Friday, May 6

समकालीन हिंदी और तेलुगु उपन्यासों में नारी की आर्थिक स्वतंत्रता का तुलनात्मक अधययन - उषा कुमारी (साहित्य संगम)

साहित्य संगम


समकालीन हिंदी और तेलुगु उपन्यासों में नारी की आर्थिक स्वतंत्रता का तुलनात्मक अधययन

- उषा कुमारी

    अर्थ - व्यवस्था  किसी भी देश के लिए रीढ़ की हड्डी है | किसी भी समाज या देश की उन्नति एवं विकास उसकी अर्थ - व्यवस्था  पर निर्भर करता है |  भारत देश मुख्य्तः कृषि प्रधान देश है |  आज कृषि की प्रधानता के स्थान पर  औद्योगीकरण  आ गया है | भारतीय अर्थ - व्यवस्था उद्योगों पर निर्भर करने लगी | आज़ादी की क्रांति के समय जो जन आंदोलन  और समाज सुधार के आंदोलन  हुए उन्होंने नारी को भी  ''स्त्री  मुक्त  आंदोलन '  की  ओर प्रेरित किया |  इसी समय नारी शिक्षा  का विकास भी हुआ था |  भारतीय  संविधान  में  स्त्री - पुरुष दोनों को समान अधिकार प्रदान किये गये |  स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार भी दोनों को समान रूप से मिले | यही कारण है कि आज़ादी के पश्चात्  शिक्षा का प्रसार बड़ी तेज़ी से होने लगा | नारियाँ  शिक्षित होने लगी | प्रत्येक क्षेत्र में वे काम करने के लिए प्रशिक्षित थी  |

    अंतिम दशक तक  आते - आते वे भी सभी क्षेत्रों में अपने अस्तित्व का अहसास कराने लगी|  पहले नारी केवल एक नादान, मासूम पुत्री , बेटी , पत्नी , माँ  के रूप में  पायी जाती थी|आज वह अपनी स्वतंत्रता के अधिकार लिए लालायित  हो  उठी | वह  अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए  जागृत  हो उठी | इतना ही नहीं वह सामाजिक , व्यवसायिक , शैक्षणिक  क्षेत्रों में अपने आपको  सफल  बनाने लग गई |

    जो क्षेत्र केवल  पुरुष के लिए ही थे - जैसे सेना और  विमान चालक , इसमें भी स्त्री अपने लिए  जगह बनाना प्रारम्भ किया | निर्भीक होकर वह जल , थल , वायु  सेना में भी भर्ती होने लगी |

    यह आम बात हो गयी है कि मध्य  और निम्न मध्यवर्ग में नारियां अपने परिवार की आजीविका चलाने के लिए  घर से बाहर जाकर विभिन्न  कार्य करने लगी |  वह भी अपने परिवार के पालन पोषण के लिए स्वयं  को जिम्मेदार समझने लगी | पहले उच्च वर्ग की महिलाएँ इस प्रकार के कार्य के लिए लज़्ज़ा महसूस करती थी | वे अपने घर की प्रदर्शनी एवं साज सज्जा की वस्तु मानी जाती थीं |  अब वे भी पुरुषों के साथ सामान रूप से काम करने लगीं  |

    स्त्री ने शिक्षित होकर पुरुषों द्वारा खीचीं गयी सीमा रेखा को लांघना  प्रारम्भ कर दिया, नारी स्वकेन्द्रित होने लगी | उसे स्वनिर्णय लेने में आनंद और तृप्ति होने लगी | आज की नौकरीपेशा महिला के पास  स्वतंत्र विचार शक्ति , बुलंद इच्छा शक्ति , संकल्पित मनोबल , उत्तरदायित्व  का पूर्ण अहसास आदि  भावनाएं हैं | 

    भारत की अर्थ - व्यवस्था  भी एक नवीन मोड़ पर  आ खड़ी हुई | शहरों के साथ -साथ  गाँवो पर भी पश्चिमी  सभ्यता  का प्रभाव  आसानी से दिखाई देता हैं | पश्चिमी  विचारधारा , वैज्ञानिक प्रगति , नवीन उपलब्धियाँ आदि का आमूल प्रभाव दिन - ब- दिन  बढ़ता ही जा रहा है| इस प्रकार के परिवर्तन केवल समाज के लिए ही नहीं  बल्कि  विशेषकर नारी के लिए भी इन परिवर्तनों ने  अपने दरवाज़े खोल दिए हैं | या यूँ कहा जा सकता हैं कि कामकाजी नारी ने  इन्हें दरवाज़े  खोलने पर बाध्य  कर दिया है |  इस प्रकार यह आधुनिक परिवर्तन नारी के लिए एक सदिल भविष्य  बनकर उभरा है  |

