Monday, April 25

सुषम बेदी के उपन्यासों में वैयक्तिक अन्तर्द्वन्द्व - अप्पाराव (हिंदी साहित्य के विविध रूप)

हिंदी साहित्य के विविध रूप




सुषम बेदी के उपन्यासों में वैयक्तिक अन्तर्द्वन्द्व

            अप्पाराव



व्यक्ति जब दो ऐसे भावों, विचारों अथवा अभिप्रेरकों का सामना करता है, जिन्हें वह समान रूप से चाहता है। किन्तु दोनों की पूर्ति सम्भव नहीं हो पाती क्योंकि दोनों की दिशाएं एक दूसरे के विपरित होती है - तो चुनाव न कर सकने के कारण व्यक्ति अन्तर्द्वन्द्व ग्रस्त रहता है। वैयक्तिक अन्तर्द्वन्द्व व्यक्ति के स्वयं से सम्बंधित होता है अथवा उसके अन्तर्मन में ही घटित होता हैं जब ईश्वरीय सता के प्रति अनास्थामय होकर और परहित की भावना छोड़कर व्यक्ति स्वयं में तल्लीन हो जाता है तो उसका द्वन्द्व वैयक्तिक हो जाता है। अपने हित तथा दूसरों के अहित को लेकर व्यक्ति के मन में एक अजीबोगरीब संघर्ष होता रहता है। उसका अह्म अत्यन्त प्रबल हो उठता है। वैयक्तिक अन्तर्द्वन्द्व के अनेक कारण हैं जिनमें, अतृप्त काम भावना, हीन भावना, भ्रम के कारण, अह्म भावना व व्यक्ति की असीमित इच्छाएं प्रमुख हैं।

डॉ० मंजुला गुप्ता के अनुसार, “आर्थिक अभाव, संकीर्ण विचारों से व्यक्ति द्वन्द्वरत है। वैयक्तिक रूचियों काम अतृप्ति, प्रेम विफलता और सामाजिक बन्धनों से व्यक्ति मनोद्वन्द्व से पीड़ित हो गया। अहम और हीन भावना से जकड़ा व्यक्ति कुण्ठा ग्रन्थि और मनोद्वन्द्व में फँस जाता है। बौद्धिक महत्वाकांक्षी व्यक्ति अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए प्रयत्न करता है। अत: उसका जीवन सदैव संघर्ष और द्वन्द्व से आपूरित रहता है।"।'

सुषम बेदी के उपन्यासों के पात्र वैयक्तिक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रसित है। उनके अन्तर्द्वन्द्व का कारण, काम अतृप्ति, हीन भावना, और अहम भावना प्रमुख रूप से गुप्ता डॉ० मंजुला, हिन्दी उपन्यास, समाज और व्यक्ति का द्वन्द्व

 

अतृप्त काम भावना संबंधी द्वन्द्व

फायड के अनुसार मनुष्य की मूल शक्ति कामवृति है। उसके दमन से मनुष्य कुण्ठा ग्रस्त हो जाता है। कामशक्ति मनुष्य के जीवन की परिचालित है। फायड इसका सम्बन्ध रति प्रेम और आत्म प्रेम से जोड़ते हैं। काम शक्ति स्वाभाविक शक्ति है और जीवन में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।

__ “फायड ने मनुष्य की मूल परिचालिका काम प्रवृति को माना है और उनके मतानुसार काम या सैक्स स्थूल शारीरिक भूख है और वह स्त्री पुरूष के प्रेम का आधार है।"

मानव-जीवन की शाश्वत प्रवृति का नाम 'काम' है। प्रेम का दूसरा रूप 'काम तृप्ति' है। जिनकी सामाजिक मान्यता व आदर्श स्वीकृति विवाह में मानी जाती है। प्रेम और काम- वासना जीवन की ऐसी वृतियाँ हैं जिनकी अतृप्ति जीवन में कुण्ठा, निराशा, विसंगति को जन्म देती है। व्यक्ति की अतृप्त इच्छा, कामना उसके व्यक्तित्व में ऐसा तीव्र विद्रोह, आक्रोश, द्वन्द्व उद्वेलित कर देती है कि उसमें असन्तुलन आ जाता है और अतृप्त इच्छाएँ तृप्ति की कामना में नैतिक-अनैतिक का बन्धन तोड़ देती है।"

