे बाहुबल नहीं हैं|
इसी कारण वह बाहरी संसार में ही नहीं कभी - कभी अपने घर की चारदीवारी में भी असहाय हो जाती है | भले ही वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गयी है, पर उसे इस समाज से जूझना पड़ता है |
आज की नारी यौन शोषण की किस यंत्रणा से गुजर रही है इसको पूरी तरह रेखांकित करती ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं -" सौ में से प्रत्येक पांच लड़कियाँ स्वतंत्र यौन संबंधों में अपना वजूद तलाश रही हैं, अधिकार तलाश रही हैं | तलाश लिया ? पा लिया ? चली आती हैं कहानियाँ लेकर |" २८
' मरीचिका ' (तेलुगु उपन्यास ) में कविता को देखते ही विजयेन्दर में नफरत बढ़ने लगी | वह कविता से पीछा छुड़ाना चाहता है | इसी सिलसिले में वह पूछता है कि -" तुम किस उम्मीद को लेकर इस घर में आयी हो ? जीने के लिए तुम्हारे पास नौकरी है , पैसों के लिए ...? तुम्हारे साथ अन्याय हुआ तो मेरे साथ भी वैसा अन्याय होना समझकर बीवी , बच्चो से मुझे दूर करने के इरादे में हो ? तुम्हे.......क्या चाहिए ? पैसे चाहिए तो बताओ, जहाँ तक हो सके, उधर लेकर दे दूँगा | एक लाख , दो लाख ......कितना चाहिए ........? " २९
'छिन्नमस्ता ' में नरेंद्र द्वारा यौन शोषण का शिकार उसकी सेक्रेटरी बनती है और वह गर्भवती हो जाती है | नरेंद्र उससे अपना पीछा छुड़ाना चाहता है और पूछता है कि -" अरे भूल जाओ इन कसमों - वादों को ! बोलो कितने रूपया लेकर जान छोड़ोगी ? "३०
पुरुष नारी को इस्तेमाल करके कूड़ेदान की तरह फेंक देता है | यह प्रथा सदियों से चली आ रही है | वह आज भी चल रही है | आधुनिक लड़की के पढ़ी - लिखी स्वावलम्बी , आत्मनिर्भर होते हुए भी स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया |
समकालीन उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों में आर्थिक स्वतंत्र नारी का रूप प्रस्तुत किया है | इस सन्दर्भ में नौकरीपेशा स्त्री की दोहरी भूमिका प्रस्तुत होती है | इन उपन्यासों में नारी का बाह्य -अभ्यन्तर स्वरुप रोचक और यथार्थ रूप से उकेरा गया है |
निष्कर्ष :-
दहेज़ की सामाजिक प्रथा नारीवादी संघर्ष का प्रमुख क्षेत्र है | प्राचीन समय से यह प्रथा नारी का शोषण करती चली आ रही है | सम्पूर्ण भारतीय प्रदेश की नारियाँ इस सामाजिक कुप्रथा का शिकार बानी हुई है | जमाना बदल रहा है और उसके साथ दहेज़ प्रथा का रूप भी बदलता जा रहा है | अतः आधुनिक नारी का यह प्रयास धीरे -धीरे सफलता की ओर बढ़ रहा है परन्तु फिर भी नारी को अपनी मंज़िल तय करने में और काफी समय लग जायेगा |
अतः कहा जा सकता है कि हमारे हिंदी और तेलुगु उपन्यासकारों की नारीवादी दॄष्टि से यह सामाजिक पहलू कैसे अछूता रह सकता है ? इन दोनों ही भाषा के उपन्यासकारों ने अपनी सजग दॄष्टि से इस दहेज़ रुपी अमानवीय व्यापार को उजागर करने का प्रयास किया है | आज भी यह प्रथा स्त्री स्वतंत्रता को खोखला बनाने में प्रयत्नरत है | कई बार हमारे आस -पास की दुनिया में इस प्रथा का शिकार हुई नारी की घटना हमारे सामने आती है |
सन्दर्भ
१. उत्तरशती का हिंदी साहित्य -डॉ. सुरेश कुमार जैन पृ.६०
२. नारी - चिंतन - नयी चुनौतियाँ - डॉ. राजकुमारी , पृ . ४०
३. मुझे चाँद चाहिए - सुरेंद्र वर्मा , पृ .७७
४. आकाश में विभाजक रेखाएँ नहीं है - मु. सुजाता रेड्डी , पृ. २७
५. छिन्नमस्ता - प्रभा खेतान , पृ .२१२
६. जंगल की पुत्री - वनजा , पृ .३७
७. छिन्नमस्ता - प्रभा खेतान , पृ .२१०
८. सहजा - वोल्गा , पृ .९२
९. आवां - चित्रा मुदगल , पृ. ५२२
१०. सहजा - वोल्गा , पृ. ११९
११. छिन्नमस्ता - प्रभा खेतान , पृ .१८७
१२. मरीचिका - डी. कामेश्वरी ,पृ. ११
१३.. मरीचिका - डी. कामेश्वरी ,पृ. ११६
१४.. मरीचिका - डी. कामेश्वरी ,पृ. ११६
१५. मधुमती - गोविंदराजु सीतादेवी , पृ. ५५
१६. मुझे चाँद चाहिए - सुरेंद्र वर्मा , पृ . ११८
१७. सहजा - वोल्गा , पृ. १२३
१८. इदन्नमम - मैत्रेयी पुष्पा , पृ. ७०
१९. मुझे चाँद चाहिए , सुरेंद्र वर्मा , पृ. १८१
२०. फिर से बहार आई- मु. भारती , पृ. १४६
२१. आंवा - चित्रा मुदगल ,पृ. ९७
२२. आंवा - चित्रा मुदगल ,पृ. ९७
२३. छिन्नमस्ता - प्रभा खेतान , पृ. १८९
२४. सहजा - वोल्गा , पृ. ५७
२५. मुझे चाँद चहिए- सुरेंद्र वर्मा ,पृ. २७६
२६. सहजा - शारदा ,पृ. १७१
२७. अपने -अपने कोणार्क - चंद्रकांता ,पृ.९१
२८. आवां - चित्रा मुदगल , पृ .५००
२९. मरीचिका - डी. कामेश्वरी ,पृ.१५५
३०. छिन्नमस्ता -प्रभा खेतान , पृ.२१८
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