    इन परिवर्तनों  को दॄष्टि में रखकर  डॉ. सुरेश कुमार जैन ने लिखा है कि - " स्त्री का अपना इतिहास नहीं , उसने अभी -अभी  बोलना सीखा है | अतः उत्तर  आधुनिकतावाद  को स्त्री के इतिहास  को नहीं नकारना चाहिए | ......पुनर्जागरण काल के मूल्यों  को नकारने के लिए यह विशिष्ट  बोध की स्वतंत्रता है | किन्तु आज भी दुनिया  की अधिकतम जनसंख्या गरीबी एवं  शोषण से पीड़ित  है | पढ़ी लिखी  स्त्री कुछ  बोल पाए या नहीं  किन्तु  ग्रामीण और अशिक्षित स्त्री के तेवर देखकर सच में आश्चर्य  होता है | " १

    नारी जागृति ने एक नवीन चेतना का शंखनाद  कर दिया है | नारी दॄष्टि  से प्रेरित विचारधारा  ने नारी को स्वयं अपना इतिहास  लिखना सीखा  दिया  है | इसने उसे भविष्य  के  प्रति प्रेरित भी कर दिया है |

    युगीन  नारी  समस्यायों से विचलित  हुए बिना , उसे नज़रअंदाज़  करके  अपने मार्ग  पर बढ़ती  जा रही है | वह हर एक बंधन ,अड़चन , समस्या , रुकावट को निडरता से पार करती हुई  आगे बढ़ती जा रही है | उसके 'मैं' के प्रति जागरूक  होने  के कारण  पुरुष की नींव की पकड़ ढीली पड़ती जा रही  है|

    स्वतंत्र  आर्थिक  बोध - जो नारी  पहले  केवल अपने परिवार तक ही सिमित थीं वह आज प्राचीन  परम्परओं की दहलीज़ लांघ कर  'कामकाजी ' स्वावलंबिता के रूप में दॄष्टिगोचर होने लगी  है | समकालीन  उपन्यासकारों ने स्त्री के इस नवीन स्वावलम्बी  रूप को यथार्थ रूप से प्रस्तुत किया है | स्त्री की इस स्व - पहचान  ने एक नवीन युग का आरम्भ  किया है | इस सन्दर्भ में यह कथन दृष्टव्य  हैं- " स्त्री मुक्ति का सही अर्थ यह हैं की स्त्री को पुरुष के बराबर समाज में हक़ मिल सके | ऐसा न समझो कि स्त्री कोई भोग कि वस्तु हैं उसे विकास कि दिशा प्रदान करते हुए स्त्री स्वतंत्रता कि जगह स्त्री समानता पर अधिक ध्यान दिया जाता | यदि पुरुष अपने ही बच्चे को संभालने में शर्मा रहा हैं तो  समानता कहाँ रही ?" २ 

    सकलीन कामकाजी महिला केवल बेटी , बहन , प्रेयसी , पत्नी ,माँ ही नहीं है बल्कि वह समाज कि एक महत्वपूर्ण इकाई  है | उसका  स्वयं का स्वतंत्र व्यक्तित्व है जो समाज में उसका अस्तित्व बनाता है| 

    उसका यह जागरूकता सम्बन्धी ज्ञान इस कदर उसकी अंतरात्मा में समां गया है कि  उसे कोई डगमगा  नहीं सकता | चाहे किसी भी प्रकार की अड़चन  आ जाये उसने अपनी सफलता के मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय कर लिया है | ' मुझे  चाँद चाहिए ' कि नायिका 'वर्षा '  अपनी पारिवारिक मान्यताओं से विद्रोह करती है | वर्षा के पिता जब उससे शादी  के विषय में कहते है तब वह उत्तर में अपने पिता से कहती  है कि - " वंश में जो नहीं हुआ वह आगे भी न हो , यह जरुरी नहीं ....... यह ब्याह  मैं नहीं करुँगी तुम लोग चाहे मारो , चाहे कुटो  |" ३ 