___ सुषम बेदी के उपन्यासों में ऐसे अनेक पात्र चित्रित है, जो अपनी अतृप्त काम वासना के कारण असन्तुलन, ऊहामोह और द्वन्द्वरत जीवन जीते हैं। 'हवन' उपन्यास में अनुज एक काम कुंठित दोहरे व्यक्तित्व को धारण किया हुआ पात्र है। तनिमा से विवाह करके वह अमेरिका पहुँचता है। वहां पहुँचकर अनुज तनिमा के अलावा अन्य स्त्रियों से संबंध रखता है। परन्तु वह तनिमा से यह बात छिपाना चाहता है। क्योंकि वह न तो अपनी पत्नी को छोड़ना चाहता और न ही परायी स्त्रियों से संबंध तोड़ना चाहता है। तनिमा को जब इस बात का पता चलता है कि अनुज के दो नों से संबंध है तो वह तनावग्रस्त होकर अनुज से तलाक लेने को तैयार हो जाती है पत्नी से संबंध टूट जाने के डर से अनुज समझाता हुआ कहता

तू समझती क्यों नहीं? सैक्स और प्यार दो अलग- अलग चीजें हैं। जो प्यार मेरे मन में तेरे लिए है वह किसी और के लिए हो ही नहीं सकता। अव्वल तो मैंने कुछ किया ही नहीं पर अगर कर भी लूं तो उसे आपसी रिश्ते में थोड़े ही कोई फर्क पड़ेगा। तलाक-तलूक की बात भूल जा। ऐसी अफवाहों पर कोई तलाक लिए जाते हैं।"

           लौटना" उपन्यास में कृष्णन अतृप्त काम भावना का शिकार है। वह जीवन के प्रति गहन उदासीनता का शिकार है। अब वह इस उदासीनता से छुटकारा पाना चाहता है। मीरा का प्रवेश जब उसके जीवन में होता है तो उसका जीवन एक सुनिश्चित दिशा में बढ़ने लगता है। मीरा के उसके जीवन में आ जाने से उसकी दमित भावनाएँ जो अचवेतनावस्था में विद्यमान थी, फिर से करवट ले उठती है। कृष्णन व मीरा दोनों ही मृतप्त कामभावना के कारण एक दूसरे के सानिध्य में सुख की अनुभूति करते हैं।

          भीतर का सारा रस चू चू कर बह रहा था...मीरा का घट रीत रहा था..... ऐसी हरी भरी जलवायु में भी उसकी धरती सूख रही थी......तब बरसाती बादल के टुकड़े सा सावंला धुंघराले बालो वाला कृष्णन उस पर झुक आया था। कभी ऐसा लगता कि कृष्णन से जुड़ना था....उसी पहचाने से आंतरिक संगीत की ओर लौटना था। एक की जरूरत दूसरे को धोखा दिला जाती। मीरा के लिए फैसला करना मुश्किल हो जाता कि कौन उसे अपनी ओर खींच रहा है।"

          यौन अतृप्ति के कारण ही 'कतरा दर कतरा' उपन्यास का कुमुद कुमार सहगल आत्मरति में संलग्न रहता है तथा पकड़े जाने पर उसकी पिटाई की जाती है। जीवन में असफलता प्राप्त करने के कारण वह निराशा का शिकार हो जाता है। उसको आत्मरति में संलग्न देखकर जब उसके पिता जी पिटाई करते हैं तो उसकी बहन शशी समाज की मान्यताओं के बारें मे सोचती है।

          कितनी हारी हुई, कितनी दर्द से सिंची सी वह आवाज पता नहीं क्यों मुझे आदि कवि का आहत क्रौंच याद आ गया। यौन सुख में बाधा आने की पीड़ा को अगर आदि कवि भावनाओं को उत्सव की तरह मानता है तो वाहवाही करते हैं पर वही जब अभाव में स्व की और उन्मुख होकर व्यक्ति के यौन सुख का माध्यम बनता है तो उसे अकरणीय मानकर दंडित किया जाता है। क्या इंसानी जरूरतें और जज्बात समाज और नियमों की इजाजत लेकर ही उभर सकते। क्या उनका दमन ही अच्छे इंसान का फर्ज है.... अच्छाई की परिभाषा है? कक्कू का दर्द उसकी चीखें शायद गर्हणीय ही मानी गयी। किसी को उन चीखों से हमदर्दी नहीं हुई। जिन बातों इच्छाओं व व्यवहारों को समाज स्वीकार नहीं करता उनका दर्द भी।"

          इतर' उपन्यास के स्वामी रामानंद धर्म की आड़ में स्त्रियों की कमजोरियों का लाभ उठाना जानते हैं। जयंत की बीवी विभूति को बाबा जी धर्म के नाम पर अपने चंगुल में फंसा लेते हैं। अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए वह दोहरे व्यक्तित्व को धारण किए हुए हैं। धर्म की आड़ में वह अपनी वासना का शिकार निकोल को बनाना चाहते हैं। निकोल की शिकायत पर पुलिस बाबा जी को पकड़कर ले जाती है। अपने इस पाप को धर्म की आड़ में ढकने की कोशिश करते हैं। वह अपने अभिषेक जैसे भक्तों को कहते हैं कि यह उनमें पूर्व जन्म का कोई दोष है -

