हिंदी साहित्य के विविध रूप
गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में नारी
- षेक रहिमा
जनजीवन के सक्ष्म एवं जटिल यथार्थ और जनवादी साहित्यकार और समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर श्री गोविन्द मिश्र वर्तमान उपन्यासकारों में अलग पहचान बनाएँ है |
गोविन्द मिश्र का जन्म १ अगस्त सन १९३९ आतरा उत्तर प्रदेश में हुआ | गोविन्द मिश्र हिंदी संसथान भारतीय भाषा परिषद्, साहिथ्य अकादमी दिल्ली तथा व्यास सम्मान द्वारा साहित्य सेवाओं के लिए सम्मानित हुए हैं | गोविन्द मिश्र के दस उपन्यास और तेरह कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं |
यात्रा वृत्तांतकार के रूप में इनकी पाँच रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं | 'साहित्य का सन्दर्भ
', ' कथा-भूमि , 'संवाद अनायास' और 'समय और सर्जना' रचनाओं के माध्यम से गोविन्द मिश्र साहित्य निबंधकार के रूप में ख्याति प्राप्त की है |
बाल साहित्यकार के रूप में भी गोविन्द मिश्र प्रसिद्धि हुए हैं | ' वह अपना चेहरा', ' उतरथि हुए धुप ' , 'लाल पीली जमीन ' ,' हुज़ूर दरबार ' , ' तुमारी रोशनी में ' , ' घिर समीर ' ' पाँच आंगनों वाला घर ' ,' फूल इमारतें और बंदर ' , 'कोहरे में कैद रंग ' और ' धुल पौधों पर ' गोविन्द मिश्र के उपन्यास हैं | गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में सरकारी दफ्तरों का वातावरण और वह काम करने वाली कामकाजी नारी, मध्यवर्गीय नारी संघर्ष, विवाह के बाद नारी, पूर्व काल में और नवीन काल
में नारी के बारे में जिस प्रकार जीवन से संघर्ष करते है बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत
किये है। गोविन्द मिश्र नारी के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहते हैं कि आज कल
किस प्रकार घर परिवार के लिए वह मात्र आर्थिक सोत बनकर रह जाती है ।उसे घर परिवार
में एवं कार्यालय में भी अनेक यंत्रणाओं का सामना पड़ रहा है।
नारी को अपने सहज
एवं कोमल स्वभाव से हटने पर मजबूर किया जा रहा है। वह अपना सामाजिक जीवन मेंही नहीं
पारिवारिक जीवन में भी सहानुभूतिपूर्ण मानवीय संवेदनाओं के लिए तरस खाती हुई भटक
रही है।गोविन्द मिश्रा के उपन्यास “तुम्हारी रोशिनी में”नायिका सुवर्णामुंबई महानगर के आधुनिक संस्कृतिक सभ्यता कीकायल है।रमेश उसका
पति है।सुवर्णा कामकाजी नारी है।उसके अपने मित्रों का भी दायरा है जिसमें अधिकांश पुरुष
हैं। अपने पति रमेश की सहमति से अपने पुरुष मित्रों से मिलती जुलती थी और वह अपनी मनोभावनावों को बिना संकोच से व्यक्त करती थी। प्राचीन बंधनों को तोड़कर अपने मार्ग पर आगे
बढ़ना चाहती थी। वह अपने आगे बढ़ने के मार्ग पर आने वाले बंधनों को तोड़ना चाहती थी और
आगे बढ़ जाती थी। सामाजिक संबंधों में मुक्त आत्मीयता खोज करती है।लेकिन बाद में उसी
पति जो सुवर्णा को आजादी दी उसी व्यक्ति अपने मन में सुवर्णा के प्रति अधिकार जलन बढ़ा
लेता है और पति के अधिकार से उस पर शर्त भी लागाता है और स्वतंत्रता को खींच लेता है और उसे पूछे
बिना किसी से बात भी करने नहीं देता है। इससे वह मन में घायल होकर अपने पति को छोड़कर अपने
मायके चली जाती है ।
दूसरी उपन्यास “धूल पौधों पर” एक ऐसी युवती की व्यथा है जो शादी
के बाद अपने ससुराल में अनेक अमानवीय व्यवहारों के शिकार बनती हैं और तंग आकर उनके पति से
नफरत करती है।
इस प्रकार गोविन्द
मिश्रा नारी के सम्मान उस की स्वतंत्रता , उसकी महतव कांक्षा, उसकी सुरक्षा के बारे में प्रस्तुत किया है।
सन्दर्भः
१.
तुमारी रोशनी में -1985
२.
धुलपौधों पर -2008
षेक रहिमा
शोधार्थिनी
हिन्दी विभाग
आन्ध्र विश्वविद्यालय
विशाखापट्टणम -530003
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