    "आकाश में विभाजक रेखाएँ नहीं " (तेलुगु उपन्यास) में शारदा कि पढ़ाई पूरी होने को है| पिताजी से दोनों भाई शारदा की शादी के बारे में पूछते हैं |भाई, भाभियों का मानना हैं कि - " जवान लड़की को घर में रखे कैसे? छाती पर मुंग दलने को बैठी  | इस मामले में शारदा अपना  दृढ़ निश्चय सुनाती हैं कि -" सुनिए ! फिर से मेरी शादी के बारे में कोई कुछ मत कहिए |मेरी शादी मेरी मर्ज़ी  है | कहीं भी नौकरी करके गुजारा करुँगी | समझे ! " ४ 

    अपने पैरों पर खड़ी  नारी  पारम्परिक सीमाओं में  बंधकर नहीं , बल्कि अपने को स्थापित  कर अपने 'स्व' के साथ जीना चाहती है | आधुनिक नारी अपने जीवन के प्रत्येक क्षण के आंनद की अनुभूति चाहती है | ' छिन्नमस्ता ' की प्रिया कहती है - " सच कहूं फिलिप ? वह एक अतीत था जो मुझे याद तो आता है पर में जिसे पीछे छोड़ आयी  हूँ | उसका प्रभाव मेरे वर्त्तमान स्वरुप पर है | लेकिन मेरा अपना काम , जिसमें मुझे सृजन  और अभिव्यक्ति का सुख मिलता  है , मेरा सबसे बड़ा आलम्बन है , यही एक बालिश्त जमीन है जिस पर कभी मैंने  मुट्ठीभर  बीज  रोपे थे |  यह पौधा  छोटा ही सही ,पर इसे मैंने सींचा है  |"५ 

    " जंगल  की पुत्री "  (तेलुगु उपन्यास )  में पद्मा  रेडिकल दल में प्रवेश करती है | सेन्ट्री का ड्रेस  पहनते ही उसके मन  में  उत्साह भर आता है | बीती हुई जिंदगी  उसे याद आती है , तो वह उस पल को सोचती है कि - " पद्मा का उस मूर्ख के साथ शादी होना , पति से दी गई यातनाएँ , ठीक से पहनने के लिए चोली का भी  न होना| अधनंगा होकर घूँघट ओढ़कर मायके तक पहुंचना , ऐसी दुखत स्थिति  में घर वालों का उसके  प्रति दया दिखाना आदि |" ६ 

    व्यक्तित्व के प्रति चेती नारी कि विचारधारा ही अस्तित्व बोध से उसका परिचय कराती है | यह विचारधारा ' मार्मिक व्यक्तिगत संबंधों ' पर भी आघात करती है|स्वतंत्रता चेता नारी जब 'स्व'  में जीना चाहती है तो स्वत्व  कि यह माँग विद्रोह में परिवर्तित हो जाती है | नारी की दॄष्टि चहुँमुखी रूप से  परिवर्तित हो गई है उसकी परिभाषा एक नवीन आधुनिक , वैचारिक , बुद्धिवादी सोच ,का निर्माण करती है|    

    ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया कहती है - " अड़तालीस की इस उम्र में एक पूरी की पूरी साबुत औरत, जो जिंदगी को झेल रही, बल्कि हँसते हुए जी रही , जिसे अपनी उपलब्धियों पर नाज़ है |" ७ 

    'सहजा' (तेलुगु उपन्यास) में शारदा के सामने उषा अपने स्वाभिमान को इन शब्दों में दिखाती है कि- " वापस आए तो भी उसे में स्वीकार करने कि स्थिति में रहूँगी या नहीं | अब उसकी पत्नी के रूप में रहना मेरे लिए अपमान है न !  मेरे स्वाभिमान को बचाना है तो उसे तलाक देना ही है | सब को मालूम होना है कि अब में उसकी बीवी नहीं हूँ |" ८


जिम्मेदारियों का बोझ -

    जिम्मेदारी के कारण नारी को अनेक मानसिक एवं दैहिक कष्टों को पार करना पड़ता है | इस संघर्ष में अपने आत्मीय लोग भी समर्थन नहीं करते हैं | "आंवा " उपन्यास में नमिता कि मौसी अपनी दीदी उर्मिला के कान भरने लगती हैं कि - " पहला काम करो नमी का पर कतरो | नौकरी छुड़वा उसे घर बैठाओ | फिर सुयोगवश, हाथ पिले कर गंगा नहाओ |" ९ 

    'सहजा '(तेलुगु उपन्यास) में उषा की तलाक की बात सुनकर रमा भी उसे समझाने लगती हैं  कि  - " वह तो मर्द है | लाखों कमजोरियाँ होंगी | हमें ही समझौता करना है | इस उम्र में पति को छोड़कर जीवन भर अकेली रहना समाज में कितना मुश्किल है | बच्चों को क्या समझाओगी? अभी से लोग अपमान करने लगे | क्या मालूम कल कौन सी  समयस्या शुरू होगी  ? "१० 