          उनका कहना है उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया..निकोल ही कुछ मायूस थी-अपनी जिंदगी से .....कैरियर से ...बाबा जी के अनुसार तो यह किसी पूर्व जन्म के कर्म की सजा है वह कह रहे थे कि उनको तो पता ही था कि यह होना है। बिना अपराध के उन्हें सजा मिलेगी लेकिन वे इसका निवारण नहीं कर सकते थे, क्योंकि पूर्व जन्म का लेखा था।"

          'गाथा अमरबेल की' उपन्यास का हरीश काम अवृत्ति का शिकार है। वह अपने मित्र विश्वा की पत्नी शन्नों से प्रेम भाव रखता है परन्तु वह सदैव अपनी काम भावना का दमन करता आया है किन्तु इस बार जीवन से निराश हरीश का कामवेग विस्फोट रूप में प्रकट होता है जब शन्नों उसे विश्वा के नौकरी छोड़ देने की बात कहती हुई रोने लग जाती है तो वह शन्नों को भावात्मक सहारा देते देते अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति करता है हरीश बेबस सा अपनी...उसकी पुकारों को सुनता रहा.....जवाब देता रहा..... ..किन्हीं बूंद बूंद को तरसती, बहुत पुरानी दबी इच्छाओं को अचानक सागर भर का आप्लावन मिल गया था। हरीश डूबता चला गया...शन्नों बहती चली गई।"

          'मोरचे' उपन्यास में अनुज अतृप्त काम भावना के कारण अन्य लड़कियों से भी संबंध रखता है। तनु जब उससे अंबिका नामक लड़की से रिश्ते के बारे में पूछती है तो वह उसका दोष तनु पर ही मढ़ता है कि तुम तो मुझे छोड़कर अमरीका चली गई अब तुम्हारी याद में कुछ कर लिया तो इसमें मेरा क्या कसूर है। शादी के बाद भी जब अनुज अपनी ये आदतें नहीं छोड़ता तो तनु अन्तर्द्वन्द्व ग्रस्त हो जाती है। वह अनुज से बदला लेने व अपनी अतृप्त भावना की पूर्ति के लिए रजीनो नामक अंग्रेज से संबंध जोड़ती है। परन्तु अपने इस रिश्ते को लेकर सन्देह है इसलिए वह सोचती है

           लौटते हुए हवाई जहाज में तनु खुद को कोसती रही कितनी पागल थी जो यू ही बिना सोचे समझे खुद को दूसरे पुरूष के हवाले कर दिया। पर फिर भी पछतावे की अनुभुति नहीं थी। एक तसल्ली थी कि चलो एक बार कर तो लिया। कभी मौका मिला तो अनुज को बताएगी...तुम्हें दूसरी औरते मिल सकती है तो मुझे भी दूसरे आदमी।"

          अत: सुषम बेदी के उपन्यासों मे अतृप्त काम वासना में छटपटाते द्वन्द्वरत जीवन जी रहे प्रवासी भारतीयों का चित्रण है जो अपनी काम तृप्ति के लिए नैतिकता - अनैतिकता की सभी दीवारों को लांघ जाते हैं।  

 

संदर्भ ग्रंथ :

The basic writings of Sigmund freud-p-653

गुप्तमंजुला, हिन्दी उपन्यास: समाज और व्यक्ति का द्वन्द्व, पृष्ठ-59

बेदी सुषम, हवन, पृ० 94 'बेदी सुषम, लौटना पृ० - 114

'बेदी सुषम, ‘इतर' पृ० - 142

बेदी सुषम, गाथा अमरबेल की पृ० - 156

अप्पाराव

शोधार्थी हिन्दी विभाग,

आन्ध्रविश्वविद्यालय,

विशाखापट्टणम

आन्ध्रप्रदेश, भारत,

मो. ई-मेइलः raokosuru86@gmail.com


--------------------------------------------------------------------------------------

If you like this Writing and want to read more... Then Follow Us
or call
9849250784

for Printed Book
हिंदी साहित्य के विविध रूप
डॉ के संगीता 
-----------------------------------------------------------------------------------------------------


scan to see on youtube



scan to join on WhatsApp




BOOK PUBLISHED BY :

GEETA PRAKASHAN

INDIA

Cell 98492 50784

geetaprakashan7@gmail.com

---------------------------------------------------------------------------------

do you want to publish your writing through our BLOGPAGE ?
Please call us 62818 22363 

No comments:

Post a Comment

हमर छत्तीसगढ़ - मुकेश कुमार भारद्वाज (Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")

(Geeta Prakashan Bookswala's Anthology "उथल पुथल - अक्षरों की")      हमर छत्तीसगढ़  💐..................................💐 छत्त...