साहित्य संगम
प्रकृति के अस्तित्व का असल प्रायोजन आत्मा को शिक्षित करना है और इसलिए इस प्रकृति की समस्त सजीव एवं निर्जीव वस्तुएं हमारी आत्मा को ज्ञान सिखाती है ताकि उस ज्ञान से आत्मा स्वयं को जागृत कर आत्मा और परमात्मा के मिलन और इसके गूढ़ रहस्यों को समझ कर अंतरदीप्त हो सके। किसी फूल या प्राणी के बच्चे को देखकर सहसा प्राप्त हुई एक सुखद अनुभूति हमें जीवन के महत्व का एहसास और हमें हमारे कर्तव्यों का आभास कराती है, वहीं दुख, बीमारी, मृत्यु या प्राकृतिक आपदाओं से जीवन मूल्य का जो अनुभव प्राप्त होता है वह ज्ञान हमें जिंदगी का असल प्रायोजन समझाता है।
प्रकृति हमारे लिए एक पुस्तक के समान है जिसका अध्ययन हम अपने जीवन के प्रारंभिक दौर से अर्थात माता के गर्भ से ही करना आरंभ कर देते हैं और यह जीवन पर्यंत चलता रहता है अर्थात आखरी सांस तक। जब हमें प्रकृति रूपी पुस्तक से ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो हम अपने और अपने आसपास के प्रत्येक जीव के जीवन महत्व और जीवन मूल्यों को समझ जाते हैं और संपूर्ण सांसारिक वस्तुएं हमारे लिए गौण हो जाती हैं। पद, पैसा, प्रतिष्ठा सुख-दुख, जाति-धर्म से ऊपर उठकर हम उस सच्चे सुख को प्राप्त कर लेते हैं जिसे हम आत्मा का परमात्मा में विलीन होना कहते हैं। स्वर्ग-नरक यहीं इसी प्रकृति में छिपे है, हमारे कर्मों में छिपे हैं केवल समझने या पहचानने की आवश्यकता है।
प्रकृति हमें कितना कुछ सिखाती है परंतु जाने अनजाने हमारी आंखें खुली और मन के कपाट बंद रहते हैं जिस कारण हम उस सच्ची सीख को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। निश्चिन्तता से खड़े यह पहाड़ जो सदियों से प्रतिदिन हवाओं के थपेड़ों और बारिश की चोट के बावजूद अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से अपने स्थान पर अडिग खड़े रहते हैं और फिर भी उसी बारिश और हवा को बार-बार आलिंगनबद्ध कर अपने प्रेम का प्रदर्शन करते रहते हैं। पेड़ अपनी जड़ों से मिट्टी को हमेशा अपनी बाहों में समेट कर अपने स्नेह का प्रदर्शन करता है जैसे कोई बालक अपनी मां के सीने में दुबका रहता है और यौवनावस्था में उसके कण-कण को संभाल कर, उसके प्रति अपनी कृतज्ञता को प्रदर्शित करता है क्योंकि उसे पता है वह उसका पालन पोषण करती है। एक एक पत्ता पेड़-पौधों का अनुशासित रहते हुए झूम झूम कर अविरल बहती हवा के साथ-साथ स्वयं को बहा कर उसके प्रति हर्ष और आनंद का भाव दर्शाता है और साथ-साथ चलने का संदेश देता है। इतनी संवेदनशीलता एक साथ चलने की, बहने की इतनी गहन स्वीकार्यता हमें विस्मित करती है और हमें सदैव साथ साथ चलने का संदेश देती है।अपनी शीतल छांव और आद्रता से न जाने कितने ही मनुष्य, जीव-जंतुओं के व्याकुल मनो को शांत करता है, आश्रय देता है, भरण-पोषण करता है और जो कुछ उसके स्वयं का है सब दूसरों के लिए अर्पित करता रहता है। शायद यह पेड़-पौधे कृतार्थता की सर्वोत्तम परिभाषा की ओर हमें इंगित करते हैं। निर्मल जल से लबालब भरी यह नदियां कितने प्रेम से पहाड़ों और मैदानों के हृदय को चीर कर, वृक्ष लताओं की उभरी नस नाड़ियों की तरह पूरी पृथ्वी को समेटकर प्रत्येक के लिए उपलब्ध होना चाहती हैं और इनकी लहरों में, इन की गहराइयों में अठखेलियां करते जीव-जंतु, मछलियां सभी को अपने वात्सल्य से सींचती हुई, अपनी लहरों की ध्वनि प्रतिध्वनिओं के उत्सव गीत के रूप में हमें दूसरों के जीवन में अपने जीवन के आनंद को ढूंढते हुए, उत्साह एवं आनंद के साथ निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।
इस प्रकृति में जीवन एक दूसरे के सुख-दुख के पूरक के रूप में, पालक और पोषक के रूप में मौन की वाचालता को सुनते-समझते आजन्म साथ-साथ चलता है क्योंकि बदलना नियति है तो चलते रहना जीवन है। हमसे बिना कुछ लेने की इच्छा के साथ सृष्टि के कल्याण का समस्त भार उठाते हुए यह नदियां, सागर, यह वृक्ष, लताएं निश्वास हम सबकी सांसे चलाने की जिम्मेदारी उठाये ही रहती हैं। प्रकृति अपने धैर्य, स्वीकार्यता, संवेदनशीलता और निस्वार्थ प्रेम की सुंदरतम अनुभूति से पूरे परिवेश को उन गूढ रहस्यों से परिचित कराती रहती है जिनको समझने की हमें आवश्यकता है। जिसने समझ लिया उसने सच्चा सुख प्राप्त कर लिया परंतु न जाने क्यों हमारी आंखें खुली और मन के कपाट बंद रहते हैं और कितनी ही बातें रह जाती हैं सतही सी।
स्मृति चौधरी
7500313145
विज्ञान शिक्षिका
सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
फाउंडर शैक्षिक आगाज़
संरक्षिका रेडियो मेरी आवाज़ एवं लिटिल हेल्प ट्रस्ट, भारत
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