    जब कोई पुरुष प्राचीन मान्याताओं  का  विरोध करता है और विकास की ओर अग्रसर होता है तो वह सम्मान का पात्र बनता है | अगर नारी अपने लिए एक नया रास्ता खोलती है  तो समाज इसके खिलाफ हो जाता है | वह समाज में अपराधी बना दी जाती है | उसे सामाजिक न्यायालय  के सामने दण्डित किया जाता है|

    इस सन्दर्भ मैं 'छिन्नमस्ता ' की प्रिया कहती है कि - " व्यवस्था को तोड़ने वाली औरत को समाज यहाँ सौ कोड़े लगते हैं , वहीं पुरुष को मंच पर क्रांतिकारी कहकर बैठाता है | और नारी हर तरह मरती है , लेकिन रोती हुई औरत मुझे अच्छी नहीं लगती | मुझे औरत की इस निष्क्रियता पर झुंझलाहट होती है|"११ 

    डी . कामेश्वरी के 'मरीचिका ' ( तेलुगु उपन्यास )  में कविता के प्रति बच्चों के उपेक्षित व्यव्हार को को देखकर कविता अपनी मौसी कामाक्षम्मा से प्रश्न करती है कि- " मौसी जी ! बताइए! कोई ऐसे है जो गलतियां न किया हों ? ये मर्द सदियों से कितनी बार गलतियाँ किये थे , कर भी रहे हैं, और करते भी रहेंगे | पुराने ज़माने में मर्द पर स्त्री से सम्बन्ध रहने पर भी समाज उसे मर्द का स्वाभविक  मानकर अनदेखा करते थे| वह रखैल को घर में रखकर , बीवी के साथ उसके पैर भी धुलवाता था |"१२

    कामकाजी स्त्री के लिए समाजवादी रूढ़ परम्पराएँ बाधक बन जाती है | कभी - कभी उसे झेलना असंभव  हो जाता है | ' मुझे चाँद चाहिए ' में वर्षा की जीजी उसे  समझाते हुए कहती है कि - " सिलबिल अपना जीवन सवांर बहन | यह क्या तुमने ड्रामे कि लत पाल ली है |सिलाई , कसीदाकारी  जैसी कुछ सीखती तो कोई बात भी थी | लडके वालों  कि आँखों में  कुछ चढ़ेगा तभी नाव मझधार से निकलेगी|" १३ 

    घर और बाहर से जूझती  हुई वर्षा कहती है - " मेरे दोनों संसार इतने अलग और प्रतिकूल क्यों हैं?“१४   

    'मधुमती ' (तेलुगु उपन्यास) में सावित्रम्मा मधुमती को शादी के बारे में मनाने की कोशीश करती हैं - " शादी से लड़की कि जिंदगी सुस्थिर होती है | लड़की की जिंदगी में सुस्थिरता जितनी जल्दी  आएगी उतनी ही बहेतर होगी | कितने भी साल नौकरी करने पर भी कभी शादी तो करनी ही है | उस शादी को अब ही कर लो |" १५ 

    नारी के भविष्य  के सपनों को पग -पग  पर चोट पहुँचाने का प्रयास किया जाता है | उसकी आत्मनिर्भरता उसके स्वाभिमान की छोर पकड़कर चलती है | अतः वह अपनी अपूर्व महेनत की भाव भूमि पर उतरती हुई स्वतंत्रता  पाना चाहती है | सुरेंद्र वर्मा ‘वर्षा’ की इस मनोदशा को प्रकट करते है -" देह स्वाभिमानी के पद और भावना को तृप्ति से तृप्ति की क्षतिपूर्ति से अपने को सार्थक क्यों नहीं मान लेती ? रीता ने अपनी कलात्मक लालसा को काँटेदार  झाड़ियों में फंसे पल्लू की तरह झटक दिया है | क्या इन सबके आत्मसम्मान उसके आत्मासम्मान के सामने हीन है | मजेदार तथ्य यह है की उसकी पारिवारिक पृष्ठ्भूमि इन सबसे हीन है | " १६ 

    'सहजा ' (तेलुग्गु उपन्यास )  - कितने सालों से दबी हुई ऊर्जा चित्र लेखन में भरकर आयी  है | चित्र पूरा होने तक शारदा में कोई दूसरा विकल्प नहीं रहा | " उस रात को निश्चिंत सो सकी | शनीचर की रात जितनी निश्चिंत बीती रविवार की रात उतनी ही भयानक रूप धारण कर ली | वह निर्जीव सी बिस्तर  पर सोई रही तो  उसकी इज़ाज़त के बिना , उसकी घृणा को गौर न करते हुए , उसे एक वस्तु की तरह भोग कर पति रामाराव बड़े आराम से सो गया  | शारदा के ह्रदय को इन दोनों रातों के बीच जो अंतर है , उसे विकल और विचलित कर दिया |" १७ 


दोहरा संघर्ष

    वैश्विक नारी को इस जटिल व्यवस्था के साथ ताल -मेल  बैठाने के लिए काफी मेहनत- मशक्कत करनी पड़ती है | उसे केवल दैहिक ही नहीं बल्कि मानसिक लड़ाई भी लड़नी पड़ती है | पुरुष निर्मित सामाजिक  व्यवस्था में उसे आदरपूर्ण  स्थान प्राप्त नहीं है | इन वैश्विक परिवर्तनों के बाद भी उसे अपना मर्यादित स्थान सुरक्षित नहीं मिल पाया है | इसका कारण यह है कि भले ही आज के विज्ञानं ने अति आधुनिक समाज का गठन करने  का दम्भ भरा है , परन्तु पुरुषों की संकीर्ण , निर्धन सोच में  कोई  विशेष परिवर्तन नहीं आया  है | खुली  मानसिकता का केवल हवाला मात्र दिया जाता है | इसका कारण है कि समकालीन समय में नारी की एक 'शोषित ' के रूप में छवि स्वीकार कर ली गई है | आधुनिक अहं निष्ठ , कर्मठ नारी ने इस बेचारी, अबला और शोषित का रूप बदल लेने का संकल्प कर लिया है |यही मुख्य कारण है कि उसे सभी प्रकार के कष्टों को सहन करना पड़ता है | समकालीन उपान्यासों में नौकरी पेशा दैहिक और वैचारिक अत्याचारों की शिकार स्त्रियों के मर्म को   छूनेवाला यथार्थवादी  अंकन प्रस्तुत हुआ है | ऐसी नारियों पर हो रहे अनेक अत्याचारों का जीवंत चित्रण किया है | 

    इस सन्दर्भ में ' इदन्नमम की एक भील औरत का निम्न कथन  द्रष्टव्य है -" जीजी बाल-बच्चे भूखे मरते रहे |कोई कुछ नाही | फिर ? पूछे तो  जनि मासों को, उन्हें  बुलावे रात बिरात | अब बताओ , कैसे काटते  जिंदगानी | " १८

    नारी का प्रस्तुत संघर्ष  खून के  रिश्तों  में भी जटिलता और आक्रोश उत्पन्न कर देता है | ' मुझे चाँद चाहिए ' में जब वर्षा साक्षात्कार के लिए जा रही  होती है  तो उसे पिता और भाई महादेव द्वारा शारीरिक यातना दी जाती है - " उसने दरअसल इस प्रकरण को पेटी से नीचे का प्रहार मारा|भाई पिता के साथ संलग्न उसके मन का एक बहुत नाज़ुक हिस्सा ऐसे टूटा कि , फिर कभी न जुड़ सका | " १९ 

    'फिर से बहार आई ' (तेलुगु उपन्यास) में शारदा नौकरी कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है |शारदा को लेकर भाइयों का गुस्सा है कि - " जवान लड़की को घर में रखे कैसे |" २० 

    कामकाजी नारी घर गृहस्थी  और बाहरी जिम्मेदारियों को निभाते हुए आगे बढ़ने  का प्रयास  करती है | कार्य क्षेत्र में जचकी का केस होने के बावजूद कंपनी ने पंढरी बाई को धमकी दी कि - " वह तत्काल काम पर लौटे वरना नौकरी खत्म समझे| इतनी लम्बी  छुट्टी कंपनी  बरदास्त नहीं कर सकती | अंडर सेक्सन चार का केस था | " २१ 

    पवार का कहना है कि - " कायदे से बच्चा होने के छः हफ्ते बाद ही उसे काम पर लौटना था लेकिन कंपनी की धमकी से घबड़ाकर पंडरी बाई तुरंत काम पर पहुंच गई | अधिक  परिश्रम  के चलते  उसके पेट के गीले टांके टूट गये | " २२ 

    कामकाजी नारी के घरवाले भी उसकी परेशानियों  को समझने की कोशिश नहीं करते हैं , उल्टा इल्ज़ामों के कटघरे में खड़ा कर तमाशा देखते हैं | " ठीक ही किया तुम अपने को संभल लो तो महान आश्चर्य होगा ..........हूँ | खुद का ठिकाना नहीं और संजू की बात कर रही हो ?  बेटे को साथ लिए  विलायत अमेरिका के चक्कर लगाओगी  ?  व्हाट फ्यूचर विल यू गिव हिम ? टेल मी ? "२३ 

    'सहजा ' ( तेलुगु उपन्यास ) में शेषगिरि के स्वाभाव के बारे में उषा बताती है कि- " किसी भी कीमत पर शेषगिरी कि दैनंदिक आवश्यकताएँ  पूरी हो जाना है | उसकी अपनी धारणाएं , अपना काम , अपने दोस्तों के अलावा किसी  और विषय के बारे में सोचता ही नहीं | कल रात उसके बुलाते ही में तो गयी | अगर में कभी उसके पास जाती तो मेरी कदर ही नहीं करता |  मेरा प्यार, पसंद या इच्छा का कोई मायना नहीं | उसकी और मेरी दुनियां  बिलकुल ही अलग है | आज मुझे एकाकीपन बहुत काट रहा है|"२४ 

    विशेष रूप से आधुनिक नौकरी पेशा नारी दैहिक और वैचारिक प्रताड़नाओं को झेलती हुई कार्यरत हो रही है | समाज में इनका निरंतर शोषण होता जा रहा है|ऐसी स्त्रियों का सशक्त वर्णन समकालीन उपान्यासों में दृष्टिगोचर होता है |


यांत्रिक जीवन जीती समकालीन कामकाजी नारी      

    समकालीन उपन्यासकारों  ने नारी के आधुनिक स्वरुप को यथार्थवादी रूप से उकेरने का प्रयास किया है |आज की नौकरी पेशा नारी यंत्रवत  होती जा रही है | समाज ने उसके मानसिक - दैहिक यंत्र तुल्य  जीवन को उपेक्षित करने का प्रयास किया है | गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों का पालन करने का ठेका  नारी को पहले से  दे दिया गया था |बाहरी दुनिया में भी उसे अपनी सक्षमता की परीक्षा निरंतर देनी पड़ती है |

    यांत्रिकता की इस विभीषिका को सुरेंद्र वर्मा ने अपने उपन्यास में अद्भूत ढंग से चित्रित किया है | वर्षा ने अपने उपन्यास में  अद्भूत ढंग से चित्रित किया है | वर्षा कहती है - " वह कितनी बार टूटी , कितनी बार लहूलुहान हुई , कैसे तन - मन  को पूरी एकाग्रता से कला - कुंड में झोंका | अगर इन तीखी आँखों की प्रेरणा से डर न होता, तो शायद इस अग्नि - परीक्षा में खरी साबित न होती | पर वह कुछ कह न पाई | बस एक छोटा सा आँसू आँख में झिलमिलाता गया | "२५ 

    'सहजा' ( तेलुगु उपन्यास ) में रामाराव शारदा के सिर को पकड़कर बाल खींचते हुए कहने लगा कि - " अमरावती पिकनिक , दोस्तों कि तस्वीरें बनाना, दोस्तों के साथ घूमना - फिरना ....ये सब क्या है ? तुम्हे मालूम है न , ये सब मुझे पसंद नहीं ? ....कभी घर से बाहर नहीं निकलना | मुझसे पूछे बिना , बताये बिना , तुम्हे कभी घर से बाहर नहीं निकलना है | अगर तुम गयी तो.... | " २६ रामाराव का पुरुषहंकार पूरी तरह इन चेष्टाओं में और शब्दों में व्यक्त हो रहा है |

    आर्थिक स्वतंत्र नारी अपनी कोमल  भावनाओं को रौंदती अपने भविष्य निर्माण का स्वप्न देख रही है | उसका जीवन एक ही ढर्रे पर चलने के लिए विवश हो जाता है ,तो वह एकाकी , नीरस जीवन का शिकार होने लगती है | ' अपने-अपने कोणार्क ' की कावेरी  भी एक कामकाजी नारी है जो अपने पति के साथ रहना चाहती है पर नौकरी की जगह  अलग -अलग होने से रह नहीं पाती है|कावेरी की मनोव्यथा इन शब्दों में व्यक्त होती है - " शादी के बाद भी वह पति से अलग और अकेली रहने को मजबूर है | उसने मेरे सामने ही बातों के दौरान दिवाकर से कहा कि अकेली रहते -रहते वह ऊब गई  है |दिवाकर भी पत्नी के साथ रहकर अपने घर संसार का सुख देखना - भोगना चाहता होगा, फिलहाल  इस मामले में कुछ कर नहीं पा रहा था |”२७    

    'दिखता हुआ अतीत ' (तेलुगु उपन्यास) में दही बेचने वाली माणिक्याम्बा से पिता  का झगड़ा हो रहा है | तो माँ  कमलाम्बा  बीच में आकर दस दिनों  में बाकी रुपए चुकाने कि बात बताकर  उसे मना ली | जाते - जाते माणिक्याम्बा धीमी आवाज़ में कहने लगी कि -  " मैं भी मेहनत करती हूँ  | लेकिन तुम्हारी तकलीफ देखकर  मेरा  दिल पसीज जाता है | ऐसा निकम्मा  पति किसलिए ?

    समकालीन उपन्यासों  मैं आधुनिक  मशीन  तुल्य  नारी के जीवन को सार्थकता  से प्रस्तुत किया गया है |इस मशीनी जीवन की करुण गाथा प्रत्येक वर्ग की नारी को झेलनी पड़ती है | इसका  प्रतिबिम्ब आज के सामाजिक जीवन की असफल कड़ियों मैं देखा जा सकता है | परिवार टूटन भी नारी के इस रूप से प्रभावित है |  आज का समाज जिस छोर पर खड़ा है वह इस समस्या से आप्लावित  है |

 

यौन शोषण  

    नारी और पुरुष का यौन आकर्षण ईश्वर प्रदत्त है | परन्तु इस  प्राकृतिक आकर्षण को समाज ने नैतिक  धरातल  पर सीमित कर रखा है | सृष्टि को आगे बढ़ाने का यह एक माध्यम है पर इसकी पवित्रता को बनाये   रखना होगा | 

    ईश्वर ने  स्त्री शरीर को पुरुष की अपेक्षा कमज़ोर बनाया है | उसके पास पुरुष जैसे बाहुबल  नहीं  हैं| 

    इसी कारण वह बाहरी संसार में ही नहीं कभी - कभी अपने घर की  चारदीवारी  में  भी  असहाय  हो जाती है |  भले ही  वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर  हो गयी है, पर उसे इस  समाज से  जूझना पड़ता है |

    आज की नारी यौन शोषण की किस यंत्रणा से गुजर रही है इसको पूरी तरह रेखांकित करती ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं -" सौ में से प्रत्येक पांच लड़कियाँ स्वतंत्र यौन संबंधों में अपना वजूद तलाश रही हैं, अधिकार तलाश रही हैं | तलाश लिया  ? पा लिया ? चली आती हैं कहानियाँ लेकर |" २८ 

    ' मरीचिका ' (तेलुगु उपन्यास )  में कविता को देखते ही विजयेन्दर में नफरत बढ़ने लगी | वह कविता से पीछा छुड़ाना चाहता है | इसी सिलसिले में वह पूछता है कि -" तुम किस उम्मीद को लेकर इस घर में आयी हो ? जीने के लिए तुम्हारे पास नौकरी  है , पैसों के लिए ...?  तुम्हारे साथ अन्याय हुआ तो मेरे साथ भी वैसा अन्याय होना समझकर बीवी , बच्चो से मुझे दूर करने के इरादे में हो ? तुम्हे.......क्या चाहिए  ? पैसे चाहिए  तो बताओ, जहाँ तक हो सके, उधर लेकर दे दूँगा | एक लाख , दो लाख ......कितना चाहिए ........? " २९ 

    'छिन्नमस्ता ' में नरेंद्र द्वारा यौन शोषण का शिकार उसकी सेक्रेटरी बनती है और  वह  गर्भवती  हो जाती है | नरेंद्र उससे अपना पीछा छुड़ाना चाहता है और पूछता है कि -" अरे भूल जाओ इन कसमों - वादों को ! बोलो कितने रूपया लेकर जान छोड़ोगी ? "३० 

    पुरुष नारी को इस्तेमाल करके कूड़ेदान की तरह फेंक देता है | यह प्रथा सदियों से चली आ रही है | वह आज भी चल रही है | आधुनिक लड़की के पढ़ी - लिखी  स्वावलम्बी , आत्मनिर्भर होते हुए भी  स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया |

    समकालीन उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों में आर्थिक स्वतंत्र नारी का रूप प्रस्तुत किया  है | इस सन्दर्भ  में नौकरीपेशा  स्त्री की दोहरी भूमिका प्रस्तुत होती है | इन उपन्यासों में नारी का बाह्य -अभ्यन्तर  स्वरुप  रोचक और यथार्थ रूप से उकेरा गया है |  


निष्कर्ष :- 

    दहेज़ की सामाजिक प्रथा नारीवादी संघर्ष का प्रमुख क्षेत्र है | प्राचीन समय से यह प्रथा नारी का शोषण करती चली आ रही है | सम्पूर्ण भारतीय प्रदेश की नारियाँ इस सामाजिक कुप्रथा का शिकार बानी हुई है | जमाना  बदल रहा है और उसके साथ दहेज़ प्रथा का रूप भी बदलता  जा रहा है | अतः आधुनिक नारी का यह प्रयास धीरे -धीरे  सफलता की ओर बढ़ रहा है परन्तु फिर भी नारी को अपनी मंज़िल तय करने में और काफी समय लग जायेगा |

    अतः कहा जा सकता है कि हमारे हिंदी और तेलुगु उपन्यासकारों  की नारीवादी दॄष्टि  से यह सामाजिक पहलू  कैसे  अछूता रह सकता है ? इन दोनों ही भाषा के उपन्यासकारों ने अपनी सजग दॄष्टि से इस दहेज़ रुपी अमानवीय  व्यापार को उजागर करने का प्रयास किया है | आज भी यह प्रथा स्त्री स्वतंत्रता को खोखला बनाने में प्रयत्नरत है | कई बार हमारे आस -पास की दुनिया में इस प्रथा का शिकार हुई नारी की घटना हमारे सामने आती  है |


उषा कुमारी
पी.हेच.डी, स्टूडेंट,
उस्मानिया यूनिवर्सिटी,
हैदराबाद |
79896 54837

सन्दर्भ

 १. उत्तरशती का हिंदी साहित्य -डॉ. सुरेश कुमार जैन पृ.६० 

२. नारी - चिंतन - नयी चुनौतियाँ - डॉ. राजकुमारी , पृ . ४० 

३. मुझे चाँद चाहिए - सुरेंद्र  वर्मा , पृ .७७ 

४. आकाश में  विभाजक रेखाएँ नहीं है - मु. सुजाता रेड्डी , पृ. २७ 

५. छिन्नमस्ता - प्रभा खेतान , पृ .२१२ 

६. जंगल की पुत्री - वनजा , पृ .३७ 

७. छिन्नमस्ता - प्रभा खेतान , पृ .२१० 

८. सहजा - वोल्गा , पृ .९२ 

९. आवां - चित्रा मुदगल , पृ. ५२२ 

१०. सहजा - वोल्गा , पृ. ११९ 

११. छिन्नमस्ता - प्रभा खेतान , पृ .१८७ 

१२. मरीचिका - डी. कामेश्वरी ,पृ. ११ 

१३.. मरीचिका - डी. कामेश्वरी ,पृ. ११६ 

१४.. मरीचिका - डी. कामेश्वरी ,पृ. ११६ 

१५. मधुमती - गोविंदराजु सीतादेवी , पृ. ५५ 

१६. मुझे चाँद चाहिए - सुरेंद्र वर्मा , पृ . ११८ 

१७. सहजा - वोल्गा , पृ. १२३ 

१८. इदन्नमम - मैत्रेयी  पुष्पा , पृ. ७० 

१९. मुझे चाँद चाहिए , सुरेंद्र वर्मा , पृ. १८१ 

२०. फिर से बहार आई- मु. भारती , पृ. १४६ 

२१. आंवा - चित्रा मुदगल ,पृ. ९७ 

२२. आंवा - चित्रा मुदगल ,पृ. ९७ 

२३. छिन्नमस्ता - प्रभा खेतान , पृ. १८९ 

२४. सहजा - वोल्गा , पृ. ५७  

२५. मुझे चाँद चहिए- सुरेंद्र वर्मा ,पृ. २७६ 

२६. सहजा - शारदा ,पृ. १७१ 

२७. अपने -अपने कोणार्क - चंद्रकांता ,पृ.९१

२८. आवां - चित्रा मुदगल , पृ .५०० 

२९. मरीचिका - डी. कामेश्वरी ,पृ.१५५ 

३०. छिन्नमस्ता -प्रभा खेतान , पृ.२१८


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